आज सिरहानेउपन्यासउपहारकहानियाँकला दीर्घाकविताएँगौरवगाथापुराने अंक
नगरनामारचना प्रसंगपर्व-पंचांगघर–परिवारदो पलनाटकपरिक्रमा पर्वप्रकृति
पर्यटन प्रेरक प्रसंगप्रौद्योगिकी फुलवारीरसोई लेखक विज्ञान वार्ता विशेषांकहिंदी लिंक
साहित्य संगमसंस्मरण साहित्य समाचार साहित्यिक निबंधस्वास्थ्य
हास्य व्यंग्य

 

हास्य व्यंग्य

ये पीड़ित जनम जनम के
— प्रेम जनमेजय


कुछ लोग बहुत संवेदनशील होते हैं। सहने की बात दूर¸ इनसे किसी का तनिक–सा कष्ट भी देखा नहीं जाता है। संसार में कोई पीड़ा व्यापे इनकी संवेदना जाग जाती है।

वैसे दिन के चौबीस घंटे जब भी आप इन्हें मिलें¸ ये पीडित ही दिखाई देते हैं। ऐसे सज्जनों को रात में स्वप्न भी पीड़ा के दिखाई देते हैं। प्रभु की कृपा से इनका चेहरा ऐसा हो जाता है कि बिना पीड़ा के भी पीड़ित दिखाई देता है। पीड़ा का आई एस आई मार्क है इनके चेहरे पर। प्ड़ाीा के मामले में ये महात्मा बुद्ध के सच्चे भक्त हैं। 'संसार दुखमय है और हमें दुख में रहना है' — इनका जीवन–सिद्धांत है।

कहीं भी पीड़ा व्यापे¸ ये पीड़ा भक्त सक्रिय हो जाते हैं। ये एक हैं पर इनके रूप अनेक हैं। कभी ये बाढ़–पीड़ित हैं तो कभी ये अबाढ़–पीड़ित हैं¸ कभी ये महामारी–पीड़ित हैं तो कभी युद्ध–पीड़ित हैं और कभी भूकम्प–पीड़ित हैं। अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए ये सारे साजों सामान से लैस रहते हैं। इनके पास एक तम्बू है¸ तरह–तरह की पीड़ा के लेबल युक्त डिब्बे हैं और संवेदना बटोरने के लिए पीड़ा–सेना है।

जैसे–जैसे इनकी पीड़ा फलीभूत होती है¸ तम्बू एक से अनेक हो जाते हैं और डिब्बों की संख्या दिन दुनी रात आठ गुनी प्रगति करती है। इस बार भी जैसे गुजरात में भूकम्प पीड़ा का समाचार फैला इनकी पीड़ा सड़कों पर आ गई ––– तम्बू तन गए और डिब्बे सेवा के लिए ललकारने लगे। ललकारते हुए डिब्बे कोई भेदभाव नहीं करते हैं ––– कारवाले¸ स्कूटरवाले¸ साईकिल वाले और पैदल–यात्री ¸ सबको पीड़ा अभिव्यक्त करने का सुअवसर देते हैं। यदि विज्ञान ने साथ दिया तो ये आकाश मार्ग पर खड़े हो कर हवाई जहाज यात्रियों को सेवा का सुअवसर प्रदान करेंगे।

पीडा.मल जी ऐसे ही पीड़ा–भ्क्त हैं। संसार में कोई पीड़ा व्यापे¸ ये सक्रिय हो जाते हैं।

उधर 26 जनवरी की सुबह भूकम्प और इधर रात को पीड़ामल जी हमारे घर पर पधार गए। उनके चेहरे पर व्याप्त पीड़ा ने मुझे लज्जित कर दिया। उनके चेहरे पर पीड़ा का जो तेज था¸ उसके सामने हमारा चेहरा फीका लग रहा था। म्राेां परिवार केवल उदास था और उनका चेहरा आंसू बहाने को तैयार। किसी का कुछ खाने का मन नहीं था इसलिए चाय पी रहे थे। उनके आगमन से हमारे यहाँ पीड़ा ने प्रवेश किया। वे मुझसे गले मिले और फूट–फूटकर रोने लगे। बोले¸ "ये क्या हो गया! भगवान ने ये क्या कर दिया ! कितने लोग बेमौत मर गए। मेेरे गले में तो सुबह से कुछ उतरा नहीं। कुछ भी खाने का मन नहीं है। पानी तक नहीं पिया है।"

