हास्य व्यंग्य

नेताजी की नरक यात्रा
- गिरीश पंकज


नेताजी मरे तो यमदूत ने उन्हें सीधे नरक में लाकर पटक दिया। नेताजी चूँकि हिंदुस्तान से आ रहे थे इसलिए नरक की हालत देखकर समझ गए कि वे कहाँ है। भड़क गए और यमदूत को फटकारा, "यह मुझे कहाँ ले आए? जानते नहीं, हम कौन हैं? नेता हैं नेता! मुझे स्वर्ग ले चलो।"
यमदूत कुछ देर ख़ामोश रहा, फिर बोला, "यमराज का हुक्म है कि आपको नरक में ही रखा जाए।"
"क्यों कि आपने धरती पर काफ़ी पाप किए हैं।" यमदूत ने कहा।
"क्या बकते हो! मैं तो हमेशा ही पुण्य कार्य में लगा रहा। विकास के अनेक काम करवाए। पुल बनवाए। पाठशालाएँ बनवाईं। अनाथालय खुलवाए। महिला आश्रमों का निर्माण करवाया। लोगों को नौकरियाँ दिलवाईं। दिन-रात जनसेवा में लगा रहा। समय पड़ने पर देश की मदद कर सकूँ, इसलिए करोड़ों रुपए स्विस बैंक में जमा करवाए। क्या यह सब पाप है?"

यमदूत को लगा वाकई किसी 'पुण्यात्मा' को भूल से उठा लाया है। वह नरक में नया-नया भर्ती हुआ था। इस ग़लती के लिए यमराज कहीं उसकी छुट्टी न कर दें। उसने नेता से कहा, 'शायद मुझसे ग़लती हो गई है लेकिन अब इस ग़लती को तो यमराज ही सुधार सकते हैं, उनके पास चलना होगा।"
"हाँ-हाँ, चलो! मैं नेता हूँ, किसी से नहीं डरता, फिर चाहे वह प्रधानमंत्री ही क्यों न हो।"

यमदूत और नेता यमराज के पास पहुँचे। नेता को देखते ही यमराज चीख पड़े, "इस श्वेत वस्त्रधारी भ्रष्ट प्राणी को यहाँ क्यों ले आए? इसे अस्सी करोड़ चार सौ बीस नंबर वाली कोठरी में बंद करके खूब पिटाई करो।"
"यह कैसा सनकी आदेश है? जानते नहीं, मैं कौन हूँ, नेता हूँ नेता, समाजसेवी हूँ। शायद आपसे पहचानने में भूल हुई है। मुझे स्वर्ग भेजो। वहाँ मेरी जगह आरक्षित होगी।"
यमराज हँसे। "स्वर्ग और तुम? स्वर्ग क्या तुम्हारा सर्किट हाउस है, जो अक्सर आरक्षित रहता है? हम स्वर्ग को नरक नहीं बनने देंगे। स्वर्ग तो जनता के लिए है, जिसका तुम जैसे नेताओं ने भरपूर शोषण किया है। इसलिए तुम नरक में रहो और अपनी करनी का फल भोगो।"

नेता यमराज की कड़क आवाज़ सुनकर चुप हो गया, ठीक उसी तरह जैसी धरती पर हाई कमांड के सामने अकसर हो जाया करता था। अब उसने घिघियाते हुए कहा, "लेकिन महाराज, मैंने तो खूब पुण्य किए हैं। अनेक निर्माण-कार्य करवाए हैं। जनसेवा में रात-रात भर जागता रहा। दौरे कर-करके मैंने लोगों की समस्याएँ सुनी थीं, क्या यह सब पाप है? आप शायद मुझको पहचानने में भूल कर रहे हैं। मेरे नाम का ही एक और नेता विपक्ष में है। वह गंभीर रूप से बीमार भी चल रहा था। शायद आप उसे लाने की बजाए मुझे उठा लाए।"
यमराज के बगल में ही बैठा था चित्रगुप्त। उसने मुस्कराते हुए कहा, "यह तुम्हारी राजनीति नहीं है, नेता। यहाँ दंड देने में कोई चूक नहीं होती। हो ही नहीं सकती। यह तुम्हारी पुलिस व्यवस्था भी नहीं है, जहाँ अपराधी सीना ताने घूमता है और निर्दोष जेल में सड़ता है। हमारे यहाँ तो अन्यायी को नरक और न्यायी को स्वर्ग मिलता है। यही हमारा विधान है, यही हमारी परंपरा है। वैसे भी तुम्हारी करतूतों की सूची काफ़ी लंबी है। हमसे कोई भूल नहीं हुई, समझे?"

