"इस मुल्क का कुछ नहीं होगा-न ट्रेन वक्त पर आएगी न प्लेन टाइम पर टेक-ऑफ करेगा।" मेरे दोस्त ने यह बात तल्ख लहज़े में कही और बेंच से उठ कर प्लेटफॉर्म पर निरुद्देश्य घूमने लगा। मैं स्टेशन मास्टर के पास गया। उस ने मुझे तसल्ली दी कि ज़्यादा घबराने की जरूरत नहीं है। गाड़ी आते ही हमें टी-टी, से बात करनी चाहिये। अगर उस के पास कोई बर्थ खाली होगी तो वह बर्थ हमें ही मिलेगी।

जिस प्रकार कोई मुर्गी चोंच में दाना ले कर चूज़े के पास जाती है उसी प्रकार मैं यह शुभ सूचना ले कर अपने दोस्त के पास गया। सुन कर उसे कोई प्रसन्नता नहीं हुई। उस के चेहरे पर उस की खास मुस्कुराहट एक बार फिर मेरा मज़ाक उड़ाने लगी, स्कूल मास्टर से ले कर स्टेशन मास्टर तक सब झूठी तालीम और झूठी तसल्ली देते हैं। इस मुल्क का कुछ नहीं होगा।

मेरा यह दोस्त कश्मीर का प्रसिद्ध और जाना-माना बुद्धिजीवी था, जो मानव मूल्यों के विषय में हुई एक ऑल इंडिया कौन्फ्रेंस में भाग लेने दिल्ली आया था। दो दिन की यह कौन्फ्रेंस कल शाम को ही संपन्न हुई थी। आज सवेरे वह होटल छोड़ कर मेरे यहाँ आया था और सारा दिन मुझे अर्पित किया था। सब से पहले हम इंडियन एयर लाइंस के दफ्तर गए थे। वहाँ उस ने रिक्वेस्ट कर टिकट वापस करके "रिटर्न एयर फेअर" के रुपये जेब में डाले थे। वहाँ से हम करोलबाग गए थे जहाँ से उस ने बीवी-बच्चों के लिए कपड़े और कुछ दूसरा सामान खरीदा था। करोलबाग से आ कर उस ने मेरे घर पर मेरे साथ कश्मीरी खाना खाया था और मेरी पत्नी के पकाने की बहुत तारीफ की थी। मेरे बच्चों के साथ भी वह खूब खेला था और इस बात के लिए सिर्फ उन्हें ही नहीं, मुझे और मेरी पत्नी को भी शाबाशी दी थी कि इतने बरस दिल्ली में रहने के बावजूद हम और बच्चे कश्मीरी ही बोलते हैं। खाना खाने और फिर नमकीन गुलाबी चाय पीने के बाद हमारे बीच कई मसलों पर बहस छिड़ी थी। उस की बातों से लगता था कि उसे हर व्यक्ति और हर विचार से नफरत है, मगर वैसी ही नफरत जैसी एक बाप को अपने प्यारे बेटे से उस की बदकारी देख कर होती है, या फिर किसी आज्ञाकारी और श्रद्धालु बेटे के मन में अपने पिता का कोई नीच कार्य देख कर पैदा होती है। उसका मानना था कि बुनियादी तौर पर आदमी कुत्ते से ज्यादा ज़लील और भालू से अधिक वहशी है। उस की राय में वह दिन कायनात का सब से तारीक दिन था जिस दिन चार टाँगों वाले जीव ने दो टाँगों पर चलना सीखा था और इस तरह अपनी जात को उबार कर बाकी मखलूकात को डुबो दिया था। यह सब कहने के बाद उसने आह भरी थी, "इस दुनिया का कुछ नहीं होगा।

चार बजे के आस-पास मेरी पत्नी ने उस की फरमाइश पर कश्मीरी कहवा बनाया था। कहवा पी कर हम ने और भी बहुत सारे अदबी, इलमी, आलमी और आफाकी मसले धुने थे। सवा सात बजे वह और मैं टैक्सी से स्टेशन की ओर चल पड़े थे और इस समय सवा नौ बज रहे थे।

