इसी दिसंबर की एक शाम को तफरीह-क्लब से वापस आते हुए मैं इरादतन अनारकली में से गुज़रा। उस समय मेरी जेब में दस रुपए का नोट था। आटा? दाल? ईंधन? बिजली बीमा कंपनी के बिल चुका देने पर मेरे पास वही दस का नोट बच रहा था...जेब में दाम हों तो अनारकली में से गुज़रना बुरा नहीं। उस समय अपने आप पर गुस्सा भी नहीं आता। बल्कि अपनी जात कुछ भली मालूम होती है। उस समय अनारकली में चारों तरफ सूट ही सूट नज़र आ रहे थे और साड़ियाँ...चंद साल से हर नत्थु ख़ैरा सूट पहनने लगा है। मैंने सुना है गुज़िश्ता चंद साल में कई टन सोना हमारे मुल्क से बाहर चला गया है। शायद इसीलिए लोग जिस्मानी शृंगार का ख़याल भी बहुत ज़्यादा रखते हैं। नए-नए सूट पहनना और खूब शान से रहना हमारी निर्धनता का स्पष्ट सुबूत है। वर्ना जो लोग सचमुच अमीर हैं? ऐसी शानो-शौकत और दिखावटी औपचारिकताओं की तनिक परवाह नहीं करते।

कपड़े की दूकान में वर्सटेड के थानों के थान खुले पड़े थे। उन्हें देखते हुए मैंने सोचा? 'क्या मैं इस महीने के बचे हुए दस रुपयों में से कोट का कपड़ा ख़रीदकर बीवी-बच्चों को भूखा मारूँ? लेकिन कुछ अर्से के बाद मेरे दिल में नए कोट के नापाक ख़याल का रद्दे अमल शुरू हुआ। मैं अपने पुराने गरम कोट का बटन पकड़कर उसे बल देने लगा। चूँकि तेज़-तेज़ चलने से मेरे जिस्म में हरारत आ गई थी? इसलिए मौसम की सर्दी और इस किस्म के बाह्य प्रभाव मेरे कोट ख़रीदने के इरादे को पूर्णता तक पहुँचाने में असमर्थ रहे। मुझे तो उस वक्त अपना वह कोट भी सरासर तकल्लुफ नज़र आने लगा।

ऐसा क्यों हुआ- मैंने कहा है कि जो व्यक्ति सच-मुच अमीर हों, वे दिखावटी शान की ज़रा भी फिक्र नहीं करते। जो लोग सचमुच अमीर हों उन्हें तो फटा हुआ कोट? बल्कि क़मीज भी तकल्लुफ में दाखिल समझनी चाहिए। तो क्या मैं सचमुच
अमीर था कि...? मैंने घबराकर वैयक्तिक विश्लेषण छोड़ दिया और बमुश्किल दस का नोट सही-सलामत लिए घर पहुँचा।
शमी, मेरी बीवी, मेरी प्रतीक्षा कर रही थी।

