हास्य व्यंग्य

 

रोबो
- एस आर हरनोट


एक आदमी नेता बन गया। कुछ दिनों बाद उसकी ताजपोशी मंत्री के पद पर हो गई। उसे लगने लगा कि वह अब दुनिया का सबसे खुश और ताकतवर प्राणी है। कुछ दिनों बाद उसके साथ एक अजीबोग़रीब घटना घटने लगी। उसे हर कहीं नींद आ जाती और तरह-तरह के भयानक सपने दिखने लगते। वह रात-दिन कई तरह के भय से परेशान रहने लगा था।

स्वप्न में कभी उसे लगता, जिस कार से वह दौरे पर जा रहा है, वह अचानक दुर्घटनाग्रस्त हो गई है। या उसमें किसी उग्रवादी या विपक्षी दल के आदमी ने बम रख दिया है और रिमोट से कार के परखचे उड़ा दिए हैं। और वह खुद ही अपने जिस्म के लीथड़ों को इकट्ठा करने लगा है।

जब वह अपने दफ़तर में काम कर रहा होता तो अचानक कुर्सी पर बैठा ही सो जाया करता। उसे लगता कि उसके सुरक्षा गार्ड, चपरासी और निजी स्टाफ के कर्मचारी किसी दूसरे देश के जासूस या उग्रवादी है। उनके पास एके-47 हैं और वे सभी उसकी हत्या करने के लिए उसके पीछे दौड़ रहे हैं।

मंत्री को सपनों में ही दिखता कि जिस जनसभा में वह भाषण दे रहा है, अचानक एक-दो नक़ाबपोश भीड़ को चीरते हुए उसकी तरफ़ दौड़ते आ रहे हैं और उन्होंने उस पर धड़ाधड़ गोलियाँ बरसा दी हैं। और वह वहीं ढेर हो गया है।
अपने कमरे में आराम फ़रमाते वह अचानक चीखने लग जाता। उसे कमरे की दीवारें, खिड़कियाँ और सारा सामान हिलता नज़र आता। फ़र्श और छतें गिरती-ढहती लगतीं। जैसे भयानक भूकंप आ गया हो या बादल फट गए हों या फिर उसके उपर आसमानी बिजली गिर पड़ी हो या किसी नदी में भयंकर बाढ़ आ गई हो। और वह अपने मकान, सरकारी कार और बच्चों तथा कई प्रेमिकाओं के साथ उसमें बह गया हो।

कभी वह सपनों में ही सख़्त बीमार हो जाता। उसे लगता कि वह दिल की बीमारी से मर रहा है। कैंसर से जूझ रहा है। एड्स ने उस पर आक्रमण कर दिया है। उसका साँस फूलने लगा है। उसे दमा हो गया है। वह पीलिया से ग्रस्त है। उसके हाथ, बाजू, और टाँगें अधरंग से टेढ़ी-मेढ़ी हो गई हैं।

कभी उसे लगता कि उसके अंग अपनी जगह पर नहीं है। जहाँ नाक होना चाहिए वहाँ कान उग गए हैं। जहाँ कान होने चाहिए वहाँ आँख लग गई हैं और उसका सिर टाँगों के बीच लटक रहा है। कई बार चलते-फिरते, महत्वपूर्ण बैठकों में भाग लेते उसे महसूस होता कि उसके गले में किसी ने एक ढोलकी टाँग दी है और वह हिजड़ों के बीच नाचने लगा है।

इस स्वप्न-भय ने उसे अच्छा-ख़ासा परेशान कर दिया था। इस भय को न तो वह किसी के सामने प्रकट कर पाता और न ही तत्काल उससे निजात पाने का कोई उपाय नज़र आ रहा था। उसने इस पर गहराई से मनन किया। सोचा कि वह तो एक मंत्री है। आम आदमी नहीं है। कोई डर या भय उसके नज़दीक कैसे आ सकता है। वह इस स्थिति में हैं कि अपनी सुरक्षा के पुख़्ता इंतज़ाम कर सके। क्योंकि वह सुरक्षित है तो उसका घर सुरक्षित है, जनता सुरक्षित है और प्रदेश तथा देश सुरक्षित है। इसलिए उसने इस भय को मूल से समाप्त करने के उपाय ढूँढ़ने शुरू कर दिए थे।