प्लेटफॉर्म नंबर दो से एक गाड़ी जाने कहाँ के लिए निकल पड़ी। प्लेटफॉर्म तीन पर कोई गाड़ी जाने किधर से आई। लेकिन खाली पटरी लिए प्लेटफॉर्म नंबर एक पुणे से आने वाली उस गाड़ी की प्रतीक्षा करते-करते थक गया था जिससे मेरे दोस्त को जम्मू जाना था। मैंने दाएँ-बाएँ दोनों ओर दूर तक नज़र डाली। खाली पटरी पर जल्दी गाड़ी आने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता था। लेकिन मेरे खाली दिमाग में जल्द ही यह सवाल आया कि क्या दोस्त को उस की किस्मत के भरोसे छोड़ना मेरे लिए और हमारी दोस्ती के लिए अच्छा रहेगा-नहीं, मुझे गाड़ी के आने और फिर उस के चले जाने तक इंतज़ार करना होगा। गाड़ी के आने और चले जाने के बीच के समय में मित्र के सोने के लिए बर्थ का कोई न कोई इंतज़ाम भी करना होगा। उसे खुशी-खुशी विदा करने के बाद ही खुद घर वापस जाने की चिन्ता करनी होगी।

ठीक है दस बजे के बाद कोई बस नहीं मिलेगी, पर थ्री-व्हीलर तो मिल जाएगा। तभी यथार्थ की सुध आने से मेरा उत्साह ठंडा पड़ गया। स्टेशन से मेरे घर तक थ्री-व्हीलर का किराया दस-पन्द्रह रुपये से कम क्या होगा-मगर मेरी जेब में पाँच रुपये का एक और अकेला नोट था-आधी रात को घर पहुँच कर पत्नी को जगाना और उससे थ्री-व्हीलर वाले को देने के लिए रुपये माँगना, मेरी समझ में ही नहीं आया कि मैं इस नई समस्या से कैसे निपटूँ-जब मेरी पत्नी की नींद टूटेगी, बल्कि तोड़ी जाएगी, तब वह मेरी हड्डी-पसली तोड़ने में कौन-सी कसर बाकी रखेगी-पूछेगी कि यह कौन-सा चहेता भाई-बहनोई आया था जिस के लिए तुमने पूरा दिन और आधी रात बर्बाद की-अपने बच्चों का पेट काट कर रोगनजोश, मखनी शामी कबाब से उसका जहन्नुमी पेट भर दिया और तिस पर थ्री-व्हीलर के किराए के तौर पर जुर्माना भी अदा किया।

मैं ने अपनी पत्नी के अनचाहे मेहमान की ओर दृष्टि डाली। उस ने समय बिताने के लिए ईवनिंग न्यूज़ का पर्चा खरीदा था। उस के पास जा कर मैंने भी पर्चे पर नज़र डाली।

"पाँच करोड़? मेरे मुँह से चीख-सी निकल पड़ी। सुर्खी वाली खबर बड़ी सनसनीखेज़ थी। पाँच करोड़ रुपयों का एक बड़ा भारी स्कैन्डल नंगा हुआ था जिस में बड़े-बड़े लोगों के हाथ होने की संभावना थी।

"पाँच करोड़ पढ़ कर तुम्हारी लार इस तरह क्यों बहने लगी? आजकल करोड़ कोई बड़ी रकम नहीं होती।" उसने मेरी मूर्खता पर मुस्कुराते हुए कहा, "कुछ पता है, आए दिन होने वाले इन सेमिनारों, कॉन्फ्रेंसों, जश्नों पर कितने करोड़ खर्च होते होंगे-कितनी दौलत ज़ाया होती होगी-इस मुल्क का कुछ नहीं होगा।
"मतलब जिस कॉन्फ्रेंस के लिए तुम यहाँ आए थे, उस पर खर्च किया गया सारा पैसा भी असल में ज़ाया हुआ है? मैंने कहा।

