लोकल ट्रेन में उस समय सुचरिता ने नया-नया ही जाना शुरू किया था। महानगर में उसको रहते और नौकरी करते कुछ महीने हो गए थे, फिर भी सुचरिता अपने चतुर्दिक परिवेश से अछूती थी। घर एवं ऑफिस के निरापद और भद्र परिवेश के अंदर रहकर दुनिया के प्रतियोगितापूर्ण धक्कों के बारे में वह अनभिज्ञ थी।

इतनी भीड़, प्रत्येक स्टेशन पर गाड़ी एक निर्दिष्ट समय के लिए रुकेगी, यह सभी जानते, पर एक साथ चढ़ने की होड़ लग जाती। इसके कारण धक्का मुक्की होती, शरीर-से-शरीर घिसता, ऊपर से किसी तरह डिब्बे के अंदर घुसने के बाद भी मुक्ति नहीं। बैठने के लिए जगह मिलने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती। सभ्यता से खड़े होने के लिए जगह नहीं मिलती। धक्का-मुक्की के बीच शरीर-से-शरीर सटाकर खड़े हुए पुरुष और महिलाएँ, उस पर जिस रॉड को पकड़कर वह खड़ी होती, उसे पकड़कर खड़े किसी पुरुष का हाथ उससे छू जाता, तो वह बिना कारण संकुचित हो जाती इतनी बड़ी ट्रेन में इतने सारे डिब्बे। सभी में कमोबेश वही एक बात।

एक दिन डिब्बे में चढ़कर ठीक ढँग से खड़े होने के लिए जगह न पाकर वह बेचैनी महसूस कर रही थी कि एक युवक भीड़ को चीरकर उसके पास पहुँचकर बोला, "आइए, यहाँ-एक सीट खाली है, बैठ जाइए।"
सुचरिता ने युवक के चेहरे को देखा।

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दया का यह अवतार कहाँ से उतरकर उसकी सहायता के लिए पहुँच गया, और मतलब क्या हो सकता है-

सीधे उसके चेहरे को देखकर भी उसका मतलब क्या है, इसका आभास उसे मिला नहीं। एकदम पड़ोस में रहनेवाले लड़के-सा चेहरा। साधारण वेशभूषा, पर दोनों आँखें बात करती हुई-सी, और अद्भुत रूप से संवेदना से परिपूर्ण। उस पहली मुलाकात के समय ही सुचरिता को लगा था, कभी उसके मुँह से जो बात न निकल पाएगी, तो आँखों से वही बात वह कह देगा।

आँखों की भाषा समझने पर भी सुचरिता ने चेहरा घुमा लिया। किसी की दया, अनुकंपा की ओर उसने कभी ताका ही नहीं।

पर, उसके बाद एक असंभावित घटना घटी। झट से उसका हाथ पकड़कर, एक तरह से खींचकर, ले जाकर एक सीट पर उसने बैठा दिया और धीमे स्वर में शासन करने की अंदाज में बोला, "पाँच दिन हो गए, देख रहा हूँ, बैठने के लिए एक जगह तो बना नहीं पाती हैं, और ऊपर से भीड़ में आराम से खड़ी भी नहीं हो पा रही हैं, तो फिर घर से बाहर कदम क्यों रखती हैं?

उसका इस तरह का बुजुर्गाना व्यवहार उसे बिच्छू के डंक की तरह लगा। पता नहीं कैसे उसने समझ लिया और तुरंत ही उठकर उसके कंधों को दोनों हाथों से दबाकर उसे उठने न देकर वह बोला, "नाराज हो गयी क्या, दीदी, नाराज होइए, पर
मैं भी तो कुछ झूठ नहीं बोला हूँ।"

"दीदी, सुचरिता चौंक गयी। सुदर्शन की उम्र के एक व्यक्ति का उसे दीदी संबोधन। पर उसी दशा में रहने के लिए उसे ज्यादा समय नहीं मिल पाया। अपनी जगह पर उसे बैठा देने के कारण चारों तरफ से दूसरे लोग तुरंत चिल्लाने लगे, "हाँ, हाँ अमर, तुम यह क्या कर रहे हो बोलो, अब खड़े होकर क्या तुम बाकी रास्ता तय कर पाओगे-

सम्मिलित प्रतिवाद को एक ही वाक्य में शांत कर देने के लिए अमर नामक यह व्यक्ति बोला, "इस तरह खड़े रहने से बहुत आराम मिल रहा है मुझे। एक जगह बैठे-बैठे पुतला-सा बन गया था।"

