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हास्य व्यंग्य


राधेलाल का कुत्ता
प्रेम जनमेजय


सुबह-सुबह स्वास्थ्य लाभ के लिए सभी को घूमने का शौक होता है। किसी के लिए घूमना विवशता होती है,किसी के लिए आवश्यक्ता और किसी के लिए शौक।
आज सुबह देखा तो सामने से राधेलाल जी एक कुत्ते की जंजीर थामे, कुत्ते के कारण कभी दक्षिण और कभी वाम की ओर खिंचते, चले आ रहे हैं। समझ नहीं आ रहा था कि वे कुत्ते को घुमा रहे हैं या कुत्ता उन्हें घुमा रहा है। ये दृश्य लगभग वैसा ही था जैसा द्रौपदी के चीरहरण के समय मैथिलीशरण गुप्त ने चित्रित किया है-
नारी बिच सारी है कि सारी बिच नारी है
सा
री ही की नारी है या नारी ही की सारी है

भ्रम का जो सबंध द्रौपदी और साड़ी का था वही राधेलाल और उनके कुत्ते का था। राधेलाल क्या, इस कुत्ता-घुमावन प्रक्रिया में सुबह-सुबह सभी के साथ लगभग ऐसे ही दृश्य पाए जाते हैं।
कुत्ता उनको खींचते हुए बायीं ओर जाता तो राधेलाल जी कहते- स्टॉप टॉमी, स्टॉप।
कुत्ता स्टॉप होने के स्थान पर उन्हें दक्षिण की ओर ले जाता तो राधेलाल जी फिर कहते-स्टॉप टॉमी, स्टॉप।’
कुत्ता स्टॉप नहीं हो रहा था और उनको भटका रहा था। पैसंठ बरस के राधेलाल का हाँफ-हाँफ कर बुरा हाल हो गया था। माथे पर आया पसीना टपकने लगा था। मुझसे उनका भटकाव देखा नहीं जा रहा था। मैंनें टॉमी को रोकने की कोशिश करने के इरादे से कहा- टॉमी रुक,एंड डू ठीक से बिहेव ।’
आप चमत्कार देखें टॉमी वहीं रुक गया और दुम हिलाने लगा।

- ये क्या कुत्ता मेरा और बात इसने आपकी मानी ? ये कैसा चमत्कार?
- ये मेरा चमत्कार नहीं है राधेलाल जी, ये हिंगलिश का चमत्कार है। ये नयी मार्डन नस्ल का हिंदुस्तानी कुत्ता है, ये हिंगलिश समझता है।’’
- तभी मैं कहूं कि ये मेरी बात कम और कालेज जाने वाले लड़के-लड़कियों की बात अधिक समझता है।’
- फिर तो इसका प्रशिक्षक नहीं, कोई ट्रेनर होगा, कौन है इसका ट्रेनर?
- एक बड़ा-सा खूबसूरत दिखने वाला पब्लिक स्कूलीय नौजवान।
- राधेलाल जी आप तो इसे अपनी उम्र के किसी प्रशिक्षक से प्रशिक्षण दिलवाते तो अच्छा होता। पर राधेलाल जी यह ब
ताइए, आपको तो कुत्तों से खासी नफरत थी, फिर ये बगल में कुत्ता कैसा?

राधेलाल ने कुत्ते को पास ही बिजली के खंबे से बाँधा और एक लंबी साँस लेकर बोले- नफरत तो मुझे अब भी उतनी ही है , पर आप तो जानते ही हैं कि अनेक काम मजबूरी में करने पड़ते हैं, वो कहते हैं न कि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। मेरी मजबूरी का नाम मेरी पत्नी यानि तुम्हारी भाभी है।’
--भाभी जी को इस उम्र में ये क्या शौक चराया, ये शौक तो अक्सर घर में बच्चों को चराता है ?’
- उसको भी शौक नही चराया है पर मामला उम्र और बच्चों से जुड़ा है।’
- मतलब?
- मतलब ये कि, प्रेम भाई आप जानों अपनें दोनों बच्चे अमेरिका में हैं और उनका मन अपने देश में नहीं लगता और हमारा मन अमेरिका में नहीं लगता है। घर में हम दोनों अकेले हैं। तुम्हारी भाभी हैल्थ इज वेल्थ की मालकिन है और इस कारण थुलथुल है। शरीर के हर जोड़ दुखता है। अब तो घर में चलने - फिरने तक में दिक्कत होती है। अब तुम जानो कि मुझे अपने काम से घर से बाहर जाना होता है, वो अकेली भी हो जाती है। उसकी सहायता के लिए हमने ये प्रशिक्षित कुत्ता ले लिया है। बहुत बढ़िया कुत्ता है। एक इशारा भर कर दो फट दौड़कर काम कर देता है। गले में लिखकर
डाल दो तो दूध, फल - सब्जी सब कुछ ले आता है। घर की रखवाली अलग से करता है।’’

-- इसके लिए तो आप घर में कोई गरीब नौकर रख सकते थे, उसको रोजी-रोटी मिल जाती, खाना-पीना मिल जाता, एक आदमी का भला हो जाता।’
- पर हमारा भला नहीं होता, प्रेम भाई! आप तो जानते ही हो, रोज अखबारों में किस्से भी पढ़ते होगे, आजकल ये नौकर लोग बड़े-बूढ़ों को मारकर सब लूट ले जाते हैं। आदमी का कहीं विश्वास रह गया है ? आदमी को सोने-चाँदी, रुपए-पैसे का लालच होता है, कुत्तों को नहीं होता।’ इसके बाद कुछ उदासी स्वर के साथ बोले- प्रेम भाई, आपके बच्चे आपके कहे को मना कर सकते हैं, आपकी इच्छा को दुत्कार सकते हैं, पर ये कुत्ता कभी ऐसा नहीं करेगा और जब तक जिंदा है आपको छोड़कर भी कहीं नहीं जाएगा।’ उनके पास सुबह-सुबह शायद रुमाल नहीं था इसलिए उन्होंनें अँगुलि से आँख में आई आँसू की बूँद को समेट लिया।
मामला दुखदायी होता देख मैंनें उसे खूबसूरत मोढ़ देते हुए कहा-ये कुत्ता है या कुतिया?’
-- कुत्ता, क्यों?’’
-- इससे तो आप संकट में फँस सकते हैं।’’
--संकट में! इसमें संकट क्या है?’
- भाभी जी के लिए तो आपको कुतिया ही पालनी चाहिए थी। कल कुत्ता-समुदाय में भी नारी-विमर्श की बहस चल गई तो आपके खिलाफ आंदोलन हो जाएगा।’
राधेलाल ने खंबे पर चेन से बँधे कुत्ते को खोला ओर मुस्कराते हुए बोले- मुझे संकट कैसा, मैं कोई आपकी तरह साहित्यकार हूँ?’

१९ जुलाई २०१०

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