आटा, गूँधते हुए उसने आग फूँकनी शुरू कर दी...कमबख्त मंगल सिंह ने उस दफा लकड़ियाँ गीली भेजी थीं। आग जलने का नाम ही नहीं लेती थी। ज़्यादा फूँकें मारने से गीली लकड़ियों में से ज़्यादा धुआँ उठता। शमी की आँखें लाल अंगारा हो गईं। उनसे पानी बहने लगा।
"कमबख्त कहीं का...मंगल सिंह!" मैंने कहा- "इन पुरनम आँखों के लिए मंगल सिंह तो क्या मैं तमाम दुनिया से जंग करने पर आमादा हो जाऊँ..."
बहुत तगो-दो के बाद लकड़ियाँ आहिस्ता-आहिस्ता चटख़ने लगीं। आख़िर इन पुरनम आँखों के पानी ने मेरे गुस्से की आग बुझा दी...शमी ने मेरे शाने पर सिर रखा और मेरे फटे हुए गरम कोट में पतली-पतली उँगलियाँ दाख़िल करती हुई बोली-
"अब तो यह बिल्कुल काम का नहीं रहा।"
मैंने धीमी आवाज़ से कहा- "हाँ!
"सी दूँ!. . .यहाँ से..."
"सी दो। अगर कोई एक-आध तार निकालकर रफू कर दो तो क्या कहने हैं।"
कोट को उलटाते हुए शमी बोली- "अस्तर को तो मुई टिड्डियाँ चाट रही हैं...नकली रेशम का है ना...ये देखिये।"
मैंने शमी से अपना कोट छीन लिया और कहा- "मशीन के पास बैठने की बजाय तुम मेरे पास बैठो शमी...देखती नहीं हो दफ़्तर से आ रहा हूँ। यह काम तुम उस वक्त कर लेना जब मैं सो जाऊँ!
शमी मुस्कराने लगी।
शमी की वह मुस्कराहट और मेरा फटा हुआ कोट! शमी ने कोट को खुद ही एक तरफ़ रख दिया। बोली- "मैं खुद भी उस कोट की मरम्मत करते-करते थक गई हूँ..." उसे मरम्मत करने में इस गीले ईंधन को जलाने की तरह जान मारनी पड़ती है। आँखें दुखने लगती हैं-
"
आख़िर आप अपने कोट के लिए कपड़ा क्यों नहीं ख़रीदते!
मैं कुछ देर सोचता रहा।

यों तो मैं अपने कोट के लिए कपड़ा ख़रीदना गुनाह ख़याल करता था, मगर शमी की आँखें...उन आँखों को तकलीफ से बचाने के लिए मैं मंगल सिंह तो क्या तमाम दुनिया से जंग करने पर आमादा हो जाऊँ। वर्सटेड के थानों के थान ख़रीद लूँ। नए गरम कोट के लिए कपड़ा ख़रीदने का ख़याल दिल में पैदा हुआ ही था कि पुष्पामणि भागती हुई कहीं से आ गई, आते ही बरामदे में नाचने और गाने लगी। उसकी हरकत कथकली मुद्रा से ज़्यादा आह्लादकारी थी।

मुझे देखते हुए पुष्पामणि ने अपना नाच और गाना ख़त्म कर दिया। बोली, "बाबू जी, आप आ गए? आज बड़ी बहन जी ने कहा था, मेज़पोशी के लिए दुसूती लाना और गरम कपड़े पर काट सिखाई जाएगी। गुनिया माप के लिए और गरम कपड़ा..."
चूँकि इस समय मेरे गरम कोट ख़रीदने की बात हो रही थी, शमी ने ज़ोर से एक चपत उसके मुँह पर लगाई और बोली, "
इस जनमजली को हर समय कुछ न कुछ ख़रीदना ही होता है...मुश्किल से उन्हें कोट सिलवाने पर राज़ी कर रही हूँ..."

वह पुष्पामणि का रोना और मेरा नया कोट! मैंने ख़िलाफे आदत ऊँची आवाज़ से कहा, "शमी!
शमी काँप गईं। मैंने गुस्से से आँखें लाल करते हुए कहा, "मेरे इस कोट की मरम्मत कर दो...अभी...किसी तरह करो...ऐसे जैसे रो-पीटकर मंगल सिंह की गीली लकड़ियाँ जला लेती हो...तुम्हारी आँखें-हाँ, याद आया...देखो तो पुष्पामणि कैसे रो रही है। पोपी बेटा, इधर आओ ना, इधर आओ मेरी बच्ची, क्या कहा था तुमने, बोलो तो...दुसूती-गुनिया माप के लिए और काट सीखने को गरम कपड़ा, . . .बच्चू नन्हा भी तो ट्राइसिकल का राग आलापता और गुब्बारे के लिए मचलता सो गया होगा। उसे गुब्बारा न ले दोगी तो मेरा कोट सिल जाएगा ना, कितना रोया होगा बेचारा...शमी, कहाँ है बच्चू! बच्चू आ गए, आँधी और बारिश की तरह शोर मचाते हुए।

