हास्य व्यंग्य

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जिस रोज़ मुझे भगवान मिले
तरुण जोशी
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'ना माया से ना शक्ति से भगवन मिलते हैं भक्ति से', एक खूबसूरत गीत है और इसको सुनने के बाद लगा कि अगर मिलते होते तो भी प्रभु हमको मिलने से रहते। क्यों कि माया हमें वैसे ही नहीं आती, शक्ति हममें इतनी है नहीं और भक्ति हम करते नहीं, तो कुल जमा अपना चांस हुआ सिफ़र। लेकिन वो कहते हैं ना कि बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले ना भीख तो एक दिन बिन बुलाए मेहमान से भगवान हम से टकरा ही गए। अब इससे आगे का हाल अति धार्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत सज्जन और देवियाँ ना पढ़ें, इसको पढ़कर आपके मन के क्षीरसागर में उठने वाले तूफ़ान के हम ज़िम्मेदार नहीं होंगे और हमें गालियाँ देने को उठने वाले उफान के आप खुद ज़िम्मेदार होंगे।

भयानक रात में ट्रैक से लौटते हुए जंगल में जब रास्ता भटक गए तो ऐसी परेशानी में हमेशा की तरह अपने खुदा को सोते से जगाने की गुहार लगाई और तभी एक आदमी हमें दिख गया। साधारण से कपड़े पहने थे उसने, एक दो जगह से हवा आने के लिए कपड़ों में बनाई खिड़कियाँ भी नज़र आ रही थी। मिलते ही हमने कहा, भय्या हम रास्ता भटक गए हैं सही रास्ते पर कैसे आएँ पता हो तो ज़रा बता दो। वो आदमी बोला ठीक है तुम मेरे पीछे-पीछे चलो तुम्हें रास्ता अपने आप मिल जाएगा। उत्सुकता वश जंगल पार करते करते टाइम पास करने की गरज से या अंधेरी रात के सन्नाटे से उठने वाले अपने मन के डर को कम करने के लिए हमने पूछ लिया वो कौन है और इस जंगल में रात के वक्त क्या कर रहा है।

आदमी बोला, "मैं भगवान हूँ" और यहाँ शांति के साथ आराम करने आया हूँ, हमें तुरंत महाभारत के समय की याद आ गई (याद है मैं समय हूँ) लेकिन हम पूछ ही बैठे, "शांति जी दिखाई नहीं दे रही"। आदमी यानी कि भगवान थोड़ा सकपकाए फिर बोले, ''मेरा मतलब मन की शांति से है।'' हमने भी तू शेर तो मैं सवा शेर की तर्ज़ पर एक और सवाल पूछ लिया, "तो कौन से भगवान हो? अगर शिव हो तो ये कपड़े क्यों पहने हैं, ना साँप ना अर्धचंद्र ना भस्म और तो और गंगा भी नहीं दिखाई दे रही। और अगर विष्णु तो ये साधारण से वस्त्र क्यों? ना मुकुट ना गहने बग़ैर शेषनाग कैसे और ब्रह्मा हो तो पैदल क्यों? कमल कहाँ है?'' बोले, ''ये लोग कौन हैं?'' मैंने कहा, ''बड़े पहुँचे हुए भगवान हैं, भगवन बोले लेकिन मैं तो एक ही हूँ ये कैसे हो सकता है। ये ही नहीं अपने यहाँ तो सुनते हैं ३३ करोड़ देवी देवता हैं जिन्हें हम भगवान कहते हैं,'' कहने की बारी हमारी थी। हमारी बात सुन भगवान का मुँह खुला का खुला, हमने सोचा हमारी बात दोहरा रहे हों, फिर लगा ३३ कहने में मुँह तो नही खुलता। इसलिए थोड़ा हिलाया, भगवान जैसे नींद से जागे हों बोले अच्छा गिनाओ। अब चित होने की बारी हमारी थी हमें तो जैसे साँप सूँघ गया।

अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में घूस तो गए अब निकले कैसे ये सूझ नहीं रहा था। ३३ करोड़ सुना था, कौन हैं ये तो अपने फ़रिश्तों को भी शायद ही मालूम हो। द्रौपदी की तरह लाज बचाने वाला कोई नहीं था अपनी इज़्ज़त खुद ही बचानी थी सो हिम्मत कर गिनती शुरू करी। लेकिन २5 से ऊपर जाने के वांदे दिखने लगे (हालत ख़राब होने लगी) फिर बड़ी कोशिश कर गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी नदियाँ और चंद्र, मंगल, सूर्य जैसे ग्रह जोड़ संख्या किसी तरह 40 तक पहुँचाई। फिर सोचा दक्षिण में लोग फ़िल्मी हीरोइनों के भी मंदिर बना देते हैं क्यों ना उनकी भी गिनती कर ली जाय लेकिन अंदर से हमें लग गया था कि अपने पूर्वजों के साथ-साथ दुनिया की प्रमुख हस्तियाँ भी गिनवाएँगे तो भी शायद ही ३३ करोड़ का टच डाउन कर पाएँ। हम उस घड़ी को कोस रहे थे जब किसी ने हमें ३३ करोड़ देवी देवता होने की बात बताई थी।

नेताओं की देखा देखी बात बदलने की गरज से हमने दूसरा मुद्दा छेड़ दिया। हमने पूछा, अच्छा ये बताएँ कि खुदा से रोज़ मुलाक़ात होती रहती है या आप लोगों का भी वही रिश्ता है जो आप लोगों के बंदों का यानी मैं बड़ा, मैं बड़ा। हमारे खुदा का मतलब विस्तार से समझाने के पश्चात भगवन नाराज़गी भरे शब्दों में बोले, "मैंने कहा ना मैं एक हूँ"। हमने नहले पर दहला मारते हुए तुरंत कहा, "ज़रा ठीक ये याद कर लीजिए, हो सकता है कुंभ के मेले में आप लोग बिछुड़ गए हों"।

ये सुन भगवन की भृकुटी तन गई, अपनी हालत उस मेमने की तरह हो गई जिसने अचानक शेर देख लिया हो, बदकिस्मती ऐसी कि अपने भगवान को भी याद नही कर सकते थे डर था कि कहीं ये आग में घी का काम ना कर दे। तभी गरजती-सी आवाज़ सुनाई दी जैसे कोई नेता सरकार की पतलून उतारने के लिए या जनता से वोट माँगने के लिए गरजता है, 'मैं एक ही हूँ, मैं ही हूँ जिसे तुम भगवान या खुदा कह रहे हो, मैं ही प्रारंभ मैं ही अंत। मैं ही नारी मैं ही पुरुष, मेरा कोई रूप नहीं मैं हूँ निराकार। मैं ही हूँ शक्ति पुंज, अनंत शक्तियों का संगम।" अपनी सिट्टी-पिट्टी गुम, दिल इतने ज़ोर से धड़कने लगा जैसे सैकड़ों मल्लिका शेरावत सामने आ खड़ी हों लेकिन मन में कहीं अपने अर्जुन होने का एहसास हो रहा था।

नेताओं की तरह तुरंत पाला बदलते हुए अपना आत्म सम्मान, अपना दिल-दिमाग़ सब कुछ अपनी जेब में रख हाथ जोड़ के हम बोल पड़े, "बस भगवन बस सब समझ गया। लेकिन शक का इलाज तो किसी वैध के पास है नहीं मन अभी भी शक कर रहा था कि ये भगवान कैसे हो सकते हैं, इतनी देर से हमसे बात कर रहे हैं और हमको अभी तक एक बार भी "वत्स" कहकर संबोधित नहीं किया। बातें तो बहुत पूछनी थी लेकिन डर इस बात का था कि कहीं कोई श्राप ना दे दें। वैसे श्राप से ज़्यादा इस बात का डर था कि कहीं जंगल में अकेला छोड़ दिया तो जंगली जानवर सूदख़ोरों की तरह बोटी-बोटी नोच डालेंगे।

