हास्य व्यंग्य

मैं, कुत्ता और इंटरनैट
-गुरमीत बेदी


 

जब से अख़बार में यह ख़बर पढ़ी है कि अब कुत्ते भी इंटरनैट पर आशिकी करेंगे, तब से मैं बहुत टैंशन में हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा कि कुत्ते को इंटरनैट सिखाकर और उसे आशिकी के लिए प्रेरित करके ऐसी क्या सूचना और रोमांस क्रांति आ जाएगी जो दुनिया के लिए अभी तक अछूती है। मैं इंटरनैट के इस्तेमाल के हरगिज़ खिलाफ़ नहीं हूँ। मेरी बला से चाहे कुत्ते को इंटरनेट सिखाओ या गधे को लेकिन मेरे टैंस होने की वजह यही है कि जब मैं इंटरनेट सीख रहा हूँ तो कुत्ते को इंटरनेट सिखाने की ज़रूरत क्यों है? क्या कुत्ता मुझसे ज़्यादा शार्प माइंडिड है? जब मैं इंटरनेट पर ऐसी-वैसी साईट ऑन करूँगा तो कुत्ता मेरे बारे में क्या सोचेगा? इसी तरह जब कुत्ता कोई ऐसी-वैसी साईट क्लिक करेगा तो फिर मेरे और कुत्ते में क्या फ़र्क रह जाएगा? क्या मुझे छिप-छिप कर ऐसी साईट देखनी पड़ेगी या फिर कुत्ता मुझसे छिप-छिप कर ऐसी साईट देखेगा?

चलो मान भी लो कि कुत्ते को इंटरनैट सिखाना ज़रूरी हो गया है लेकिन किस तरह के कुत्तों को इसे सिखाया जाएगा? क्या जार्ज बुश की सिक्योरिटी में लगे कुत्ते सबसे पहले इंटरनैट सीखेंगे या फिर उन कुत्तों को यह तकनीक सिखाई जाएगी जो अपने मालिकों या मालकिनों के साथ सोफ़े पर आराम फ़रमाते हैं, बैड पर सोते हैं, कार की खिड़कियों से मुँह निकालकर सड़कछाप कुत्तों को चिढ़ाते हैं? क्या गलियों में लातें खाते देसी प्रजाति के कुत्तों को भी इंटरनेट ज्ञान प्रदान किया जाएगा? अगर नहीं तो क्यों? गलियों में आवारा घूमने वाले कुत्ते क्या कुत्ते नहीं हैं? क्या वे किसी की औलाद नहीं हैं? लेकिन अगर गलीछाप कुत्तों को भी इंटरनेट सिखाया जाएगा तो ज्ञानवान होकर वे क्या गलियों में ही झक्क मारेंगे? उनके स्टेटस का क्या होगा?

'कुत्ते भी इंटरनेट सीखेंगे' शीर्षक से छपी इस ख़बर ने ही मुझे प्रश्नों के भँवर में झोंक दिया है। मुझे लग रहा है कि इंटरनेट सीखने की मुझे अब कोई ज़रूरत नहीं रही। इंटरनेट जब मुझे भी आता होगा और कुत्ते को भी, तो फिर मैं कुत्ते से भिन्न कैसे हुआ या कुत्ता मुझसे भिन्न कैसे हुआ? क्या मैं और कुत्ता एक ही थैली के चट्टे-बट्टे नहीं कहलवाएँगे? क्या आदमीनुमा कुत्ते और कुत्तेनुमा आदमी के बीच कोई डिफरैंस नहीं होगा?

मुझे समझ नहीं आ रहा कि कुत्ते को इंटरनेट सिखाने का ख़याल किसी की खोपड़ी में क्यों आया? दुनिया के ग़रीब बच्चों को इंटरनेट सिखाने का ख़याल उसके दिमाग़ में क्यों नहीं आया? क्या कुत्तों के लिए इन्फॉरमेशन टैक्नॉलोजी या कंप्यूटर साइंस में डिग्री या डिप्लोमा के लिए अलग से संस्थान खोले जाएँगे? उनकी फीसें कौन भरेगा? उनके हॉस्टल में रहने का खर्चा कौन देगा? आजकल ऐसे संस्थान मनमर्जी की फीसें वसूल करते हैं और जब चाहे फीसों में वृद्धि का फ़रमान जारी कर देते हैं। अगर कुत्तों को यह बात नागवार गुज़री तो क्या वे हड़ताल पर नहीं चले जाएँगे? कुत्ते नेशनल हाइवे पर ट्रैफ़िक जाम भी कर सकते हैं, भौंक-भौंक कर आसमान सिर पर उठा सकते हैं। अगर कुत्तों ने सचमुच में ऐसा जलवा कर दिया तो विपक्ष के लिए आफ़त खड़ी हो जाएगी। उनके बयानों को कौन पूछेगा? प्रिंट मीडिया हो या इलैक्ट्रानिक मीडिया, सारी कवरेज तो कुत्ते ले जाएँगे। हर चैनल पर ये बताने की होड़ लग जाएगी कि कुत्ते अब कौन सी रणनीति अख़्तियार कर रहे हैं। कुत्ते अगर हिंसक हो गए तो उन्हें कौन समझाएगा? एक सज्जन फ़रमा रहे थे कि कुत्ता जितने मर्ज़ी पैग लगा ले, वह कभी आदमी नहीं बन सकता लेकिन आदमी ज़्यादा पैग मार ले तो वह कुत्ता ज़रूर बन सकता है। पता नहीं वह सज्जन आदमी की बेइज़्ज़ती कर रहे थे या कुत्तों को नीचा दिखा रहे थे। चलो मान भी लो कि कुत्ते हड़ताल पर नहीं जाते हैं और आँख मूँद कर पढ़ाई करते हुए डिग्री हासिल कर लेते हैं तो क्या इससे हमारा सामाजिक ताना-वाना नहीं बिख़र जाएगा।