मैंने शमी को खुश करने के लिए नहीं बल्कि यों ही काफूरी रंग के मीनाकार कांटे सबसे पहले लिखे। अचानक रसोई की तरफ़ मेरी नज़र उठी , चूल्हे में लकड़ियाँ धड़-धड़ जल रही थीं और इधर शमी की आँखें भी दो चमकते हुए सितारों की तरह रौशन थीं। मालूम हुआ कि मंगल सिंह गीली लकड़ियाँ वापस ले गया है।
"वह शहतूत के डंडे जल रहे हैं और खोखा..." शमी ने कहा।
"और उपले!
"जी हाँ, उपले भी..."
"
मंगल सिंह देवता है...शायद मैं भी जल्दी ही गरम कोट के लिए अच्छा-सा वर्सटेड ख़रीद लूँ ताकि तुम्हारी आँखें यों ही चमकती रहें। इन्हें तकलीफ न हो...इस माह की तनख्वाह में तो गुंजाइश नहीं, अगले महीने ज़रूर...ज़रूर..."
"जी हाँ, जब सर्दी गुज़र जाएगी..."

पुष्पामणि ने कई चीज़ें लिखाईं। दुसूती, गुनिया माप के लिए, गरम ब्लेज़र सब्ज़ का रंग का एक गज, मुरब्बा, डी. एम.सी. के गोले, गोटे की मग़ज़ी... और इमरतियाँ और बहुत से गुलाबजामुन...। मुई ने सबकुछ ही तो लिखवा दिया। मुझे दाइमी क़ब्ज़ था। मैं चाहता था कि यूनानी दवाखाने से इत्रीफल जमानी का एक डिब्बा भी ला रखूँ। दूध के साथ थोड़ा-सा खाकर सो जाया करूँगा। मगर मुई पुष्पा ने उसके लिए गुंजाइश ही कहाँ रखी थी, और जब पुष्पामणि ने कहा, 'गुलाबजामुन'! तो उसके मुँह में पानी भर आया। मैंने कहा, सबसे ज़रूरी चीज़ तो यही है...शहर से वापस आने पर गुलाबजामुन वहाँ छुपा दूँगा, जहाँ सीढ़ियों में बाहर जमादार अपना दूध का कलसा रख दिया करता है और पुष्पा से कहूँगा कि मैं तो लाना ही भूल गया तुम्हारे लिए गुलाबजामुन...ओहो! उस वक्त उसके मुँह में पानी भर आएगा और
गुलाबजामुन न पाकर उसकी अजीब कैफियत होगी।

फिर मैंने सोचा, बच्चू भी तो सुबह से गुब्बारे और ट्राइसिकल के लिए ज़िद कर रहा था। मैंने एक मर्तबा अपने आपसे सवाल किया, "इत्रीफल ज़मानी! शमी बच्चू को पुचकारते हुए कह रही थी, "बच्चू बेटी को ट्राइसिकल ले दूँगी अगले महीने...बच्चू बेटी सारा दिन चलाया करेगी ट्राइसिकल...पोपी मुन्ना नहीं लेगा..."

"बच्चू चलाया करेगी और पोपी मुन्ना नहीं लेगा! और मैंने शमी की आँखों की कसम खाई कि जब तक ट्राइसिकल के लिए छे-सात रुपये जेब में न हों, मैं नीले गुंबद के बाज़ार से नहीं गुज़रूँगा। इसलिए कि दाम न होने की सूरत में नीले गुंबद के बाज़ार से गुज़रना बहुत बुरा है। ख्वामख्वाह अपने आप पर गुस्सा आएगा, अपनी ज़ात से नफरत पैदा होगी।
इस समय शमी बैलजियमी आईने की बैज़वी टुकड़ी के सामने अपने काफूरी सफेद सूट में खड़ी थी। मैं चुपके से उसके पीछे जा खड़ा हुआ और कहने लगा, "मैं बताऊँ तुम इस वक्त क्या सोच रही हो!
"बताओ तो जानूँ!
"तुम सोच रही हो, काफरी सफेद सूट के साथ वह काफरी रंग के मीनाकार कांटे पहनकर ज़िलेदार की बीवी के यहाँ जाऊँ तो दंग रह जाए।"