अपनी सोच में डूबे हम चुपचाप वैसे ही चल रहे थे जैसे सीता और लक्ष्मण राम के पीछे-पीछे वनवास को चल दिए थे। तभी आवाज़ आई 'तुम्हारा नाम क्या है वत्स'? हमारे पैर से जैसे ज़मीन खिसक गई हो ऐसा झटका लगा जैसे किसी नेता को कुर्सी छीन जाने पर लगता है। हमें लग गया कि ये जो भी है हमारा दिमाग़ पढ़ सकता है इसलिए सोचने का काम तो करना ही नहीं है, बस बोलते जाओ अगर सोचने वाली बात इसने पढ़ ली तो हम तो सौ प्रतिशत काम से गए। तुरंत बोले, "निठल्ला"। भगवन ऐसे देख रहे थे जैसे कह रहे हों ये भी कोई नाम हुआ, अच्छा काम क्या करते हो? अगला सवाल था। हमने कहा, ''चिंतन, क्या?'' भगवन बोले, ''हमने फिर ज़ोर देकर कहा, "निठल्ला चिंतन"। भगवन किसी नासमझ प्रेमिका जैसे बोले, "वो क्या होता है"? हमने समझाया, "कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानमती ने कुनबा जोड़ा।" ये होता है। जनता की तरह भगवन बोले, ''अच्छा जाने दो जैसे कह रहे हों जब निठल्ला चिंतन समझ में नहीं आया तो भानमती के कुनबे की बात कैसे समझ में आएगी।

फिर प्यार से बोले, ''अच्छा अब हमारे भगवान होने पर यकीन आया कि नहीं।'' हाथ जोड़ अपनी सारी हिम्मत जुटा हम बोलें, "क्षमा प्रभु, लेकिन मन में कई संशय है।'' जैसे?, रहने दो प्रभु मान लिया आप ही हो पालनहार, हमारी इस जंगल से नैय्या पार लगा दो बस। भगवन किसी प्राइवेट बैंक का लोन लेने के लिए समझाने वाले एजेंट की तरह मिठास घोलते हुए बोले, "कोई संशय लेकर यहाँ से मत जाओ, पूछो क्या पूछना है।" हमने हिम्मत कर कहा, ''अपना विराट स्वरूप मत दिखाईएगा मैं कोई अर्जुन नही, समझ और झेल नही पाऊँगा।''

थोड़ा साहस दिखा मैं फिर से शुरू हुआ, एक बात बताओ भगवन, ''मस्जिद में औरतों और आदमियों के लिए अलग-अलग स्थान क्यों, उनके लिए समान नियम क्यों नहिं।'' ''अब ये तो उन्हीं से पूछो जिसने मस्जिद बनाई मेरा काम तो सिर्फ़ आदमी बनाना (जन्म देना) और मिटाना (मारना) है,'' भगवन बोले। अच्छा ये बताइए कि किसी-किसी मंदिर में रजस्वला स्त्री के प्रवेश में प्रतिबंध क्यों? भगवन बोले, ''एक बार कहा ना ये मस्जिद बनाने वाले जाने,'' मैंने बीच में टोका, ''भगवन मैं मंदिर की बात कर रहा हूँ, दोनों में फर्क है।'' ''क्या फर्क है?'' भगवन बोले, ''दोनों में तुम मुझे ही पूजते हो बावजूद इसके कि मैं ना किसी मंदिर में रहता हूँ ना किसी मस्जिद में।''