सुचरिता के सामने बैठी एक वयस्क भद्र महिला ने खिसककर अमर को अपने पास बैठा लिया। बोली, "हाँ तुम्हें तो जरूर आराम मिल रहा होगा, पर तुम्हें इस तरह खड़े देखकर हमें बहुत तकलीफ हो रही है।"

अमर उसके बाद सुचरिता की तरफ देखकर अपनी बोलती आँखों को घुमाकर हँसते हुए बोला, "देखा न दीदी, दोगे तो पाओगे भी। आप को जगह दी नहीं कि मैं भी बैठने के लिए जगह पा गया।"

अमर आता सुचरिता से पहले किसी एक स्टेशन से और उसकी मंजिल थी, सुचारिता की मंजिल से काफी आगे। उसे जगह देने के बाद के दिनों में सुचरिता ने देखा कि उसके स्टेशन में गाड़ी रुकने पर अमर द्वार के पास खड़ा रहता और उसके डिब्बे में घुसते ही उसके लिए सुरक्षित सीट तक रास्ता दिखाता ले चलता। बहुत बार ऐसा भी होता भीड़ को ठे
लकर सुचरिता डिब्बे में चढ़ नहीं पाती, तो वह हाथ बढ़ा देता और सुचरिता अनायास ही उसका हाथ पकड़कर चढ़ जाती।

फिर भी सुचरिता अमर के साथ सहज नहीं हो पाती थी और वह कुछ बोले न बोले, अमर उसके बारे में अपना व्यक्तव्य बिना रुके कह देता।

उसके बाद अचानक एक दिन सुचरिता का मुँह खुला। अपनी कोशिश से नहीं। अमर ने ही कोशिश करके उसका मुँह खुलवाया। सब दिन की तरह उस दिन भी अमर उसके लिए सीट रखकर, उसके स्टेशन आने के समय, द्वार पर खड़ा इंतजार कर रहा था। उसका हाथ पकड़कर उसके लिए रखी हुई सीट तक ले गया। न जाने कैसे हमेशा ही खिड़की के पास वाली सुविधाजनक सीट ही वह रखता था। वह शायद ट्रेन जहाँ से चलती थी, उसी स्टेशन से चढ़ता होगा। सुचरिता ने उससे पूछा नहीं था। उस दिन कुछ व्यक्तिक्रम भी नहीं हुआ था। उस दिन अमर उसके सामने की सीट में बैठ गया।

हर दिन की तरह सुचरिता ने अपने लिए रखी गयी सीट पर बैठकर बैग को कंधे से उतारकर गोद में रख लिया और खिड़की से बाहर देखने लगी। ट्रेन के चलते ही बाहर की दुनिया को अपनी विपरित दिशा में जाते देखने के लिए।

अमर ने कुछ देर उसके चेहरे को देखने के बाद पुकारा, "दीदी, सुचरिता ने अमर की ओर देखा। उसकी पुकार में उसे चिर-परिचित आनंद की जगह विषाद घुला हुआ-सा लगा। चेहरे को देखकर सुचरिता समझ गयी, सब दिन का सरस चेहरा उ
दास है। सुचरिता उसे देख रही है, देखकर उसने उसी स्वर में पूछा, "क्या मेरा चेहरा बहुत असुंदर है-
इस प्रश्न का अर्थ न समझ पाकर सुचरिता उसके सौम्य-सरल चेहरे को केवल देखती रही।

अमर के पास बैठी भद्र महिला बोली, "तुम्हारा चेहरा सुंदर है, यह बात तुम खुद जानते हो अमर-और यह बात भी जानते हो कि तुम्हारे चेहरे को जो एक बार देखता है, वह बार-बार देखना चाहता है।"

सबको चौंकाते हुए सुचरिता खूब जोर से हँस दी, "मैं नहीं देखूँगी तो क्या आपका सुंदर चेहरा असुंदर हो जाएगा?