"नहीं तो," शमी ने हँसते हुए कहा, "आप मेरी आँखों से प्यार करते तो कभी का ग़र्म..."
मैंने शमी के मुँह पर हाथ रख दिया। मेरी तमाम खुशी बेबसी में बदल गई। मैंने आहिस्ता से कहा, "बस...इधर देखो...अगले महीने ज़रूर ख़रीद लूँगा..."
"जी हाँ, सब सर्दी..."
"फिर मैं अपनी उस हसीन दुनिया को, जिसकी तख़लीक़ पर, महज़ दस रुपए साथ होते थे? तसव्वुर में बसाए बाज़ार चला गया।
मेरे सिवा अनारकली से गुज़रनेवाले हर इज़्ज़तदार आदमी ने गरम सूट पहन रखा था। लाहौर के एक लहीम-शहीम जैंटिलमैन की गर्दन नेकटाई और मुकल्लफ कालर के सबब मेरे छोटे भाई के पालतू कुत्ते 'टाइगर' की गर्दन की तरह अकड़ी हुई थी। मैंने उन सूटों की तरफ देखते हुए कहा? "लोग सचमुच मुखल्लस हो गए हैं, इस महीने न मालूम कितना सोना-चाँदी हमारे मुल्क से बाहर चला गया है।" काँटों की दूकान पर मैंने कई जोड़ियाँ काँटे देखे। अपनी तख़य्युल की पुख्ताकारी से मैं शमी की काफूरी सफेद सूट में मलबूस जेहनी तस्वीर को काँटे पहनाकर पसंद या नापसंद कर लेता!
काफूरी सफेद सूट...काफूरी मीनाकार काँटे...व्हेराइटीज़ के कारण मैं एक भी चयन न कर सका।

उस समय बाज़ार में मुझे यज़दानी मिल गया। वह तफरीह-क्लब से, जिसका नाम दरअसल परेल क्लब था, पंद्रह रुपए जीतकर आया था। आज उसके चेहरे पर अगर सुर्ख़ी बशाशत की लहरें दिखाई देती थीं तो कुछ ताज्जुब की बात न थी। मैं एक हाथ से अपनी जेब की सलवटों को छुपाने लगा। निचली बाईं जेब पर एक रुपए के बराबर कोट से मिलते हुए रंग का पेबंद बहुत ही नामौज़ूं दिखाई दे रहा था...मैं उसे भी एक हाथ से छुपाता रहा। फिर मैंने दिल में कहा, क्या अजब, यज़दानी ने मेरे शाने पर हाथ रखने से पहले मेरी जेब की सलवटें और वह रुपए बराबर कोट के रंग का पेबंद देख लिया हो...उसका भी रद्दे-अमल शुरू हुआ और मैंने दिलेरी से कहा,
"मुझे क्या परवाह है...यज़दानी मुझे कौन-सी थैली बख्श देगा...और इसमें बात ही क्या है? यज़दानी और संतासिंह ने बारहा मुझसे कहा है कि वह उच्च विचार की ज़्यादा परवा करते हैं और वर्सटेड की कम। मुझसे कोई पूछे। मैं वर्सटेड की ज़्यादा परवा करता हूँ और रिफ्ते-ज़ेहनी की कम,
यज़दानी रुखसत हुआ और जब तक वह नज़र से ओझल न हो गया? मैं ग़ौर से उसके कोट के नफीस वर्सटेड को पुश्त
की जानिब से देखता रहा।

