'नगर को सर्वोच्च स्वच्छता पुरस्कार' शीर्षक के नीचे फोटो देखा उसने। प्रधानमंत्री के हाथों से अवार्ड लेती हुई एक महिला। वह बहुत खूबसूरत है। उस का मुख मुस्कुराहट से चमक रहा है। वो है... नगरपालिका की अध्यक्ष।
''लेकिन उस दिन हमें देखते ही किस तरह तेवर चढ़ा लिए थे उसने। किस तरह नफ़रत प्रदर्शित की थी? वातानुकूलित कमरे से बाहर आने के दस मिनट के भीतर ही पसीना पसीना होकर, झटपट खिसक ली थी।''
नगर के पूरे १५०० सफ़ाई कर्मचारी मिलकर एक दोपहर जब उस से अपनी बीमा सुविधा और भविष्य निधि के बारे में पूछने गए तो बहुत लापरवाही से उसने कह दिया कि वो सब सुविधाएँ दिन में काम करनेवालों के लिए हैं और रात में काम करने वालों के लिए लागू नहीं होतीं।

उसकी इन बातों से नाराज़ होकर सभी झाडू हवा में उठे। इस गंदी शिष्टता को साफ़ करने की इच्छा हरेक झाडू में जागी। झाडू नारे बन गये। माँ के पल्लू की तरह नगर की सड़कों को साफ़ रखने के बाद भी कृपा न करनेवाले अफ़सर पर झाडू रोष बन कर उठे,  लेकिन झाडू का वह आग्रह कूडेदान में घुस गया।
सुजाता ने उस अखबार के टुकड़े को दोहराया और फेंक दिया।

कोई आदमी दारू पीकर सड़क पर फिर रहा है वह एकदम कै करता है। उसने पास में साफ़ करनेवाली सफ़ाई कर्मचारी श्यामला का पल्लू पकड़ा और अपनी ओर खींचा। श्यामला ने चीखते हुई उसे ढकेल दिया। सब लोग दौड़ कर वहाँ पहुँचे। तब झाडू एक अस्त्र बन गया। झाडू की मार से शराबी होश में आया और भाग गया।

सुजाता दिल खोलकर हँसी, कुछ क्षण के लिए। सड़क के किनारे खड़े जंग लगे हुए पोस्ट बाक्स के बाजू से कराह उठ रही है। एक ११-१२ वर्ष का बच्चा शीत से सिहरता सो रहा है। वह फटी हुई जाँघिया और मैली बनियान पहने पतले कंबल में सिमट रहा है। सड़क के उस पार एक बड़ा सा पोस्टर है - बाल-श्रमिक के विरुद्ध सरकार की चेतावनी।
सुजाता का मन बिलख गया। ऐसे ही देखती रह गई। गाँव में अपने भाई की याद आई।
''अरे, इस शहर में ये सब मामूली बातें हैं। चिंता मत करो। मन में लेती तो, काम नहीं कर पाओगी। चलो, चलो...झाडू मारो।'' कहा सरोजिनी ने।
सुजाता का मन बहल गया। सन्नाटे से बातचीत हुई।
''झाडू मारो... चाय का प्यालों को, जो सपने की तरह टूटते हैं¸ झाडू मारो। बिरियानी हड्डी को जिसपर फफूँद उगती है, झाडू मारो। प्रवासी जीवन को जो ईख के गूदा जैसा है।'' हाथ में झाडू फिर कोई अनजाना क्रोध उबल रहा है। ऊँची आवाज़ में एक ऐंबुलेन्स सड़क पर आती देख सुजाता पीछे हटी। एंबुलेन्स को देखते ही उसे अपने बाप की याद आई। उनकी तबीयत का ख़याल आया। दवा ले रहे हैं या नहीं। फिर झाडू लगाने लगी। एक पुलिस जीप इतनी तेज़ी से चली गई कि मानो किसी बात का निषेध कर रही है।