पहला उपाय कार दुर्घटना से बचने का किया गया। विदेश से ऐसी कार मँगवाई गई जिस देशी मौसम, गोली-बारूद और इंटे-पत्थर का कोई प्रभाव न पड़े। इसी के साथ मंत्री ने अपने लिए बुलेट प्रूफ गांधी टोपी, नेहरू-कट सदरी, कुरता-पायजामा और बूट भी मँगवा लिए थे।

दूसरे उपाय भूकंप इत्यादि से बचने की सुरक्षा थी। उसने एक ऐसी कोठी बनवाई जिसके निर्माण के लिए विदेशी इंजीनियर और कारीगर लाए गए। उसमें हज़ारों-लाखों टन लोहा कूटा-भरा गया। यानि अपने क्षेत्र की एक मीलों लंबी रेल लाइन की पटरियाँ, एक सिंचाई योजना की पाईपें, और पाँच-सात स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों तथा दूसरे भवनों में लगने वाला सरिया, सिमेंट, रेत और बजरी उस मकान में समाहित कर लिए गए। इस आलीशान कोठी में कई तरह के अत्याधुनिक उपकरण लगाए गए जो भूकंप आने, बादल फटने और बाढ़ आने की पूर्व सूचनाएँ देने में सक्षम थे।
तीसरा उपाय मंत्री ने अपने सुरक्षा कर्मियों, निजी स्टाफ इत्यादि से बचने का भी कर दिया। उस विदेशी कार के साथ कई रोबोगार्ड और रोबोडॉग भी लाए गए जो हर समय मंत्री के साथ रहते थे।

चौथे उपाय में बीमारियों से निजात पाने के उपाय थे। देशी डाक्टरों के बजाए कई विदेशी डाक्टर नियुक्त कर लिए गए और उन्हें अपनी कोठी और दफ़्तर के आसपास रखा गया। मंत्री सदा जवान रहे इसलिए अपने दूसरे महकमों के साथ उसने अपने पास स्वास्थ्य विभाग भी रख लिया।

यानि सपनों में जो भी चीज़ें मंत्री को भयाक्रांत करती थीं वह तत्काल उससे निजात पाने का उपाय ढूंढ़ लेता और जो भी धन अपने प्रदेश की योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए आबंटित होता वह उसे इन उपायों पर खर्च कर देता। इस तरह उपाय करते-करते उसकी सरकार के पाँच साल निकल गए। उसे न अपने परिवार की फ़िक्र रही, न गाँव की, न जनता और अपने प्रदेश व देश की। इन सुरक्षा उपायों के बीच उसे पता भी न चला कि कब चुनाव आ गए। कुछ चमचे किस्म के लोग ज़रूर मंत्री के साथ आगे-पीछे रहते जिनका सारा दाना-पानी उसकी बदौलत ही चलता था।

मंत्री जैसे अब गहरी नींद से जागा था। अपने चारों तरफ़ से सुरक्षा कवच को देखा और मन ही मन मुस्करा दिया। दूसरे पल चुनाव का ख़्याल आया तो जैसे कबाब में हड्डी पड़ गई। उसने एक भद्दी गाली इस देशी जनता को दी जिनके पास वोट माँगने जाना उसकी मजबूरी थी। उसे विश्वास था कि उसके पास इतने साधन है कि वह अपने जीतने योग्य वोटें तो अर्जित कर ही सकता था।
वह दौरे पर निकल पड़ा। उसके पास विदेशी कार थी।