फिर मैंने सोचा कि सबसे पहले मुझे पुष्पामणि के गुलाबजामुन और इमरतियाँ ख़रीदनी चाहिए। कहीं वापसी पर सचमुच भूल ही न जाऊँ। घर पहुँचकर उन्हें छुपाने से खूब तमाशा रहेगा। मिठाई की दूकान पर खौलते तेल में कचौरियाँ ख़ूब फूल रही थीं। मेरे मुँह में पानी भर आया। इस तरह, जैसे गुलाबजामुन के तख़य्युल से पुष्पामणि के मुँह में पानी भर आया था। कब्ज़ और इत्रीफल ज़मानी के ख़याल के बावजूद मैं सफेद पत्थर की मेज़ पर कोहनियाँ टिकाकर बहुत रुचि से कचौरियाँ खाने लगा। हाथ धोने के बाद जब पैसों के लिए जेब टटोली तो उसमें कुछ भी न था। दस का नोट कहीं गिर गया था।

कोट की अंदरूनी जेब में एक बड़ा सूराख़ हो रहा था। नक़ली रेशम को टिड्डियाँ चाट गई थीं। जेब में हाथ डालने पर उस जगह जहाँ मरानजा-मरानजा एंड कंपनी का लेबिल लगा हुआ था? मेरा हाथ बाहर निकल आया। नोट वहीं से बाहर गिर गया होगा।
एक लम्हे में यों दिखाई देने लगा? जैसे कोई भोली-सी भेड़ अपनी खूबसूरत? मुलायम-सी ऊन उतर जाने पर दिखाई देने लगती है।
हलवाई भाँप गया। खुद ही बोला? "कोई बात नहीं बाबू जी? पैसे कल आ जाएँगे।"
मैं कुछ न बोला...कुछ बोल ही न सका।

सिर्फ कृतज्ञता-ज्ञापन के लिए मैंने हलवाई की तरफ़ देखा। हलवाई के पास ही गुलाबजामुन चाशनी में डूबे पड़े थे। रोगन में फूलती हुई कचौरियों के धुएँ में से आतशी सुर्ख़ इमरतियाँ जिगर पर दाग़ लगा रही थीं। और जेहन में पुष्पामणि की धुँधली-सी तस्वीर फिर गई।

मैं वहाँ से बादामी बाग़ की तरफ़ चल दिया और आध-पौन घंटे के क़रीब बादामी बाग़ के रेलवे लाइन के साथ-साथ चलता रहा। इस अर्से में जंक्शन की तरफ से एक मालगाड़ी आई। उसके पाँच मिनट बाद एक शंट करता हुआ इंजन? जिसमें से दहकते हुए सुर्ख़ कोयले लाइन पर गिर रहे थे...मगर उस समय क़रीब ही की साल्ट रिफाइनरी में से बहुत से मज़दूर ओवर टाइम लगाकर लौट रहे थे...मैं लाइन के साथ-साथ दरिया के पुल की तरफ़ चल दिया। चाँदनी रात में सर्दी के बावजूद कॉलेज के चंद मनचले नौजवान किश्ती चला रहे थे।

"कुदरत ने अजीब सज़ा दी है मुझे," मैंने कहा? "पुष्पामणि के लिए गोटे की मग़ज़ी? दुसूती? गुलाबजामुन और शमी के लिए काफूरी मीनाकार काँटे ख़रीदने से बढ़कर कोई गुनाह सरज़द हो सकता है? किस बेरहमी और बेदर्दी से मेरी एक हसीन मगर बहुत सस्ती दुनिया बरबाद कर दी गई है। जी तो चाहता है कि मैं भी कुदरत का एक शाहकार तोड़-फोड़कर रख हूँ..." मगर पानी में किश्तीरां लड़का कह रहा था? "इस मौसम में तो रावी का पानी घुटने-घुटने से ज़्यादा कहीं नहीं
होता।"