सामने आठ मंज़िलों वाले भवन पर 'भल्लुकास गोल्ड एंपोरियम' का भारी होर्डिंग दिखता है। उस पर सोने के गहनों से लदी सिने तारिकाएँ दिखाई गई हैं। उन्हें देखते ही सुजाता को अपने गाँव में हुई एक चोरी याद आई। ऐसा लगा कि माँ के गहने और बाकी गाँव वालों के गहने जैसे इन्हीं लोगों ने लूट लिए हों।
उस भवन को देखती ही रह गई। इतने में एक विमान थोड़ा नीचे से, भारी आवाज़ करता हुआ निकल गया। विमान को देखते ही श्रावणी की याद आई। अपने गाँव के ठाकुर की बेटी थी वह। बचपन में सुजाता की सहपाठी। अमेरिका में शादी तय हुई और परदेस चली कुछ ही दिनों बाद विमान में उसकी लाश आई। तब से जब भी विमान को देखती है तो श्रावणी की याद आती है। यादें पथरीले टुकड़े बनकर बरसती हैं।
''बेटी लगता है तुम काम नहीं कर पाओगी। जाओ, घर जाकर अपने मर्द के साथ सोजा। जाओ।'' एक सफ़ाई कर्मचारी ने मज़ाक किया।
सुजाता ने फिर से झाडू लगाना शुरू कर दिया। चार बज रहे हैं। वाहन सड़क पर आने लगे हैं। ठंडी हवा भी बहने लगी है।

हवा बहने से, बारिश होने से सफ़ाई कर्मचारियों को डर लगता है- अब तक जो सड़कें साफ़ हुई थीं थे, वे सब फिर गंदी हो जाएँगी। ठेकेदार आकर तब तक गालियाँ देता रहता है जब तक वे फिर झाड़ने न लगें। इसी तरह दिवाली के बाद चार पाँच दिन झाड़ने पर भी कचरा नहीं निकलेगा। हाथ पाँव में दर्द होता है। ठेकेदार अतिरिक्त पैसे नहीं देता, बोलता है कि दुकानदारों से माँग लेना। हवा ज़ोर से बहने लगी। सुजाता डर गई।

हवा का ज़ोर बढ़ रहा है। उसका रुख़ सुजाता की और है। अब तक साफ़ किया गया सारा कचरा एकदम हवा में उठ गया है। सब सफ़ाई कर्मचारी हताश होकर खड़ी रह गई हैं।

अचानक मज़हबी मार-धार की तरह बवंडर फैल शुरू हो गया। लगभग बीस मिनट तक...उछालती हवा तेज़ी से बहती रही। सब सफ़ाई कर्मचारी सड़क के किनारे खड़ी चुपचाप देखती रह गई। कुछ देर के बाद हवा शांत हो गयी। सभी के चेहरे पर आशंका। अब तक साफ़ किया गया कचरा फिर सड़क पर आ गया। सुजाता शक्तिहीन हो गई।

ठेकेदार की जीप आ रही है। सब लोग काँपने लगे। अब दुबारा झाड़ने को वह ज़रूर कहेगा।
बरसात के दिनों मे ऐसा ही होता है। सारी सड़क साफ़ करने के बाद बारिश होती है और साफ़ किया गया सारी कचरा फिर से सड़कों पर जमा हो जाता है। दुबारा झाड़ना पड़ता है। गरमी के मौसम में तो ऐसे बवंडर सदा सताते हैं। ठेकेदार की जीप रुकने पर सब सफ़ाई कर्मचारी उस के पास चली गई।
''क्या फिर बवंडर आया है? ठीक है, फिर से साफ़ कर देना। सुनो आज दस बजे विश्व बैंक के प्रतिनिधि हमारे शहर आ रहे हैं। आप लोगों को पता होगा कि हमारा नगर चार बार स्वच्छता पुरस्कार हासिल कर चुका है। विश्व बैंक के प्रतिनिधियों के आने के समय सड़क पर कचरा मिला तो मैं अपना ठेका खो बैठूँगा। तुम सब लोगों की नौकरी छूट जाएगी समझो।''