"बिलकुल ज़ाया हुआ है। इतने लोगों के लिए फर्स्ट-क्लास या हवाई-जहाज़ से आने-जाने का इंतज़ाम किया गया। फाइव-स्टार होटलों में इन के कमरे बुक किए गए। लंच, डिनर, पार्टी, पिकनिक पर हज़ारों नहीं, लाखों रुपये उड़ाए गए। पहले बेमतलब की इन मजलिसों के बारे में फारसी में कहा जाता था , निशसतन, गुफतन, बरखासतन-मतलब बैठना, बातें करना और उठ कर चले जाना। मगर अब इन तीन तनों के साथ एक चौथा तन भी जुड़ गया है , खुरदन, यानी खाना-पीना।"
"इस मुल्क का कुछ नहीं होगा।" जाने कैसे इस बार उसका तकिया कलाम मेरे ही मुँह से निकल पड़ा।
"मुल्क का कुछ होगा या नहीं, मुझे फायदा ज़रूर हुआ।"
"कैसा फायदा?
"मुझे दस साल बाद अपने दोस्त से मिलने का मौका हासिल हुआ।"

उसने पहले मेरे कंधे पर हाथ रखा और फिर मुझे गले से लगाया। फिर मेरी कमर में हाथ डाल कर मुझे एक स्टॉल तक ले गया और दो ऑरेन्ज जूस का ऑर्डर दिया। कायदे और शराफत से पेमेन्ट मुझे ही करना चाहिये था, मगर मेरे पास सिर्फ पाँच रुपये का एक नोट था। मैं नज़र बचा कर माइक पर हो रहा एनाउंसमेन्ट सुनने और उसे समझने की कोशिश करने लगा। मेरा दोस्त जब पर्स निकालकर पेमेन्ट करने लगा तो मैंने तुरंत जेब में हाथ डाला। उस ने मेरा दाहिना हाथ पकड़ कर मेरे दूसरे हाथ में जूस का गिलास थमा दिया। ठंडा जूस पीते-पीते लज्जित चेहरे से पसीने की सर्द बूँदे बहने लगीं। और देखते-देखते अढ़ाई घंटे गुज़र गए। पूरे साढ़े दस बजे दाहिनी तरफ का सिग्नल डाउन हुआ। दूर पटरी के सिरे पर लाल बत्ती की जगह हरी बत्ती जली और कुछ देर बाद ही प्लेटफॉर्म को झकझोरती प्रागैतिहासिक काल के डायनासोर से भी भयानक रूप में गुर्राती रेल गाड़ी हमारे सामने पहुँच कर रुक गई। प्लेटफॉर्म पर सूटकेस लिए मर्दों, बच्चों के हाथ थामे औरतों और सिर पर सामान लादे कुलियों की भाग-दौड़ और धक्का-मुक्की शुरू हुई। न उतरने वाले भीतर जाने वालों को घुसने देते और नही घुसने वाले उतरने वालों को बाहर आने देते थे। यह पागलपन देख कर मेरा दोस्त हक्का-बक्का रह गया था। उसकी अनोखी मुस्कुराहट इस समय जैसे उस के होठों से गायब हो गई थी।

