चाचा ने अपनी लंबी ठोड़ी पसारते हुए मुस्कुरा कर कहा था, ''कोई बात नहीं- हमेशा तो रहेगा नहीं यह कष्ट? तेरे इम्तिहान तो ख़त्म होने ही वाले हैं। छात्रवृत्ति पाने के बाद तू हरिपुर हाई स्कूल के होस्टल में रह कर पढ़ेगा। बड़ा ऑफ़िसर बनेगा भविष्य में। हमारे वंश का नाम उजागर करेगा...।''
विधान के रुँधे हुए स्वर में कहा था, ''लेकिन चाचा! मुझे कंधे पर ढोते-ढोते तुम्हारे दोनों पैरों में छाले पड़ने का बहुत दुख है मेरे मन में।''
''दुख क्यों हैं रे पगले! बड़ी नौकरी करने पर क्या मुझे एक जोड़ी चप्पल नहीं ख़रीद देगा?'' चाचा ने कहा था।
चकित उल्लास में विधान ने पूछा था, ''चप्पलें ख़रीद देने से तुम चप्पलें तो पहनोगे चाचा?''
''क्यों नहीं पहनूँगा रे? निकम्मा होने के कारण किसी और के पैसों की चप्पलें पहनने से भला कौन हँसेगा?'' चाचा ने आत्मविश्वास के साथ कहा था।

विधान को छात्रवृत्ति मिली थी। छोटे-से गाँव के और भी छोटे बाज़ार में तहलका मच गया कि महांति परिवार के बच्चे को छात्रवृत्ति मिली है। पिता जी की मालिश करते-करते नाऊ ने पूछा, ''मालिक, सुना है आप के भतीजे को छात्रवृत्ति मिली है? कुछ भी हो, मालिक के वंश का नाम रौशन हो गया।''
पिता जी ने एक ब्रह्म तमाचा जड़ दिया नाऊ के गाल में। आँखें लाल करते हुए कहा था, ''क्यों बे स्साले- आज तक नहीं जान सका कि विधान मेरा बेटा है, कहता है भतीजा... जा, बाज़ार में घूम-घूम कर कहना कि मेरे भतीजे को नहीं, बेटे विधान को छात्रवृत्ति मिली है...।''

पिता जी ने दस रुपए बख़्शीश दिए थे नाऊ को। नाऊ ने दाँत निपोरते हुए कहा था, ''छोटे मालिक कंधे पर बिठा कर हरिपुर ले जाया करते थे, इसीलिए समझा भतीजा है।''
''तो क्या हो गया? बेटे और भतीजे में फ़र्क ही क्या है? क्या भतीजे को कंधे पर बिठा कर नहीं ले जा सकते? मुझे फ़ुर्सत ही कहाँ?'' पिता जी ने गुस्से में कहा था।

चाचा ने जब सुना बहुत हँसे थे। कहा था, ''विधान को जन्म देने के बाद शोर मच गया कि भाभी बस जाने वाली हैं। भैया ने खुद मेरी बीवी को बुला कर कहा, आज से यह लड़का पहले तुम्हारा है। बाकी सब का बाद में। इस की माँ के बचने की कोई उम्मीद नहीं। और आज जब विधान को छात्रवृत्ति मिली है तो कहते हैं विधान उनका बेटा है! खुशकिस्मती से भाभी बच गई। किंतु भैया की बात मानें तो विधान मेरा पहले है, बाकी लोगों का बाद में।''

पिताजी के जाने के काफी दिनों बाद तक चाचा नाऊ का ब्रह्म तमाचा याद करके मुस्कुराते। फिर लंबी साँस छोड़ते कि ''विधान कितना मेहनती था। मन लगा कर पढ़ाई की। बड़ा अफसर बना। हज़ारों रुपए कमाए। भैया कुछ देख नहीं पाए।'' सचमुच विधानबाबू के पिता बावनघाटी इलाके में चल बसे। उस समय विधानबाबू की उम्र तेरह या चौदह साल थी। उस के बाद उन्होंने अपनी निष्ठा और बुद्धि के बल पर पढ़ाई की और नाम कमाया। ऊँचे ओहदों पर रहे। लेकिन क्या यह कहा जा सकता है कि चाचा ने कुछ नहीं किया? यह सच है कि विधानबाबू को छात्रवृत्ति मिली थी। पर क्या सिर्फ़ उतने में ही उनका गुज़ारा हो गया। चाचा गाँव से चिउड़ा, चावल, लाई, गुड़, नारियल, घी, बड़ियाँ ले कर उसके पास आया करते थे। विधानबाबू मेस बना कर रहते थे। नौकरी पाने के बाद भी चाचा ने चावल बंद नहीं किया था। विधानबाबू चाचा को मानते थे। चाचा के साँस रोग के लिए च्यवनप्राश, विटामिन के साथ-साथ मिठाई और फल गाँव भेजा करते। चाचा उतने से ही खुश हो जाते। आशीर्वचन उड़ेल देते बाबू पर।