"सारा पानी तो ऊपर से अपर बारी दोआब ले लेती है। और यों भी आजकल पहाड़ों पर बर्फ नहीं पिघलती।" दूसरे ने कहा।
मैं लाचार घर की तरफ़ लौटा और निहायत बेदिली से ज़ंजीर हिलाई।
मेरी ख्वाहिश और अंदाज़े के मुताबिक पुष्पामणि और बच्चू नन्हा बहुत देर हुई दहलीज़ से उठकर बिस्तरों में जा सोए थे। शमी चूल्हे के पास शहतूत के नीम-जान कोयलों को तापती हुई कई मर्तबा ऊँघी और कई मर्तबा चौंकी थी। वह मुझे ख़ाली हाथ देखकर ठिठक गई। उसके सामने मैंने चोर जेब के अंदर हाथ डाला और लेबिल के नीचे से निकाल लिया। शमी सबकुछ समझ गई। वह कुछ न बोली...कुछ बोल ही न सकी।

मैंने कोट खूँटी पर लटका दिया। मेरे पास ही दीवार का सहारा लेकर शमी बैठ गई और हम दोनों सोए हुए बच्चों और खूँटी पर लटके हुए ग़र्म कोट को देखने लगे।
अगर शमी ने मेरा इंतज़ार किए बगैर वह काफूरी सूट बदल दिया होता तो शायद मेरी हालत इतनी बदली हुई न होती।

यज़दानी और संतासिंह तफरीह-क्लब में परेल खेल रहे थे। उन्होंने दो-दो घूँट पी भी रखी थी। मुझसे भी पीने के लिए इसरार करने लगे। मगर मैंने इनकार कर दिया। इसलिए कि मेरी जेब में दाम न थे। संतासिंह ने अपनी तरफ़ से एक-आध घूँट ज़बर्दस्ती मुझे भी पिला दिया। शायद इसलिए कि वह जान गए थे कि इसके पास पैसे नहीं हैं। या शायद इसलिए कि वह उच्चविचार की वर्सटेड से ज़्यादा परवा करते थे।

अगर मैं घर में उस दिन शमी को वही काफूरी सफेद सूट पहने हुए देखकर न आता तो शायद परेल में क़िस्मत आज़माई करने को मेरा जी भी न चाहता। मैंने सोचा? काश? मेरी जेब में भी एक-दो रुपए होते...क्या अजब था कि मैं बहुत-से रुपए बना लेता...मगर मेरी जेब में तो कुल पौने चार आने थे।
यज़दानी और संतासिंह निहायत उम्दा वर्सटेड के सूट पहने क्लब के सेक्रेटरी से झगड़ रहे थे। नेक आलम कह रहा था कि वह तफरीह-क्लब को परेल क्लब और 'बार' बनते हुए कभी नहीं देख सकता। उस समय मैंने एक मायूस आदमी के मख़सूस अंदाज़ में जेब में हाथ डाला और कहा? "बीवी-बच्चों के लिए कुछ ख़रीदना कुदरत के नज़दीक गुनाह है। इस
हिसाब से परेल खेलने के लिए तो उसे अपनी गिरह से दाम देने चाहिए-ही ही...गी...गी..."

अंदरूनी खीसा...बाईं निचली जेब...कोट में पुश्त की तरफ मुझे काग़ज़ सरकता हुआ मालूम हुआ। उसे सरकाते हुए मैंने दाईं जेब के सूराख़ के नज़दीक जा निकाला।
. . .वह दस रुपए का नोट था जो उस दिन अंदरूनी जेब की तह के सूराख़ में से गुज़रकर कोट के अंदर-ही-अंदर गुम हो गया था।

उस दिन मैंने कुदरत से इंतकाम लिया। मैं इसकी ख्वाहिश के मुताबिक परेल-वरेल न खेला। नोट को मुठ्ठी में दबाए घर की तरफ़ भागा। अगर उस दिन मेरा इंतज़ार किए बग़ैर शमी ने वह काफूरी सूट बदल दिया होता तो मैं खुशी से यों दीवाना कभी न होता।

