हुल्लड़बाजी में कानपड़ी आवाज सुनाई नहीं देती थी। तब अचानक काला शख्स एक छलाँग में भीड़ के बीच से निकल गया और निहायत तेज़ी व फुर्ती से लाइनें फलाँगता आगे की तरफ़ बढ़ता गया। लोगों को चिंता होने लगी। जो इसे चोर और जेबकतरा समझते थे वे उसे कातिल समझने लगे।
 
पहली लाइन में शहर के संभ्रांत लोग बैठे हुए थे। शहर के उद्योगपति पूँजीपति सेठ साहूकार, मौलावाले, चाँदीवाले, सोनेवाले और नामी गिरामी सियासत दाँ सब पहली ही लाइन में मौजूद थे। सबसे बढ़कर जिस बात ने लोगों को परेशान किया वह था पहली लाइन में माननीय जनाब महमूद की मौजूदगी। जनाब महमूद पहली लाइन में ठीक इमाम के पीछे बैठे हुए थे और अखबारों व मीडिया के लिये तस्वीरें खिंचवा रहे थे। इस सारी स्थिति से वे खासे परेशान नज़र आ रहे थे।

काला शख्स जब पहली लाइन के पास पहुँचा तो पुलिस की भारी भीड़ ने उसे दबोच लिया और फिर उसको घूँसों, ठोकरों, लातों और लाठियों से पीटते हुए ईदगाह से बाहर ले आए।

लाउड स्पीकर से मौलवी साहब की आवाज गूँजने लगी। वे लोगों को ईद की नमाज़ की तरकीब समझा रहे थे। इमाम साहब चौथी बार अल्लाह अकबर कहें तो हाथ कानों तक ले जाएँ और फिर छोड़ दें।

अबे अगली लाइन की तरफ कहाँ भागा जा रहा था हरामी। काले शख्स से बाहर पूछताछ की जा रही थी। जिसमें मुल्क की मशहूर खुफिया एजेंसी और पुलिस अफ़सर हिस्सा ले रहे थे।
काले शख्स के पेट में घूँसा मारते हुए पूछा गया, "अबे बता पहली लाइन में किस उद्देश्य से बढ़ रहा था।"

काले शख्स की नाक और सर से खून बह रहा था। उसने आहिस्ता से गर्दन घुमाकर अपने चारों तरफ मुल्क के मशहूर खुफियावालों और पुलिस अफसरों की तरफ देखा।

"अबे जवाब दे खामोश क्यों है?" एक घूँसा पेट में और एक नाक पर पड़ा। घुटने को ठोकर लगी और उससे पूछा गया, "बता किसके इशारे पर और किस इरादे से अगली लाइन की तरफ़ जा रहा था?"
खून की उल्टी करते हुए काले शख्स ने कहा, "मैं पहली लाइन में नमाज़ पढ़ना चाहता हूँ।"

"तू पहली लाइन में नमाज़ पढ़ना चाहता है?"
पुलिस अफसरों ने हैरानी से उसकी तरफ देखा और फिर उसका हुलिया और पहली लाइन में मौजूद लोगों के व्यक्तित्व और अहमियत की कल्पना करते हुए वे खिलखिलाकर हँस पड़े।
"अबे, आइने में कभी शक्ल देखी है तूने अपनी?"
उसकी कनपटी पर थप्पड़ पड़ा और कहा गया- "लंगूर का बच्चा।"

उसने कमीज की तार तार आस्तीन ने नाक से बहता हुआ खून साफ करते हुए कहा, "मैं पहली लाइन में नमाज़ पढ़ूँगा।"
"तू पहली लाइन में नमाज़ पढ़ेगा?" दो चार लातें पड़ीं और कहा गया, "जानता है पहली लाइन में शहर के मशहूर लोग मौजूद हैं और तू लंगूर उनके साथ नमाज़ पढ़ना चाहता है?"

दर्द की टीस उठी। उसकी आँखें बंद होने लगीं। उसने उखड़ी उखड़ी आवाज में कहा, "पहली लाइन में नमाज़ पढूँगा।"
"साले का दिमाग चला गया है।" बालों में हाथ डालकर उसका झुका हुआ सिर उठाया गया। उसका खून आलूदा चेहरा सूरज की तरफ करते हुए कहा गया, "अबे उल्लू के पट्ठे, जानता है पहली लाइन में जनाब महमूद बैठे हुए हैं।"

उसके बालों से हाथ निकाला गया। उसकी आँखें बंद होने लगीं। उसने आहिस्ता आहिस्ता गर्दन उठाकर अपने चारों ओर अहम लोगों की ओर देखा और कहा, "मैं अगली लाइन में जनाब महमूद के साथ कंधे से कंधा मिलाकर नमाज़ पढूँगा।"

सिपाही ठट्ठेमारकर हँसने लगे। एक सिपाही ने कहा, "साला पागल हो गया है। महमूद साहब के साथ नमाज़ पढ़ेगा।"
काले शख्स ने कहा, "मैं महमूद साहब के साथ नमाज़ पढूँगा।"

एक खुफिया अधिकारी ने उसकी गर्दन पकड़ते हुए और फिर गौर से उसकी बुझी बुझी सी आँखों में देखते हुए पूछा,"तू कौन है और तेरा नाम क्या है।"

"मैं अयाज़ हूँ।" काले शख्स ने टूटे हुए लहजे में कहा। मैं अयाज़ हूँ... मैं अयाज़ हूँ... मैं महमूद के साथ सफ़ (लाइन) में नमाज़ पढ़ना चाहता हूँ..."

और फिर वह बुझता गया। उसकी आँखे बंद होने लगीं और वह तारकोल की काली सड़क पर गिर पड़ा।

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