देखते-देखते विधानबाबू बूढ़े हो गए, चाचा थुलथुल बूढ़े। अब शहर नहीं जा पाते। बेटे-बहू से जितनी सेवा-सुश्रुषा मिलनी चाहिए नहीं मिल पाती। रोज़-रोज़ कौन पूछता है बूढ़ों को! विधानबाबू भी नौकरी के दौरान बीवी-बच्चों के साथ आज कटक तो कल कोरापुट में तैनात रहते, बूढ़ा-बूढ़ी को साथ ले कर कितनी जगह घूमेंगे? चाचा-चाची भी गाँव छोड़ कर हमेशा के लिए शहर नहीं आएँगे। भला उन्हें शहर अच्छा लगेगा? आज कल चाचा चल-फिर नहीं सकते। चाची उन्हें ढो रही थीं। साँस रोग बढ़ गया था। शरीर कमज़ोर- उम्र काफ़ी- पका आम। विधानबाबू भी दायित्व-जंजाल छोड़ कर गाँव में महीना-पंद्रह दिन नहीं रह पाते। मिठाई वगैरह ले कर गाँव जाते हैं। दूसरे दिन लौट आते हैं। पिछली बार चाचा की तबीयत उतनी अच्छी नहीं थी। पास-पड़ोस, बंधु-बांधव, अच्छी-अच्छी खाने की चीज़ें ले कर उन्हें देखने जाना शुरू कर दिया था। अर्थात इस बार ऊपर से बुलावा आने का वक़्त आ गया था। ख़बर पा कर विधानबाबू भी गए थे। कंदरपुर का एक हाँडी रसगुल्ला ले गए थे। चाचा को रसगुल्ला बहुत अच्छा लगता है। लेकिन चाचा के हिस्से के रसगुल्ले विधानबाबू को ही खाने पड़े थे। चित्रा चाचा के पास बैठ कर उन्हें रसगुल्ला खिलाने लगी। मुँह में रसगुल्ला लेने से पहले चाचा ने पूछा, ''विधान को रसगुल्ला दिया है ना?'' मानो विधानबाबू अब भी बच्चे हों! विधानबाबू की आँखें भर आईं।
''और किसी चीज़ की इच्छा हो तो मन खोल कर कह दो, भतीजा आया है। पैसों का अभाव नहीं। जो भी कहोगे कटक से ले आएँगे। गाड़ी से आए हैं चिंता क्या है?'' टोला-पड़ोस के लोग पूछ रहे बुढ़ऊ से।
चाचा की अंदर धँसी आँखों के कोनों से कीचड़ मिले आँसू निकल आए। काँपते स्वर में कहा, ''विधान मेरा भतीजा नहीं, बेटा है। मेरा बेटा, भाई का भी बेटा। बेटे के सिवा वह किसी का भतीजा हो ही नहीं सकता...''
''चलो ठीक है, वह तुम्हारा बेटा है यह हाट-बाज़ार में सभी लोगों को मालूम है। इसीलिए नाऊ ने भाई साहब से ब्रह्म तमाचा खाया था, याद नहीं?'' चाची ने कहा।

चाचा के चेहरे पर मुस्कान उभर आई। अतीत को याद करते हुए बोले, ''भैया ने भी बच्चों को मात दे दी थी उस दिन...''
''चलो- अब बताओ। क्या है तुम्हारी इच्छा?'' किसी ने पूछा।
''इच्छा? हाँ बहुत दिनों से एक इच्छा थी, एक जोड़ी चप्पल पहनने की। भैया जैसा मैं नहीं बन सकता। पर उनकी तरह एक जोड़ी चप्पल पहन कर चलना चाहता था। विधान ने कहा था। बचपन की बात है। शायद भूल गया। वरना क्या वह मामूली चप्पलें नहीं ख़रीद सकता था? अब क्या करूँगा? पैर फूल कर इतने मोटे हो चुके हैं, अब चप्पल नहीं घुसेगी... संभव हे सूजन कम हो जाए... वैद्य ने तो कहा है...''
चाचा की बातें सुन कर विधानबाबू का मन भीतर से करोर गया। सचमुच वे चाचा के पूरे जीवनकाल में उनके लिए एक जोड़ी मामूली चप्पल तर नहीं ख़रीद सके।

