''कैसे हो किशन सेठ, क्या हालचाल हैं? क्यों, अभी तक अस्पताल से चिपके बैठे हो। क्या यहीं घर बसाने की इच्छा है?'' जयराम की कडकदार आवाज़ उस छोटे कमरे में गूँज उठी। ''आओ दोस्त, आओ। तुम्हारे आने से शायद मन कुछ अच्छा हो जाएगा।''

किशनलाल ने आँसू पोंछते हुए मित्र का स्वागत किया। जयराम उसका बचपन का दोस्त है। स्कूल, कालेज साथ जाने के अलावा उनकी नौकरी भी एक ही विभाग में लगी थी, लेकिन कुछ ही वक्त में जयराम का मन नौकरी से भर गया था। उसने अपने मामा के साथ रेडीमेड वस्त्रों का व्यवसाय शुरू कर दिया और अब वह एक बड़ा सेठ बन गया है, लेकिन किशनलाल उसे हमेशा जयराम कहकर ही संबोधित करता है और जयराम उसे सेठ किशनलाल कहकर पुकारता है।

सुंदरी ने दुपट्टे से अपने आधे सूखे आँसुओं को ठीक से पोंछा और जयराम को स्टूल पर बैठने को कहकर, स्वयं सामने वाले पलंग पर बैठ गई। जयराम ने अपने मित्र को आँसू पोछते और सुंदरी के चेहरे के उदासी भरे हाव-भाव देखकर अनुमान लगाया कि वातावरण कुछ बोझिल रहा है। वह दोस्त के निकट बैठ गया और उसका हाथ अपने हाथों में लेकर कहने लगा, ''किशन सेठ, क्या बात है। क्या फिर भाभी से किसी बात पर झगड़ा हो गया है?''

कुछ क्षण खामोश रहने के बाद, किशनलाल बोले - ''नहीं यार, झगड़ा करने के दिन गए। अब तो एक दूसरे को दिलासे देकर ही दिन काटने हैं।''

दोनों दोस्तों की बातों में हिस्सा लेते हुए सुंदरी ने कहा - ''मनोज अमेरिका से नहीं आ पा रहा है, क्योंकि इस समय अमेरिका छोड़ने पर उसे ग्रीनकार्ड मिलने में दिक्कत हो सकती है। अब आप ही बताइये, क्या यही है हमारे प्यार का प्रतिफल।'' किशन ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा - ''आपको याद है जब मनोज को इंजीनियरिंग कालेज में प्रवेश दिलाया था। मैं किस तरह तीन हफ्ते तक उसे लेकर या अकेले इधर-उधार भटकता रहा था। कालेज के प्रवेश के लिए मेरे पास पैसे ही नहीं थे और तुम्हारे पास मैं राशि लेने आया था। तुमने तो मदद की थी, लेकिन वह मैं जानता हूँ कि तुमसे पैसे माँगने में मुझे कितनी वेदना हुई थी। उस वक्त मनोज के लिये मैं कुछ भी करने को तैयार था।'' यह कहते हुए किशनलाल अपनी आँखों से बह निकली अश्रुधारा को पोंछने लगे।

जयराम यह सुनकर कुछ क्षण चुप रहे, फिर अपने मित्र के हाथों को सहलाते हुए अपनी स्वाभाविक कड़कदार आवाज़ को सप्रयास नरम करते हुए बोले - ''हाँ मुझे अच्छी तरह याद है। मुझे यह भी याद है कि इतनी भागदौड़ के बाद जब गवर्नमेंट कालेज में प्रवेश मिला, तो तुम कितने खुश हुए थे। मिठाई का डिब्बा लेकर मेरे घर दौड़ आए थे। उस समय तुम्हारे चेहरे पर प्रसन्नता के जो अद्वितीय भाव थे, उन्हें देखकर ऐसा लगता था मानो तुम्हें अपनी परेशानियों का मुआवज़ा मिल गया हो। क्या तुम्हें वह खुशी याद नहीं है? कमरे में कुछ देर तक खामोशी छायी रही। नर्स ने एक बार झाँककर कमरे में देखा, शायद वह कमरे में छायी खामोशी के खौफ़ से अंदर नहीं आई थी।

जयराम ने फिर पीछे बैठी सुंदरी को देखा और कहने लगा - ''भाभी मैंने आपको और किशन सेठ को सबसे ज़्यादा खुश तब देखा है, जब मनोज छोटा था। तब आपके पास पैसे तो नहीं थे, लेकिन खुशियों का भंडार था। शायद पैसों और खुशियों का तालमेल प्राय: नहीं हो पाता है। वह खुशी आपके पास कहाँ से आती थी? मनोज के पास से ही ना?''

किशनलाल ने करवट बदली और मित्र की ओर चेहरा कर पलंग पर लेटा रहा। जयराम स्टूल दूर कर इस तरह बैठ गया, जिससे किशन और सुंदरी दोनों से मुखातिब हो सके। फिर ठुड्डी पर हाथ रखकर, पाँव आगे रखकर कहने लगा - ''यार एक बात बताओ, क्या हमारे बच्चों ने हमसे आकर कहा था कि आप हमें जन्म दों?''

हमने उन्हें अपनी खुशियों के लिए ही जन्म दिया था। बच्चे तो अपने साथ खुशियों का खज़ाना लेकर आते हैं माँ-बाप को देने के लिए। मनोज के जन्म पर आप कितने खुश थे। हमारी मीनू जब पैदा हुई तब हम भी बहुत उत्साहित थे। नन्हीं मीनू की ख़्वाहिशें पूरी करने में मुझे अपार प्रसन्नता मिलती थी।'' जयराम की बात सुनकर किशनलाल गहरे सोच में डूब गए। उन्हें याद आ रहा था, जाने-माने चित्रकार विन्सेन्ट वेनगी की जीवनी 'लस्ट फार लाइफ' में एक जगह कहा गया है -
''प्यार का आनंद प्यार करने में हैं, प्यार पाने में नहीं। हम जब अपने बच्चों को प्यार देते हैं, उनकी तकलीफ़ों को दूर कर उन्हें खुश देखते हैं, तो अपनी ज़िंदगी की अनमोल खुशियाँ हासिल करते हैं। हमारे बच्चों ने हमारे घर जन्म लेकर, हमें प्यार करने का सुख देकर, हमें काफी कुछ दे दिया है। उससे अधिक कीमती प्रतिफल हमें क्या मिल सकता है मेरे दोस्त?'' ऐसे कहते हुए जयराम अपने दोनों हाथों से दोस्त के हाथ अपने हाथों में लेकर थपकियाँ देने लगा।

जयराम के चेहरे पर मुस्कान थी। उसके चेहरे पर आ रहे आँसू रुक गए थे। कहा नहीं जा सकता, रुके हुए आँसू दुख के थे या खुशी के, या फिर अपनी बेटी मीनू की याद के, जो विवाह के पश्चात किसी और नगर में बस गई थी।

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१६ नवंबर २००१