नेता काँपने लगा। उसे लगा, अब सारे हथकंडे बेकार हो गए। फिर भी उसने साहस करते हुए पूछा, "कैसे कह सकते हैं आप कि मैंने पाप किए हैं, भ्रष्टाचार किया है। चलिए मेरे साथ धरती पर, मैं आपको वहाँ के अख़बार दिखाता हूँ जो मेरी तारीफ़ों में पन्ने रंग चुके हैं। मेरे भाषण छपे, अनेक निर्माण-कार्यों के उदघाटन करते हुए मेरे चित्र छपे। क्या किसी साधारण आदमी को इतनी बड़ी प्रसिद्धि मिलती है? बोलो।"
यमराज ने कहा, "हम जानते हैं अख़बारों की असलियत! जिस देश के अधिकांश अख़बार सत्ता की राजनीति के चारण भाट हो गए हों, जो राजनीति के आगे दुम हिलाने का आचरण करते हों, वहाँ तुम जैसे लोग ही 'बैनर' पर रहेंगे। तुम अख़बारों को विज्ञापन आदि अनेक तरह से लाभ पहुँचाते रहे हो इसलिए तुम्हारी जय-जयकार तो होगी ही न? फिर जहाँ राजनीति ही सामाजिक आचरण हो गई हो, वहाँ तुम जैसे टुटपूँजिए नेता नहीं छपेंगे तो क्या कलाकार, वैज्ञानिक, शिक्षक और साहित्यकार छपेंगे? यहाँ बैठे-बैठे हमें सबकी असलियत मालूम हो जाती है। मानव के समूचे कर्मों का लेखा-जोखा करके ही हम उसका स्थान निर्धारित करते हैं। और तुम्हारी सारी की सारी करतूत तो चित्रगुप्त के खाते में दर्ज हैं, वे कभी ग़लत नहीं होतीं। अब तुम अपनी काल-कोठरी में कष्ट भोगने चुपचाप चले जाओ, वरना. . .।"

यमराज का इशारा हुआ और यमदूत नेता को ले जाने लगा, लेकिन नेता ने हाथ छुड़ा लिया। अब यमदूत उसे खींचकर ले जाने की कोशिश करने लगा, नेता ने बच्चों की तरह मचलकर (इस किस्म का नाटक वह अकसर चुनाव के समय जनता के सामने खूब कर चुका था) रोते हुए कहा, "माई-बाप, मुझे स्वर्ग भेज दो। मैंने धरती पर भी स्वर्ग सुख लूटा है। मुझे कष्ट सहने की आदत नहीं है। मेरे साथ आप अन्याय कर रहे हैं। मैंने जनता की सेवा की और मुझे नरक मिला? अगर ऐसा ही रहा तो भला कौन समाज-सेवा के लिए आगे आएगा, राजनीति में आकर भला कौन देश चलाएगा। बोलिए?"

