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इतने पदक कैसे?
-गुरमीत बेदी


राष्ट्रमंडल खेल ख़त्म हो गए और भारत ने ''22 स्वर्ण'', ''17 रजत'' और ''11 कांस्य'' पदक जीत कर पदक तालिका में चौथा स्थान हासिल कर लिया-
यह बात मुझे कुछ हजम नहीं हो रही। भारत के खिलाड़ी इतने पदक कैसे जीत सकते हैं? हम तो सिर्फ़ सैर-सपाटे और शॉपिंग के लिए अपने खिलाड़ियों को विदेशों में भेजते थे, लेकिन इस बार खिलाड़ियों ने महान भारत की महान परंपराएँ पलट दीं और पदक मैनेज कर लिए, यह बात मुझे अभी तक नागवार गुज़र रही है। चूँकि मैं ज़्यादातर समय ऐसे लोगों की संगत में रहता हूँ जो षड़यंत्र रचने में माहिर हैं, इसलिए मुझे ये पदक जीतने के पीछे भी कोई षड़यंत्र नज़र आ रहा है। मुझे लग रहा है कि या तो हमारे खिलाड़ियों को किसी आंतरिक या बाह्य शक्ति द्वारा पदक जीतने के लिए उकसाया गया है या फिर राष्ट्रमंडल खेलों में पदक बाँटने के मामले में कोई घपलेबाजी हुई है? यह भी हो सकता है कि वहाँ पदक बिक रहे हों और हमारी टीम के साथ गए मैनेजरों ने ज़्यादा पेमेंट करके पदकों का जुगाड़ कर लिया हो।

इसके अलावा और भी कई तरह के संदेह व सवाल मेरे मन में उठ रहे हैं जो सही व सटीक जवाब के मोहताज हैं। यह भी हो सकता है कि पदकों को लेकर जैसे सवाल मेरे मन में हैं, वैसे ही सवाल मेरे भारत महान के अन्य लोगों की खोपड़ी में भी उछल-कूद मचा रहे हों। लोगों की जिज्ञासाओं और भारतियों का निवारण करने के लिए ज़रूरी है कि पदक जीतने के मामले की उच्च स्तरीय जाँच होनी चाहिए। खिलाड़ियों और टीम मैनेजरों को जाँच कमेटी के सामने तलब किया जाना चाहिए। राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति से भी कड़ी पूछताछ होनी चाहिए। जो मुल्क मैलबर्न से खाली हाथ लौटे हैं, उनके दुख-दर्द की सुनवाई भी जाँच कमेटी को करनी चाहिए।

अगर इन मुल्कों को पदक नहीं देने थे तो उन्हें राष्ट्रमंडल खेलों में बुलाया ही क्यों गया? इसकी भी जाँच होनी चाहिए। अगर जाँच कमेटी से काम न चलता हो तो जाँच आयोग भी बैठाया जा सकता है। आयोग बैठाने का तो हमें वैसे भी काफ़ी तजुर्बा है। पर आयोग बिठाते समय यह ध्यान रखा जाना भी ज़रूरी है कि आयोग के माननीय सदस्यों के तौर पर केवल उन्हीं सज्जनों और विभूतियों को लिया जाए जो लाभ के पदों पर न हों। वरना विपक्ष बखेड़ा खड़ा कर देगा और मामला चुनाव आयोग जैसे किसी दूसरे आयोग के पास पहुँचने पर माननीय सदस्यों की सदस्यता रद्द भी हो सकती है। इसलिए कोई पंगा या रिस्क न लेते हुए जाँच आयोग में वही महानुभाव एडजस्ट किए जाने चाहिए जिनके पास अभी तक मक्खियाँ मारने के सिवाए कोई दूसरा काम न रहा हो।