हाँ? फिर चलने लगा वही तख़य्युल का दौर। गोया एक हसीन से हसीन दुनिया की तख़लीक में दस रुपए से ऊपर एक दमड़ी भी खर्च नहीं आती। जब मैं बहुत-सी चीज़ों की फेहरिस्त बना रहा था? शमी ने मेरे हाथ से काग़ज़ छीनकर पुर्ज़े-पुर्ज़े कर दिया और बोली? "इतने किले मत बनाइए...फिर नोट को नज़र लग जाएगी।"
"शमी ठीक कहती है।" मैंने सोचते हुए कहा? "न तख़य्युल इतना रंगीन हो और न महरूमी से इतना दुख पहुँचे।"

फिर मैंने कहा? "एक बात है शमी, मुझे डर है कि नोट फिर कहीं मुझसे गुम न हो जाए...तुम्हारी खेमो पड़ोसन बाज़ार जा रही है? उसके साथ जाकर तुम यह सब चीज़ें खुद ही ख़रीद लाओ...काफूरी मीनाकारी काँटे . . डी.एम.सी. के गोले? मग़ज़ी...और देखो? पोपी, मुन्ना के लिए गुलाबजामुन ज़रूर लाना...ज़रूर..."
शमी ने खेमों के साथ जाना मंजूर कर लिया और उस शाम शमी ने कश्मीरे का एक वह सूट पहना जो उसे दहेज़ में माँ-बाप ने दिया था।
बच्चों के शोर-गुल से मेरी तबीयत बहुत घबराती है? मगर उस दिन मैं देर तक बच्चू नन्हें को उसकी माँ की ग़ैरहाज़िरी में बहलाता रहा। रसोई में इंधन की कोलकी? गुसलख़ाने? नीम छत पर...सब जगह उसे ढूँढ़ता फिरा। मैंने उसे पुचकारते हुए कहा? "ट्राइसिकल लेने गई है...नहीं जाने दो? ट्राइसिकल गंदी चीज़ होती है? आख़थू...गुब्बारा लाएगी बीबी तुम्हारे
लिए? बहुत खूबसूरत ग़ुब्बारा..."

बच्चू बेटी ने मेरे सामने थूक दिया। बोलीं? "ऐ...ई...गंदी..."
मैंने कहा? "कोई देखे तो...कैसा बेटियों-जैसा बेटा है।"
पुष्पामणि को भी मैंने गोद में ले लिया और कहा? "पोपी मुन्ना? आज गुलाबजामुन जी भरकर खाएगा ना!
सके मुँह में पानी भर आया। वह गोदी से उतर पड़ी और बोली? "ऐसा मालूम होता है जैसे एक बड़ा-सा गुलाबजामुन खा रही हूँ।"

बच्चू रोता रहा। पुष्पामणि कथकली मुद्रा से ज़्यादा हसीन नाच बरामदे में नाचती रही।
मुझे मेरे तख़य्युल की परवाज़ से कौन रोक सकता था। कहीं मेरे तख़य्युल के किले ज़मीन पर न आ रहें? इसी डर से तो मैंने शमी को बाज़ार भेजा था। मैं सोच रहा था? शमी अब घोड़े अस्पताल के करीब पहुँच चुकी होगी...अब कॉलेज रोड़ की नुक्कड़ पर होगी...अब गंदे इंजन के पास...
और एक निहायत धीमी आवाज़ से ज़ंजीर हिली।
शमी सचमुच आ गई थी? दरवाज़े पर।
शमी अंदर आते हुए बोली? "मैंने दो रुपए खेमों से उधार लेकर भी ख़र्च कर डाले थे।"
"कोई बात नहीं," मैंने कहा।
फिर बच्चू? पोपी मुन्ना और मैं तीनों शमी के आगे-पीछे घूमने लगे।
मगर शमी के हाथ में एक बंडल के सिवा कुछ न था। उसने मेज़ पर बंडल खोला ? वह मेरे कोट के लिए बहुत नफीस वर्सटेड था।
पुष्पामणि ने कहा? "बीबी? मेरे गुलाबजामुन..."
शमी ने ज़ोर से एक चपत उसके मुँह पर लगा दी!

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१६ दिसंबर २००५