अचानक काला कोट पहने टी-टी, प्लेटफॉर्म पर खुमी की तरह फूट पड़ा और सामने वाले काउंटर के पीछे खड़ा हो गया। दर्जन भर यात्री सामने इकठ्ठे हो कर उसकी ओर टुकुर-टुकुर देखने लगे। लेकिन उसने उन पर कोई दया न दिखा कर बेरुखी से ऐलान किया कि किसी भी कंपार्टमेन्ट में सोने के लिए कोई बर्थ खाली नहीं है। मेरे दोस्त का चेहरा पीला पड़ गया लेकिन मैं बेशर्म बन कर टी-टी की तरफ बेचारगी से देखने लगा। वह सामने खड़े लोगों की अवहेलना करते हुए जाने किस अभिप्राय से इधर-उधर देख रहा था। लेकिन मेरी तरफ एक-दो बार उसने अजीब नज़रों से ज़रूर देखा था। या तो उसे मुझ पर और मुझसे ज़्यादा मेरे साथ चिपके मेरे दोस्त पर दया आई थी-या फिर उसने हमें तगड़ा आसामी समझा था। थोड़ी देर बाद जब उसके सामने खड़े व्यक्ति छँटने लगे तो उसने बिना किसी हिचक-झिझक के मुझसे बीस रुपये मांगे। मेरे दोस्त ने तुरंत दस-दस के दो नोट मेरे हाथ में दिए जो मैंने मुस्कुरा कर टी-टी साहब के हवाले किए। टी-टी ने भावहीन चेहरे से नोट जेब में रखे। मेरे दोस्त का पीला पड़ा चेहरा फिर से कश्मीरी सेब की-सी लालिमा-सा चमकने लगा। उसने मुस्कुराते हुए मुझसे कश्मीरी भाषा में कहा, "अब शैतान का पेट भर गया, मुझे बर्थ मिल गई और मेरा काम बन गया, अलबत्ता इस मुल्क का कुछ नहीं बनेगा।"

टी-टी ने पहले जैसे भावहीन चेहरे से मुझसे टिकट माँगा। मेरे दोस्त ने अपना टिकट मेरे हाथ में रखा जिसे मैंने टी-टी-के हवाले किया। उसने कंपार्टमेन्ट और बर्थ का नंबर लिख कर टिकट लौटाया। मेरे दोस्त ने अपना टिकट मेरे हाथ से छीन लिया और अपना कंपार्टमेन्ट खोजने दौड़ा। मैं भी उस के पीछे जाने लगा कि टी-टी-ने आवाज़ दी, "दूसरा टिकट कहाँ हैं?

"हम में से एक को ही जम्मू जाना है। जिसे जाना है वह अपना डिब्बा ढूँढ रहा है।" मैंने उसे असली बात बता दी।

बात सुनकर टी-टी-का चेहरा क्रोध से तन गया और मेरी ओर देख कर बोला, "मैं सेकेन्ड क्लास के एक बर्थ के सिर्फ दस रुपये लेता हूँ। न एक पैसा ज्यादा, न एक पैसा कम। यह मेरा उसूल है और मैं उसूल छोड़ कर बेईमानी नहीं करता।"

उसने जेब में हाथ डाला और नफरत से मेरी ओर देख कर दस का नोट मेरे हवाले कर दिया। मैंने नोट लिया और अपने दोस्त की तरफ नज़र डाली। वह झेलम एक्सप्रेस के डिब्बों के नंबर पढ़ कर अपना डिब्बा खोज रहा था। मैने इधर-उधर देख कर नोट चुपके से अंदर की जेब में डाल लिया। अब मेरे पास पन्द्रह रुपये थे। एक पाँच रुपये का नोट जो मैं घर से लाया था और दूसरा दस का नोट जो भगवान की कृपा से अभी-अभी मुझे यहीं मिला था। अब मैं बिना किसी परेशानी के थ्री-व्हीलर में आराम से अपने घर जा सकता था और घर से दस-बीस गज़ पहले ही किराया चुका कर थ्री-व्हीलर वाले की छुट्टी कर सकता था जिससे मेरी पत्नी को शक करने का मौका ही नहीं मिलता कि मैं बस से नहीं, थ्री-व्हीलर से घर लौटा हूँ।

मैंने एक बार फिर पटरी पर खड़ी रेलगाड़ी की ओर नज़र डाली। मेरा दोस्त अभी तक अपना डिब्बा पहचान नहीं सका था। दोस्ती और शराफत का तकाज़ा पूरा करने की नीयत से उसकी मदद करने के लिए मैं दौड़ कर उसके पास पहुँच गया।

पृष्ठ- . .

११ फरवरी २०१३