"ना-ना आप कहकर संबोधित मत करिए। बहुत मान देने का आभास हो रहा है।" उसी तरह छोटे बच्चों-सा ठुनककर अमर ने कहा।

"अब बाहर के पेड़-पौधे, पानी-पवन, आकाश को न देखकर तुम्हारे सुंदर मुख को देखकर बैठूँगी। पर मेरे सामनेवाली सीट में तुम्हें बैठना होगा। पीछे या आजू-बाजू दोनों तरफ तो भगवान ने मुझे आँखें दी नहीं हैं।" सुचरिता ने जवाब दिया।

इसी बात से ही बातचीत की धारा अनवरत बहने लगी थी। हर एक दिन बीतने के साथ ही अमर के और निकटतर होकर
उसके स्वभाव और चरित्र के बारे में ज्यादा, और ज्यादा परिचय पाती जा रही थी।

सुचरिता सोचती, अमर नहीं होता तो वह यात्रा शायद असह्य हो जाती। इस डिब्बे में यात्रा करनेवाले सभी लोगों के लिए ट्रेन की तरह अमर भी एक परिहार्य अंग हो गया था।

पर एक दिन वही अमर दिखायी नहीं पड़ा। दूसरों को पता नहीं कैसा क्या महसूस हुआ होगा, पर अपने स्टेशन पर गाड़ी के रुकते ही निर्दिष्ट द्वार के पास अमर का हँसता हुआ चेहरा और बढ़े हुए हाथ को न देखकर, सुचरिता की सारी खुशी मुरझा गयी। डिब्बे के अंदर घुसने के बाद उसके लिए मोना दीदी ने सीट रखी है कहकर पुकारा, तो उसने सीधे वहीं जाकर बैठने से पहले चारों तरफ एक बार नजर फिरायी।

पर अमर नहीं था। मन उदास हो गया, फिर भी कुछ व्यक्तिगत सुविधा-असुविधा को सकती है, सोचकर सुचरिता दूसरे दिन का इंतजार करने लगी। पर दूसरे दिन भी अमर नहीं आया और उसके दूसरे दिन भी... घर से निकलते समय सुचरिता सोचती, आज अमर जरूर आया होगा। इतने दिन तक न आने का कोई कारण नहीं हो सकता। पर चौथे दिन भी अमर को न देखकर सुचरिता और चुप नहीं रह सकी। अमर के साथ हमेशा रहने वाले विनय से पूछा, "इतने दिन हो गए, अमर नहीं आ रहा है, क्या हुआ उसे?
चौंकते हुए विनय ने पूछा, "क्या आप अमर के बारे में नहीं जानतीं?

सुचरिता का सीना धक-धक करने लगा। मन में कई तरह के अशुभ विचार आने लगे। जबकि अब तक उसने अमर के बारे में किसी भी तरह के अशुभ की कल्पना ही नहीं की थी। अपने में ही मगन रहकर इन कुछ दिनों में उसने दूसरों के चेहरे की तरफ ध्यान ही नहीं दिया था। पर अब देखा, तो पाया, सबके चेहरे से किसी ने हँसी को पोंछ लिया है। विषाद के एक आवरण ने चेहरे को ढक रखा है।

सुचरिता की प्रश्न पूछती आँखों के उत्तर में विनायक ने कहा, "अमर शायद अब और कभी भी हमारे साथ यात्रा नहीं कर सकेगा। ल्यूकोमिया के लास्ट स्टेज में अस्पताल में भर्ती है, डॉक्टर ने कहा है एक्यूट है और . . . ."सुचरिता आगे और कुछ नहीं सुन सकी। ऑफिस में वह कुछ भी काम नहीं कर पायी थी। घर पहुँचकर सुदर्शन का साहचर्य भी उसके मन में कोई भावांतर सृष्टि नहीं कर पाया था। बस एक ही सोच घूम रही थी, "अमर मरने जा रहा है।"

सुचरिता की चाय ठंडी हो रही थी फिर भी उसको पीने का कोई उपक्रम करते न देककर सुदर्शन ने अपनी चाय के कप को रखकर उसकी पीठ में स्नेह का स्पर्श देकर पूछा, "क्या हुआ सुचरिता। मुझे बताओ।"

ठंडी हवा के स्पर्श से जमा हुआ बादल पिघल गया। सुचरिता की आँखों से धार-धार आँसू झरने लगे। उसी रुदन के बीच में वह बस इतना कह सकी, "वह अमर है न, मरनेवाला है।"

यह बात समझ से परे होने के बावजूद सुदर्शन ने समझने का भाव लिये, प्यार से पत्नी को सीने से लगाकर, धीरे-धीरे केवल सिर सहला दिया, कहा कुछ नहीं।

सुचरिता ने कुछ आश्वस्ति महसूस की। कुछ न जानते हुए भी सुदर्शन समझ गया है, सब-कुछ।

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९ जुलाई २००२