यमराज गंभीर हो गए। आँखों में यकायक आँसू भर आए। उन्होंने यमदूत को एक सूची सौंपते हुए कहा, "जाओ, इन लोगों को स्वर्ग से ससम्मान ले आओ।" फिर नेता की तरफ़ मुख़ातिब होते हुए यमराज बोले, "अभी पता चल जाएगा कि तुम्हें नरक क्यों मिला!"
जीवन-भर दूसरों पर हँसने वाला नेता, जनता के आँसुओं से अपने जीवन की बुनियाद सींचने वाला नेता आज रो रहा था। तभी यमदूत आया, कुछ लोग उसके पीछे खड़े थे। वे चमकदार वस्त्रों से सुसज्जित थे। उन्होंने यमराज को प्रणाम किया। जैसे ही इन लोगों की नज़र नेता पर पड़ी, सब के सब चीखने लगे, "महाराज, यही है पापी, जिसके कारण हमारी अकाल मौत हुई, हमारा परिवार तबाह हो गया। इस अधम को कठोर से कठोर दंड दिया जाए।"
यमराज ने मुस्कराते हुए कहा, "हम इसे दंड ज़रूर देंगे, यही तो हमारा काम है।" यमराज ने नेता से पूछा, "इन चेहरों को पहचानते हो?"
नेता ने हकलाते हुए कहा, "ना नहीं, आज से पहले मैंने इन्हें कभी नहीं देखा।"
यमराज ने नेता को फटकारते हुए कहा, "राजनीति में रहकर, जीवन-भर झूठ बोलकर तुमने अपनी आत्मा को कलुषित कर लिया है, नेता। झूठ ही तुम्हारी राजनीति रही, अय्याशी तुम्हारी समाज-सेवा। आओ, इन तमाम चेहरों से तुम्हारा परिचय करा दूँ, शायद तब इन्हें पहचान सको।
"इस महिला को पहचानते हो? यह शिक्षिका थी। तुमने तबादला करवाने का प्रलोभन देकर इसे अपने निवास पर बुलाया और इसके साथ बलात्कार किया। बाद में लोक-लाज के कारण इसने आत्महत्या कर ली।
"इसे पहचानते हो? यह है समाजसेवी संपादक दयाराम, जिसकी तुमने हत्या करवाई क्यों कि यह तुम्हारी सारी पोलपट्टी जानता था। इसके पहले कि तुम्हारी घिनौनी तस्वीर जनता के सामने रखता, तुमने इसे ट्रक से कुचलवाकर मरवा डाला। लोगों ने समझा, दयाराम सड़क-दुर्घटना में मर गए लेकिन हम जानते हैं असलियत।
और हाँ, इसे पहचानते हो कि नहीं? यह वह शख़्स है, जिसे तुमने भ्रष्टाचार के झूठे आरोप लगवाकर इसलिए नौकरी से हटवा दिया क्यों कि इसने तुम्हारे भतीजे को सिफ़ारिश के बावजूद नौकरी पर नहीं रखा था। एक दिन इसकी हृदय-गति रुकी और इसका काम तमाम हो गया।
इन्हें भी शायद तुम नहीं पहचान पाओगे। ये पाँचों उस स्कूल के बच्चे हैं, जिस का तुमने शिलान्यास किया था। कमीशन खाकर तुमने ठेकेदार को काम दिलवाया और उसने रेत की शाला तैयार कर दी थी। परिणाम यह हुआ कि एक दिन कमज़ोर छत गिर पड़ी और दबकर ये बच्चे मर गए।
और इन्हें भी तुम नहीं पहचानते होंगे न? ये वे लोग हैं जो रेल-यात्रा के दौरान उस पुल से गुज़र रहे थे, जिसे तुम्हारे ख़ास पसंदीदा ठेकेदार ने बनवाया था। यह पुल दूसरी बरसात में ही ढह गया।
कुछ और लोग हैं तुम्हारे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अत्याचारों से पीड़ित और तुम कहते हो कि तुमने समाज-सेवा की?"

यमराज गुस्से में तमतमा रहे थे, "बोलो, क्या यही थी तुम्हारी समाजसेवा? यही थी तुम्हारी राजनीति? सच कहना, तुमने पाप किए हैं न? यह जन-संसद नहीं है, जहाँ तुम जीवनभर झूठ बोलते रहे, यह यमलोक है यमलोक! बोलो, चुप क्यों हो?"
नेता ने अपनी हार स्वीकार कर ली। उसने यमराज की ओर कातर नज़रों से देखते हुए कहा, "कहाँ है मेरी कालकोठरी? मुझे वहाँ ले चलो, मुझे वहाँ ले चलो।"
नेता फूट-फूट कर रो रहा था।
यमराज आश्चर्य चकित थे। उन्होंने ज़िंदगी में पहली बार किसी नेता को इस तरह रोते हुए देखा था।

(पुरवाई से साभार)

24 दिसंबर 2006