ज़रा सोचिए, कुत्ते अगर इंटरनैट सीख गए तो वे सरे बाज़ार किसी भी शख़्सियत को घेर कर क्या-क्या नहीं पूछ डालेंगे। क्या-क्या नहीं सुना डालेंगे? कुत्तों से आप क्या-क्या छिपाएँगे और कैसे नज़रें चुराएँगे? कुत्ते अगर सूचना तकनीक ज्ञान से लैस होंगे तो वे सूचना अधिकार की जड़ों तक जाएँगे और खोद-खोद कर भीतर की ख़बरें ले आएँगे। फिर हम दुनिया को क्या मुँह दिखाएँगे? दुनिया वैसे भी हमारे बारे में कितनी मिस-अंडर-स्टैडिंग लिए है। दुनिया सोचती है कि हमने सिर्फ़ भ्रष्टाचार में प्रगति की है, हम भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देते हैं, हम किसी का डैथ सर्टीफिकेट बनाने तक की रिश्वत लेते हैं, हम छोटे-छोटे सौंदों से लेकर हथियारों तक की ख़रीद-फरोख़्त में दलाली खाते हैं, हम ग़रीबों के लिए योजनाएँ बनाते समय अमीरों का ख़याल रखते हैं, हम सभी के साथ एक समान सलूक करने की बजाए तुष्टिकरण की राजनीति करते हैं और वोट बैंक के नाम पर समाज में भेदभाव की दीवार खड़ी करते हैं। जब कुत्तों को यह पता चल जाएगा कि यहाँ हाथी के दाँत खाने के अलग हैं और दिखाने के अलग, तो वे हमारे बारे में क्या इंप्रेशन पालेंगें? क्या उनका भरोसा आदमजात से नहीं उठ जाएगा? कुत्ते फिर हमें सीरियसली क्यों लेंगे?
चलो यह मान लेते हैं कि सूचना क्रांति के इस दौर में कुत्तों को भी कंप्यूटर ज्ञान देना ज़रूरी है लेकिन इंटरनेट पर आशिकी सिखाने का क्या तुक बनता है? कुत्ते तो बहुत वफ़ादार प्राणी माने जाते हैं। वे धोखाधड़ी में यकीन नहीं रखते। जिसके साथ होते हैं, दिलोजान से होते हैं। इंटरनैट पर आशिकी सिखाकर उनका करैक्टर बिगाड़ने की साजिश क्यों रची जा रही है। क्या हम चाहते हैं कि कुत्ते घर के बाहर इश्क फ़रमाएँ और बीबी के सामने दुम हिलाएँ? कुत्तों की नैसर्गिक प्रेम भावना से क्यों खिलवाड़ किया जा रहा है। क्यों उनका घर उजाड़ने का घिनौना षडयंत्र रचा जा रहा है। कुत्तों में अगर इंसान के नैसर्गिक गुण घुस गए तो वे इंटरनेट पर चैटिंग करते हुए चीटिंग भी कर सकते हैं। उन्हें रोकने वाला कौन होगा? हो सकता है कि इश्क में नाकाम रहने और दिल टूटने पर कुत्ते फ्रस्टेट हो जाएँ और किसी दिन सड़क या नदी के किनारे अकेला बैठा कोई कुत्ता यह गीत गुन-गुनाता दिखे कि 'बड़े धोखे हैं इस राह में. . .'। यह भी हो सकता है कि आशिकी में कोई कुत्तिया धोखाधड़ी का शिकार हो जाए और यह दर्द भरा तराना छेड़ बैठे कि 'छोड़ गए बालम, हाय अकेला छोड़ गए. . .'। ज़रा सोचिए, प्यार में धोखा खा चुके कुत्ते फिर हमारे किस काम के होंगे? क्या उनके जोशों-खरोश पर ग्रहण नहीं लग जाएगा? वे नशे की गिरफ़्त में भी आ सकते हैं और सुसाईड वगैरह भी कर सकते हैं। प्यार में धोखा खाने वाले अकसर ऐसा कर बैठते हैं।

सूचना क्रांति की आड़ में कुत्तों पर ऐसा बेहुदा प्रयोग करने की कल्पना करने वाले हे महापुरुष! प्लीज़ कुत्ता समाज पर तरस खाओ और कुत्तों को नेट पर आशिकी कराने का ख़याल अपने शरारती दिमाग़ से निकाल दो। वैसे भी जब मैं इंटरनेट सीख रहा हूँ तो कुत्तों का समय क्यों बरबाद किया जाए?'

16 दिसंबर 2006