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भारत में इस रिज़र्वेशन पद्धति को कार्यान्वित करना काफ़ी मुश्किल है क्योंकि सत्तर प्रतिशत यात्री बिना टिकट ही होते हैं। वे एक टोली में आकर स्लीपर पर चढ़ते हैं और बर्थ पर कब्ज़ा कर लेते हैं। आप उनसे कुछ कह नहीं सकते। हर डिब्बे में एक-एक सशस्त्र पुलिस होने पर भी इनको नियंत्रित करना मुश्किल होता है।

आजकल निजामुद्दीन से कोंकण से होकर घर के निकट पहुँचने वाली गाड़ी का नाम मंगला एक्स्प्रेस है। पहले कभी उम्मीद नहीं थी कि कोई ऐसी गाड़ी शुरू हो जाएगी। हालाँकि नयी दिल्ली से रवाना होने वाली जी.टी. वाली शान इसमें नहीं। इसमें क्या किसी भी और गाड़ी में नहीं। जी.टी. में चलने वाले यात्री भी अलग थे। बुद्धिजीवी लोग दिल्ली से बुद्धिजीवियों भरे डिब्बे केरल या दक्षिण के विभिन्न शहरों को जाते। उस समय निज़ामुद्दीन स्टेशन से चढ़ने वाले यात्री इक्के दुक्के ही होते। आप बात करना चाहें तो पूछने पर ही वे जवाब देते थे नहीं तो नहीं। एक बार बात करते फिर चुप हो जाते। लोगों में मशहूर था- वे यात्रा पर ध्यान देते हैं, अपने साथ लाई गई किताब को पढ़ने में ध्यान देते हैं, साथ यात्रा करने वालों पर नहीं। सच मानिए दिल्ली से यात्रा करने वाले ग़ज़ब के सलीकेदार होते हैं। ज़्यादातर आत्मकेंद्रित। कुछ पूछो तो वे पहले लोगों को आँकते हैं। जवाब देने से यदि उनको कोई फ़ायदा न हो तो वे जवाब नहीं देते। वे ऐसे बैठे रहते मानो उन्होंने कुछ सुना ही नहीं। पर वह समय और था।

वह टू टायर कोच में चढ़ गया। एक बर्थ पर बैठ कर दूसरे यात्रियों के आने का इंतज़ार करता बैठा रहा। थोड़ी देर बाद एक बूढ़ा और एक बूढ़ी आए। वह चौंक गया क्योंकि बूढ़ी दिन में भी टार्च की सहायता से बर्थ का नंबर ढूँढ़ रही थी। नंबर प्लेट के पास तक टॉर्च जलाकर बूढ़ी ने नंबर ढूँढ़ा।
"नौ, दस, ये दोनों हैं" बूढ़े ने बर्थ की ओर इशारा करते हुए कहा। बूढ़ी बर्थ पर लेट गई। उनके हाथ काँप रहे थे। बीच-बीच में होंठ पलट जाते। ज़ोर से दबाकर वह अपना होंठ ठीक करती थी। बीच-बीच में आवाज़ भी करती। वह सोचने लगा, पता नहीं ये लोग कहाँ जा रहे हैं। उसे ये सह-यात्री पसंद नहीं आए। पर अब तो झेलना ही पड़ेगा। इसी कोच में कितनी ही बार शराबियों और झगड़ालुओं के साथ उसने यात्रा की है, बूढ़ा और बूढ़ी से उतना तंग तो नहीं होगा।