ये सुनते ही मेरा परिवार और अधिक ग्लानि से भर गया¸ कहाँ पीड़ामल जी ने सुबह से पानी तक नहीं पिया है और हम चाय सुड़क रहें हैं। परन्तु पीडा.मल जी ने हमारी ग्लानि को पहचाना और पीड़ामोचक बनकर चाय पी ली। इसके बाद उनके द्वारा व्यक्त पीड़ा के हर वाक्य में एक ब््रम्हा–वाक्य था ––– 'मैने सुबह से कुछ नहीं खाया।' म्राेीं पत्नी अक्लमंद है इसलिए इशारे जल्दी समझ जाती है। उसने खाना बनाया और पीड़ामल जी ने न न करते¸ सुकर्म के लिए कहे शरीर को जीवित रखने जैसे सिद्धांतानुसार भोजन को गलेे से उतारा। उनके भोजन भक्षने के इस्टाईल ने बता दिया कि उन्होंने सुबह से नहीं अनेक जन्मों से भोजन नहीं किया है। इसके पश्चात उन्होंने भूकम्प–पीड़ित डिब्बा मेरे सामने रख दिया और बोले¸ "मैंने तो जैसे दुखद समाचार मिला¸ इस डिब्बे में दस हजार रूपये का चैक डाल दिया।

सच्चे काम के लिए मेरा सबकुछ चला जाए तो भी कुछ नहीं। इस संसार में अंतत: सब ऐसे ही मिट्टी में मिल जाना है¸ साथ कुछ नहीं जाना है। मैं तो कहता हँू कि भगवान मुझपर आप जैसी कृपा करें ¸ मेरी पत्नी और बच्चे कमाएँ¸ और इससे दस गुना दँू।" अपना अर्थ संकट बतााकर पीड़ामल जी ने मुझे अर्थसंकट में डाल दिया था। उन्होंने मेरी सेवा की राशि निश्चित कर दी थी।

मैंने कहा¸ "पीड़ामल जी आप महान प्ड़ाीाभक्त हैं। हम तो आपके सामने कुछ नहीं हैं। मेरी एक चेक बुक तो दफ्तर में हैं। कल मैं आपकी सेवा में कुछ अवश्य हाजिर करूंगा।"

पीड़ामल जी ऐसा पीड़ा–धन इकठ्ठा करने के लिए सच्चे कबीर–भक्त हैं। 'कल करे सो आज कर' के मंत्र का वह जाप करते रहते हैं। ये दीगर बात है कि जब चंदा भेजना होता है तो 'आज करे सो कल कर' के मंत्र का जाप करने लगते हैं। अभी उनको मुझसे संवेदना–धन बटोरना थे इसलिए उन्होंने कल करे सो आज कर मंत्र का जाप किया¸ क्षणभंगुर एवं कागज सम गल जाने वाले चेक की तुच्छता का पाठ पढ़ाया तथा घर में जो कैश¸ अभी दे दिया जाए¸ देने को प्रेरित किया। उनकी प्रेरणा ने काम किया और हमारी हैसियत से अधिक कैश संवेदना डिब्बे में समा गई। अपने धर्म और पेट का पालन होते ही उन्हें बहुत सारे काम याद आ गए¸ बोले¸ " अभी बहुत काम पड़े हैं। तुम्हारी भाभी और भतीजे–भतीजियाँ भी इस नेक काम के लिए निकले हुए हैं।" धन्य है पीड़ामल जी और धन्य है इनका परिवार। प्त्नाी और बच्चे सांसारिक नौकरी छोड़कर पीड़ा–धन को डिब्बे में एकत्रित करने मे तन–मन से जुटे हुए हैं।