चेतावनी देकर ठेकेदार वहाँ से चला गया। उनमें से किसी को पूरी बात नहीं समझ में नहीं आई। बस इतना ही समझ में आया कि कुछ बड़े लोग आ रहे हैं और फिर से झाड़ना होगा। वे खड़ी हुईं और फिर से झाड़ू लगाने में जुट गईं।
''अरे गाडियाँ निकल रही हैं, ठेकेदार फिर आएगा। ले झाडू पकड़।'' एक सफ़ाईवाली ने सुजाता से कहा।
सुजाता ने झाडू उठाई। मन भारी हो गया। झाडू हिलती नहीं। कमर दर्द की खबर दे रही है। हाथ पाँव ठिठुरते हैं। फिर भी झाड़ना है। जिन बादलों पर विश्वास करती हैं, वे धोखा देते हैं। जिस हवा को सांस समझती है वह भी जान लेती है। घिरता हुआ अंधेरा सपनों को फांसी देता है।

रोशनी से भय। सुबह होने के पहले ही झाड़ना है नहीं तो काम से... झाडू की तीली की तरह... निकाल देंगे। भय से वह फिर झाड़ने लग जाती है।

* * *

सुबह होते ही सुजाता घर पहुँची। उसका पति और बेटा अब तक जागे नहीं। 'बच गई' कहकर प्लास्टिक के कटोरा में नल से पानी ले आई। घिरती नींद को दूर करती हुई, बरतन साफ़ करने लगी। खाना पकाया।
बेटा जागा तो उसे दूध पिला दिया। मर्द उठकर काम के लिए तैयार हो गया और खाना डिब्बे में लेकर चला गया। सुजाता ने हाथ मुख धोया और कुछ खाया। उसे पता नहीं चला कि वह कब सो गई। लगभग दोपहर एक बजे उठी। बच्चा खेल रहा था। झोंपड़ी जैसे घर के एक कोने में पुराना काला सफ़ेद टी.वी. है। सुजाता ने टी.वी. चालू किया। समाचार प्रसारित हो रहे हैं। दृश्य तो ठीक तरह नहीं दिखाई दे रहा, लेकिन सड़क पर झाड़ने वालों का चित्र धुँधला दिखने पर भी ध्यान से उसी की तरफ़ देखने लगी।

पहले आधी रात में महिला सफ़ाई कर्मचारियों के सड़क झाड़ने का दृश्य, उस के बाद कुछ गोरे आदमी..., उन से बातचीत करती नगरपालिका अध्यक्ष...एक बड़े कमरे में चर्चाएँ। पार्श्व स्वर में उद्घोषिका का स्वर - ''नगर को और साफ़ रखने के लिए जर्मनी से हाई-टेक वैक्युअम क्लीनर मँगवाए जा रहे हैं। विश्व बैंक तीस करोड़ रुपए का ॠण देने को तैयार है। यह हाई-टेक वैक्युअम क्लीनर प्रति घंटा आठ किलोमीटर की सफ़ाई करता है। आँधी, बारिश होने पर भी कचरे को अपने आप लोड करता है।'' फिर उस यंत्र को दिखाने लगे।
उसे देखते ही सुजाता काँप गई।

वह मशीन बिलकुल वैसी ही है कि गाँव में खेत में धान काटने वाली हार्वेस्टर थी। जैसी खेत में उतरी धान रोपने वाली राईस ट्रान्सप्लांटर थी। उस मशीन के कारण ही पक्षी, केकड़े, साँप आदि खेत से भाग गए थे। और उसी के कारण इन लोगों को खेती का काम छोड़कर पेट भरने के लिए शहर आना पड़ा था।

लेकिन हाई-टेक वैक्युअम क्लीनर इन सभी मशीनों भयंकर है। सुजाता ने काँपते हुई कोने से झाडू उठाई। झाडू अब एक आयुध है। चारों तरफ़ देखा सुजाता ने। लेकिन शत्रु दिखा नहीं। बच्चा रोने लगा। बेबस होकर नीचे बैठ गई। बच्चे को गोद में लिया और दूध पिलाने लगी। लेकिन बच्चा रोता ही रहा।

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२७ अक्तूबर २००८