बूढ़ा सामने वाली बर्थ पर बैठ गया। वे दोनों खादी के सफ़ेद वस्त्र पहने थे। रिटायर्ड भाषा-अध्यापकों की वेशभूषा। रेलगाड़ी चलने लगी। स्टेशन पर विदा करने आए लोगों की संख्या ज़्यादा नहीं थी और निजामुद्दीन स्टेशन भी उतना लंबा नहीं कि हज़ारों हाथ देर तक हिलते दिखते रहें। रेलगाड़ी स्टेशन से जल्दी ही बाहर निकल आई। दोनों ओर छोटे-छोटे मकान हैं। इन घरों का पिछला भाग रेल की पटरियों की ओर है, और सामने का भाग सड़क की ओर। जल्दी ही टिकट कंडक्टर भी आ गया। वह सबके टिकट जाँचते हुए हर किसी को उसकी बर्थ पर स्थित करने लगा।
''यूवर्स द अप्पर बर्थ,'' टिकट कंडक्टर ने उस नौजवान से कहा। फिर भी नौजवान उठा नहीं, वहीं बैठा रहा। उसको लगा होगा कि शायद इस नीचे वाली बर्थ का यात्री बहुत देर बाद ही चढ़ेगा।
पर बूढ़ी टिकट कंडक्टर के आते ही उठ गई। बैग से छोटा-सा रेलवे पास निकालकर दिखाया। टिकट कंडक्टर अभी युवक ही था उसने बूढ़ी के पैर छूकर नमस्कार किया। वह पास स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को दिया गया विशेष रेलवे पास था। बूढ़े के जूते में चार जेबें थीं। उसने चारों जेबों को टटोला। अंत में पास ऊपर की जेब से मिला। उनके पास भी स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों का रेलवे पास था। टिकट कंडक्टर ने बूढ़े को भी पैर छूकर नमस्कार किया। वह स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति आदर भाव प्रकट करना चाहता होगा।
"दोनों वृद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से बात करते-करते समय कट सकता है। बीते ज़माने के बारे में बिलकुल सही जानकारी मिल सकती है।" यह सोचते हुए उसने वृद्ध दंपत्तियों को बार-बार देखा।
''सर क्या आप केरल तक जा रहे हैं?'' मैंने अंग्रेज़ी में पूछा।
''नहीं इस बार तो नहीं, पर हाँ एक समय था, जब मैं दो महीने में एक बार वहाँ ज़रूर जाता था। उस समय मेरे दोस्त बैरिस्टर पिल्लै जीवित थे। क्या आप मिस्टर पिल्लै को जानते हैं? वे मेरे साथ यरवदा जेल में थे।'' उन्होंने अंग्रेज़ी में ही जवाब दिया।
हमारी कुछ और बात अंग्रेज़ी में हुई फिर मैंने पूछा, "क्या आप हिंदी बोलते हैं?"
"हाँ हाँ क्यों नहीं! बी.ए. में वह मेरी दूसरी भाषा थी।" और वे हुलस कर धाराप्रवाह हिंदी बोलने लगे।
''आपको कितने साल जेल में रहना पड़ा?'' मैंने पूछा।
''उत्तर भारत की जेल में चार साल और पोर्ट ब्लेयर सेल्यूलर जेल में दो साल।''
''सेल्यूलर जेल, क्या वह आजीवन कारावास था?''
''चार साल की कैद के बाद मुझे रिहा कर दिया गया था। फिर मैं सीधा पठानकोट चला गया। वहाँ मैं फिर से बागियों के साथ मिल गया और अमृतसर पठानकोट एक्सप्रेस को पटरी से उतारने के लिए फिश प्लेट हटाने के जुर्म में पकड़ा गया। इस समय मुझे सेल्यूलर जेल भेज दिया गया।''
''आप पर आरोप क्या लगाया गया?''
''हम लोग पटियाला राजा की हिंदू प्रजा थे। मैं पटियाला के किंग महेंद्र कॉलेज में इंग्लिश लिटरेचर एम.ए. अंतिम वर्ष का छात्र था। अचानक राष्ट्रभाषा की चाह मुझे हुई। कोट, टाई, पैंटस, अंग्रेज़ी किताब सब कुछ कॉलेज के सामने जला डाला और राष्ट्रभाषा की क्लास में भर्ती हुआ। फिर ''भारत छोड़ो'' आंदोलन में भाग लिया।''

बूढ़ी अभी तक चुप थी। उसे लगा कि वह हिंदी भाषी नहीं है। शायद कोई दूसरी भाषा बोलती होगी उसने सोचा। फिर भी बात करने के लिए उसने बूढ़ी से पूछा, ''क्या आप हिंदी बोलती हैं या अंग्रेज़ी?''
''दोनों ही, मैंने एम.ए.अंग्रेज़ी साहित्य में किया था और फर्स्ट डिवीजन में पास भी हुई पर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण अंग्रेज़ी सरकार ने मेरी डिग्री ज‍़ब्त कर ली। मैं हिंदी में बात करना पसंद करती हूँ। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है हमें हिंदी बोलनी चाहिए।'' फिर बूढ़ी भी हिंदी में बात करने लगी।

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