जाँच आयोग फिर यह देखे कि भारत के खिलाड़ियों ने इतने पदक कैसे जीत लिए? क्या दूसरे मुल्कों ने केवल फिसड्डी खिलाड़ी मैलबर्न में भेजे थे या फिर भारत से जो खिलाड़ी मैलबर्न गए, उनका चयन राजनीतिक सिफ़ारिशों को नज़रअंदाज़ करके केवल योग्यता, दमखम और मैरिट के आधार पर हुआ? यह भी जाँच होनी चाहिए कि बिना समुचित खेल-सुविधाओं के भी, इन खिलाड़ियों ने पदक जीतने का दुस्साहस कैसे कर दिखाया? जाँच इस बात की भी होनी चाहिए कि हमारे पदक जीतने वाले सूरमाओं ने किसी ख़ास आयुर्वैदिक कंपनी के च्यवनप्राश का सेवन किया था या किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा विकसित कोई सुपरपॉवर कैपसूल वगैरह खाया था? इसके अलावा यह जाँच भी होनी चाहिए कि जो खिलाड़ी पदक जीतकर आए हैं, कहीं वे बाबा रामदेव के सिखाए योग तो नहीं करते थे? अगर पदक जीतना बाबा रामदेव जी के योग करिश्मे का ही नतीजा है तो फिर देश की खेल नीति में योगा को अनिवार्य क्यों नहीं कर दिया जाता ताकि हमारा मुल्क ज़्यादा से ज़्यादा पदक जीत सके?

जाँच आयोग को यह भी देखना चाहिए कि हमारे खिलाड़ियों ने जो पदक जीते हैं, उनके पीछे किन्हीं तांत्रिकों की माया तो नहीं है। हमारे भारत के तांत्रिकों ने भी बहुत नाम कमाया है और यह भी हो सकता है कि इस बार भारतीय खेल मैनेजरों ने पदक जीतने के लिए तांत्रिकों की शरण ली हो और फिटनैस शिविरों के साथ-साथ खिलाड़ियों के लिए तंत्र साधना शिविर भी आयोजित किए गए हों? इस बात की भी जाँच होनी चाहिए कि हमारे खिलाड़ियों ने पदक जीतने के लिए कौन-कौन से टोटके इस्तेमाल किए। जाँच आयोग को यह भी देखना चाहिए कि जो खिलाड़ी राष्ट्रमंडल खेलों में भारत की नाक ऊँची करके आए हैं, उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या है और इन्होंने अपने चयन का जुगाड़ कैसे फिट किया? इतने सिफ़ारिशी खिलाड़ियों के होते इनका चयन कैसे हो गया? क्या 'पहुँच वाले' खिलाड़ियों ने हो-हल्ला नहीं किया? क्या सचमुच चयनकर्ताओं ने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर खिलाड़ी चुने? क्या चयनकर्ताओं को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियाँ नहीं मिलीं? क्या सचमुच हमारे चयनकर्ता अब निष्पक्ष और दलेर हो गए हैं और उन्हें अपनी कुर्सी की भी परवाह नहीं रही?

जाँच आयोग को यह भी देखना चाहिए कि भारतीय खेल प्रबंधकों ने ख़रीद-फरोख्त के ज़रिए तो ये पदक हासिल नहीं किए। भ्रष्टाचार केवल भारत में ही नहीं होता बल्कि बर्ड-फ्लू की तरह इसके जीवाणु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विद्यमान हैं। हो सकता है कि मैलबर्न में पदक बिके हों और अपुन ने ख़रीद लिए। लेकिन पदकों की ख़रीद के लिए पैसा किस एजेंसी ने दिया, यह फंडा भी क्लीयर होना चाहिए। इसके अलावा इस बात की भी जाँच होनी चाहिए कि जो पदक हमारे खिलाड़ी बटोर कर लाए हैं, वे शुद्ध सोने या चाँदी के हैं भी या नहीं? आजकल मिलावट का धंधा भी ज़ोरों पर है। अत: इन पदकों की जाँच के लिए जौहरियों की एक कमेटी बिठाई जानी चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि शुद्ध सोने-चाँदी के पदक दूसरे देशो के खिलाड़ी ले गए हों और जो मिलावटी पदक बच गए हों, वे भारतीयों को दे दिए गए हों?

इसके अलावा जाँच आयोग को यह भी देखना चाहिए कि पाकिस्तान महज़ एक स्वर्ण, तीन रजत और एक कांस्य पदक जीतकर पदक-तालिका में आख़िरी स्थान पर क्यों रहा? क्या पाकिस्तान अपनी यह खीझ भारत पर नहीं उतारेगा? इसके अलावा भी बहुत से सवाल मेरे ज़हन में उठ रहे हैं लेकिन इनका खुलासा मैं तब करूँगा जब पदक जीतने के मामले को लेकर जाँच आयोग गठित होगा और मुझे भी इस आयोग के सामने सवाल रखने के लिए तलब किया जाएगा। तब तक पदक जीतने की खुशी में तालियाँ बजाते रहिए।

16 अप्रैल 2006

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