भगवन ने उलटा सवाल दाग दिया, ''अच्छा ये बताओ कि एक शहर में कुल मिलाकर कितने मंदिर मस्जिद होंगे?'' मैंने जवाब दिया, ''सारे धार्मिक स्थल मिला कम से कम ३0-40 तो होंगे ज़्यादा भी हो सकते हैं।'' ये सुन भगवन मुस्कराने लगे, ''मैंने इसकी वजह पूछी तो जवाब मिला, "अब मैं तुम्हारे ३३ करोड़ भगवानों का गणित समझ गया इसलिए।'' बात काट हमने कहा, ''फिर काहे मंदिर के अंदर की मूर्त को इतना सजा के क्यों रखा जाता है जब आप वहाँ नहीं रहते। तुम खुद सोचो कोई किसी पत्थर के अंदर कैसे रह सकता है,'' भगवन ने पलट वार किया। ''हर इंसान के अंदर मेरा भी एक अंश रहता है लेकिन उसे कोई नहीं ढूँढता, तुमने जो राम कृष्ण गिनाए थे वो क्या पत्थर से निकले थे।''

मैंने कहा, ''नहीं,'' बात में वज़न था, सोचने लगा बात तो सही है वो भी हमारी ही तरह इंसान थे और अंत में इनसानों की तरह मृत्यु को प्राप्त हुए अब भला भगवान कैसे मर सकते हैं। कैसे भला एक बहेलिया एक तीर से भगवान को मार सकता है, भगवान की संतान भी भगवान होनी चाहिए फिर लव-कुश को काहे लोग नही पूजते। भगवान के माँ-बाप भी भगवान होने चाहिए फिर दशरथ सिर्फ़ एक राजा बनके क्यों रह गए इतिहास के पन्नों पर। मैं खुद ही अपने सवालों में उलझने लगा था।

सामने रोड दिखाई देने लगी थी यानी कि मैं फिर सही रास्ते पर आने वाला था। रोड पर पहुँच मैं किसी गाड़ी का इंतज़ार करने लगा। दूर से एक गाड़ी आ रही थी, सोचा जब तक गाड़ी पास आती है क्यों ना एक सवाल और दाग़ दिया जाय। अच्छा प्रभु ये बताइए कि यहाँ इंसान एक दूसरे के खून के प्यासे क्यों हो रहे हैं, आतंकवाद, धार्मिक उन्माद, भूकंप, बाढ़, प्राकृतिक आपदाएँ ये सब क्यों? सुख और खुशी के साथ सब मिलकर क्यों नहीं रहते? भगवन बोले, "बेवक़ूफ़ अगर ये सब ठीक कर दिया तो धरती स्वर्ग ना हो जाएगी, जब कोई दुख ही नहीं रहेगा तो फिर मुझे कौन पूछेगा।''

मुझे अपने को बेवक़ूफ़ कहे जाने पर बड़ा गुस्सा आया, जंगल निकल चुका था अब इतना डर भी नहीं था इसलिए नाराज़गी दिखाने के लिए पीछे मुड़ा तो देखा वहाँ कोई नहीं। जो इतनी देर से अपने को भगवान बता रहा था उसका दूर-दूर तक कोई पता नहीं। सिर्फ़ जंगल दिखाई दे रहा था, अपनी तो खोपड़ी ही घूम गई तभी बस वाले ने ज़ोर से हौर्न बजाया, मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। घड़ी का अलार्म बज रहा था, ७ बज गए थे यानी कि काम पर जाने का वक्त हो गया था। मैं आँखे मलता बाथरूम की ओर चल दिया। पड़ोस से कहीं गाने की आवाज़ आ रही थी।

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सब को सन्मति दे भगवान।
माँगों का सिंदूर ना छूटे, माँ बहनों की आस ना टूटे,
देह बिना भटके ना प्राण, सबको सन्मति दे भगवान।
ओ सारे जग के रखवाले, निर्बल को बल देने वाले,
बलवानों को दे दे ज्ञान, सबको सन्मति दे भगवान।।

मैं तैयार हो ऑफ़िस को चल दिया, रास्ते में हर आदमी को ग़ौर से देखता जा रहा था सोच रहा था आज से सबके साथ प्यार से पेश आना है, सबको इज़्ज़त देनी है क्यों कि किसे क्या पता ना जाने किस भेष में नारायण मिल जाय।

२४ मार्च २००७