हमारे घर से जाते हुए उनके चेहरे पर फिर पीड़ा ने फिर अपना विराट रूप दिखाया¸"आज रात को नींद नहीं आएगी। आप ये डिब्बा रख लीजिए और हो सके ताेे इसे भरकर लौटईयेगा।" यह कहकर उन्होंने मुझ तुच्छ को सेवा का अवसर दिया। डिब्बा मेरे हवाले और डिब्बे की ताली अपने हवाले की। जाते हुए वे फिर फूट–फूटकर रोए¸ सम्भवत: अगले घर में जाने की रिहर्सल कर रहे थे।

मैं उनके रोने से प्रभावित अगले दिन उनके घर पहँुच गया। प्राूा परिवार भूकम्प पीड़ा का बजट बनाने में व्यस्त था। उम्मीद पर दुनिया जीती है और ये दुखी परिवार भूकम्प–पीड़ा पर जीवित था। प्त्नाी को पूरी आशा थी कि इस बार उसका जड़ाउ हार अवश्य बन जाएगा¸ बेटे को आशा थी कि उसकी बाईक आ जाएगी¸ बेटी उम्मीद से थी कि उसका विवाह धूमधाम से हो जाएगा और होने वाले बच्चे को बाप का नाम मिल जाएगा। प्ड़ाीामल जी की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था¸ इस बार लोग दिल खोलकर उनके डिब्बों में पीड़ादान दे रहें है। पिछली बार हुए कारगिल–युद्ध से अधिक पीड़ा उनके डिब्बों में एकत्रित हो गई थी।

मैंने देखा उनकी अलमारी में पीड़ा के अलग–अलग लेबलों से युक्त डिब्बे अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

शाम का समय था और शाम गम गलत करने के लिए बहुत सारे साधन उपलब्ध कराती है। जब पीड़ाकाल नहीं होता है तो इस काल की पीड़ा को दूर करने के लिए पीड़ामल जी ठर्रे का सहारा लेते हैं और जब पीड़ाकाल होता है तो स्कॉच से गम गलत करते हैं। आज की शाम पीड़ा विदेशी पीड़ा राशि से प्राप्त स्कॉच से गम को गलत कर रही थी।

ऐसे मौके विरोधी दल के लिए सुनहरी मुद्दा देते हैं तथा शासक दल को खूब सारा धन खर्च करने का सुअवसर। सरकारी पैसा खर्च करने का अपना एक गणित है। सरकारी पैसा भी बड़े मजे की चीज है। इसने गणित के समस्त व्यय–नियमों को गलत सिद्ध कर दिया है। गणित के इस आधार के अनुसार पैसा खर्च करने से बचता है। जितना कागजों में खर्च होता है हकीकत में उतना खर्च नहीं है। जो पैसा बचता है वो कहाँ जाता है इसे खोजने की आवश्यकता नहीं है। हमारी पब्लिक जो है सब जानती है।

पीडा.मल जी जब हर प्रकार की पीड़ा को भोग चुके होते हैं और बाजार में कोई पीड़ा नहीं रह जाती है तो भक्त हो जाते हैं। भक्ति के इस आलम में कभी जागरण करवाते हैं और कभी चैरेटी शो। च्रैाैेटी के बारे में इनका बह्म वाक्य है –– चैरेटी बिगन्स आऊटसाईड एंड एंड्‌स एट होम। ऐसे जितने भी वाक्यों का अनुवाद किया जाए उनका अर्थ ये ही निकलता है कि — "मो सम कौन कंगाल।"

इस रचना पर अपनी प्रतिक्रिया लिखें - दूसरों की प्रतिक्रिया पढ़ें

Click here to send this site to a friend!

आज सिरहानेउपन्यासउपहारकहानियाँकला दीर्घाकविताएँगौरवगाथापुराने अंकनगरनामारचना प्रसंगपर्व पंचांग
घर–परिवार दो पलनाटक परिक्रमापर्व–परिचय प्रकृतिपर्यटन प्रेरक प्रसंगप्रौद्योगिकी फुलवारीरसोई लेखक
विज्ञान वार्ताविशेषांकहिंदी लिंकसाहित्य संगमसंस्मरणसाहित्य समाचारसाहित्यिक निबंधस्वास्थ्य
हास्य व्यंग्य

© सर्वाधिका सुरक्षित
"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9–16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।