विधानबाबू ग्लानि से उदास हो उठे। ऐसा नहीं था कि वे चप्पल ख़रीदने की बात भूल गए थे, भला कैसे भूलते? चाचा के कंधे पर बैठ कर परीक्षा देने जाने की बात- छात्रवृति पाने की बात भला कैसे भूल सकते थे? लेकिन उन्होंने कभी सोचा तक नहीं था कि चप्पल पहनने की अभिलाषा उनके मन में लगातार बनी रही। सोचा था, चाचा ने बच्चे का दिल बहलाने के लिए ऐसा कहा होगा। यदि चाचा के मन में सचमुच ऐसी कोई अभिलाषा थी तो चाचा ने कम से कम विधानबाबू या चित्रा को याद क्यों नहीं दिलाई? चाची तो खुल कर बातें करती हैं- गरम चादर, दवाइयाँ, छाता जो भी चाहिए याद दिलाया है, पर... संभवतः संकोच कर गईं। शायद इसलिए कि विधानबाबू बेटा नहीं भतीजा है? क्या बेटा होते तो माँगा होता उन्होंने? विधानबाबू ने भी सोचा था एक-दो बार चाचा को चप्पल ख़रीद देंगे। फिर सोचा, चाचा चप्पल पहन कर जाएँगे कहाँ? क्या सचमुच पहनेंगे? कहीं सब की तरह विधानबाबू ने भी तो यह नहीं मान लिया कि चाचा जैसे निकम्मे आदमी को चप्पल नहीं पहननी चाहिए! वादा करके चप्पल न ख़रीदना क्या इस बात का सबूत नहीं हे कि विधानबाबू ने भी चाचा को पिता जी से नीचे ही रखा? मन मार कर विधानबाबू लौट आए। किंतु उसी दिन चाचा के लिए एक जोड़ी चप्पल भी ख़रीद लाए। ईश्वर चाहेंगे तो पैरों की सूजन कम हो जाएगी। कम से कम एक बार तो चप्पलें डाल ही लेंगे चाचा पैरों में।

चाचा के पैरों में सूजन सचमुच कम हो गई थी। चाचा खुश हो रहे थे अपने झुर्रीदार पैरों को देख कर। विधानबाबू को चाचा के पैरों में चप्पलें पहनाते देख शरारती नाती-नतनी खिलखिला कर हँसने लगे। उनमें से किसी ने कहा, ''दादा जी बेंत ले कर कचहरी जो जाएँगे...''
गनीमत थी चाचा को ठीक से सुनाई नहीं देता। किंतु औरतें होंठ दबा कर धीरे-धीरे मुस्कुरा रही थीं। किसी ने फुसफुसा कर कहा, ''मरते समय बुढ़ऊ को शौक चर्रा रहा है।''

विधानबाबू खुद को अपराधी समझने लगे। क्यों किया उन्होंने यह मज़ाक? खुद को ग्लानिमुक्त करने के लिए वे चप्पल ख़रीद कर लाए हैं, चाचा के पहनने के लिए नहीं, यह बात उन्हें खुद को नहीं, वहाँ उपस्थित सब को साफ़-साफ़ दिख रही थी। क्या ज़रूरत थी, मौत के मुँह में जाते चाचा के लिए चप्पल ख़रीद कर लाने की?

चाचा चल बसे। चप्पलों की जोड़ी वहीं रखी थी पैरों के पास। मरते दम तक कहते रहे, ''उन्हें वहीं रहने दो, मेरे विधान ने ख़रीदी है। शायद फिर उठ कर चलने लगूँ। काश विधान की ख़रीदी चप्पलें पहन कर चलने के लिए ही भगवान मुझे जीला दें!'' मरते समय बहुत बेचैन हो उठे थे जीने के लिए। विधानबाबू की ख़रीदी चप्पलों में इतनी शक्ति कहाँ थी कि वे चाचा की लौटती गाड़ी को रोक सकें?

चाचा के क्रियाकर्म के बाद विधानबाबू चाचा की वे चप्पलें सिर से लगा कर बगल में दबा कर वहाँ से ले आए, जिन्हें सिर्फ़ एक बार चाचा के पैरों का स्पर्श मिला था।
चौदह वर्ष के बाद लौट आने का वायदा भरत से किया था रामचंद्र ने। चाचा ने ऐसा कोई वायदा नहीं किया। लेकिन उदास गर्मियों में- धू-धू दुपहरी में जब धरती जल रही होती है,  चाचा उन्हीं चप्पलों को पहन कर थप-थप करते विधानबाबू के सीने पर चल रहे होते हैं।

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१२ अक्तूबर २००९