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मैं बैठा रहा। खटखटाहट फिर हुई। और तब मैं अपनी जगह से उठ कर दरवाजे की ओर बढ़ा। मेरे खोलने से पहले खटखटाहट एक बार फिर हुई। दरवाजा खुलते ही उसने कहा - हेलो! सो रहे थे क्या?
वह जितनी सुंदर थी, उतनी ही भद्दी थी उसकी वह आवाज़। सफेद ब्लाउज और नीले रंग के मिनी स्कर्ट में थी वह। उसकी कमर में वही जंजीर नुमा रोल्ड-गोल्ड की पेटी थी, जिसके लिए मेरी बहन कई दिनों से मेरे पीछे लगी हुई थी। फैशन के बाज़ार में वह लेटेस्ट था। दुकान तक पहुँच कर भी मैं उसे नहीं खरीद सका था, क्यों कि कीमत काफी ऊँची थी, उसकी आँखों पर मस्कारा स्पष्ट था। होठों की लाली गुलाबी और लाल के बीच के रंग की थी। मेरे कुछ कहने से पहले ही मुस्कराती हुई वह भीतर आ गयी।

मेरे दरवाजे बंद कर लौटते-लौटते वह सोफ़े पर बैठ चुकी थी और उसका बटुआ हाथ में झूल रहा था। वह कुछ कहती कि इससे पहले ही मैं बोल उठा - रसोई उस ओर हैं।
- जानती हूँ। उसने अपनी उस मुस्कान को बनाए रखा।
मैं उससे यह नहीं सुनना चाहता था कि वह पहले भी इस घर में आ चुकी थी, इसलिए आगे बिना कुछ कहे मैं सामने के सोफ़े पर बैठ गया। उसके वी वी स्टाइल बालों के उपर वहीं गोल्डन पिन था, जिसका डिजाइन मेरे पिता की मेज़ पर के सोख्ते पर था। उसे अपनी ओर एक टक घूरते पा कर मैंने उसे लड़का और अपने को लड़की महसूस किया। मैंने पलकें झुका लीं। मुझे यह समझने में बड़ी कठिनाई हो रही थी कि सोफिया घर के कामों को संभालने आई थी या घर ही को।
जिस ढंग से सोफ़े पर बैठी थी, उससे उसकी ओर आँखें उठा कर देखना मुझसे नहीं हो रहा था। उस हालत में उसका मिनी स्कर्ट और भी मिनी हो चला था। अपनी आंखों की ललक को मैंने अपने ही पैरों पर लोटने दिया। मेरी आंखों की हिचकिचाहट और झिझक को समझकर उसने कहा- क्या बात है सोनी?
- कुछ नहीं।
- गंवार लड़कियों की तरह सिर झुकाए क्यों बैठे हो?
मन में आया कि पूछूँ, आखिर मुझे करना क्या हैं, पर चुप रह जाना बेहतर समझा; लेकिन सोफिया को चुप रहना गवारा नहीं था। उसने अपनी भद्दी आवाज़ में मृदुलता लाने का प्रयास करते हुए कहा - तुम एक प्राइमरी स्कूल के बच्चे-से लग रहे हो।
मुझे उसकी यह बात ज़रा भी पसंद नहीं आई। मैंने कभी यह नहीं चाहा कि कोई मुझे बच्चा समझे। यह प्रमाणित करने के लिए कि मैं बच्चा नहीं था, मैंने एक समूचे मर्द की नज़र से उसकी ओर देखा।
अपने एक पैर को दूसरे पैर पर रखते हुए वह हँस पड़ी। उसकी उस हँसी में व्यंग्य था, जिसमें मेरी आँखों की स्निग्धता और भी बढ़ गयी। उसका स्कर्ट कुछ उपर हो गया था, जिससे उसकी जाँघों का गोरापन हँसता-सा लग रहा था। मैंने अपने को विचलित-सा पाया। तभी उसने अपने हाथ की चेन को नीचे गिरा दिया, जिसे वह अपनी अंगुली पर घुमा रही थी। वह उसे उठाने के लिए झुक गयी। उसके ब्लाउज का खुला हुआ ऊपरी भाग कुछ और अलग हो गया, जिससे मेरे अपने शरीर में सनसनी-सी दौड़ गयी। मेरी धमनियों का खून खौल-सा गया। उसने मेरी ओर देखा और मैंने उसकी आँखों में अजीब सा भाव पाया, जिसमें शायद व्यंग भी मिश्रित था। हँसते हुए उसने पूछा - मेरी उपस्थिति तुम्हें खल तो नहीं रही हैं?
- नहीं तो -
- तुम घबराए-से लग रहे हो।
बिना कुछ कहे मैं कुछ अधिक संभल कर बैठ गया। ऐसा करते हुए मैंने अपने भीतर की घबराहट को सचमुच ही झकझोर डालने का प्रयत्न किया।
-क्या पियोगे तुम! घर की मालकिन के स्वर में उसने प्रश्न किया।
- कुछ नहीं।
- पर मुझे तो प्यास लगी है। मैं फ्रिज से तुम्हारे लिए भी कुछ निकाल लाती हूं।
इसमें ज़रा भी शक नहीं था कि वह हमारे घर के चप्पे चप्पे को जानती थी।
वह सोफ़े से उठ कर रसोईघर की ओर जाने लगी। मैं उसकी चाल को देखता रहा, जिसमें पर्याप्त अदा थी। अकेले रह जाने पर मेरे खयाल और भी विद्रोह कर उठे। कई तरह की बातें मेरे दिमाग में कौंधने लगीं थीं। ऐसा लगा मैं अपने आप में नहीं था। अब तक सोफ़िया के प्रति मेरे भीतर नफरत के जो भाव थे, वे मेरे विद्रोही खयालातों से दब गए थे।
उसकी वे आंखें! वे होंठ! वह उभरा हुआ ब्लाउज! वहाँ की संपूर्णता! फिर मिनी स्कर्ट का कुछ अधिक मिनी हो जाना, वह गोरा रंग!
मुझे अपने भीतर की गर्मी का खयाल आया। एक गर्मी जो कांप रही थी। ये बातें एकदम नई तो नहीं थीं फिर भी नई नई सी लगती थीं नफरत के खत्म हो जाने का मतलब होगा, उससे प्यार हो जाना। मुझे उससे प्यार नहीं था। वह केवल चाह थी जो उसके लिए मैं अपने में महसूस कर रहा था।

उसकी क्षणिक अनुपस्थिति में मुझे अपनी माँ की याद आई और अपने पिता की भी। दूर से आती हुई एक अस्पष्ट आवाज़ की अनुध्वनि भी मुझे सुनाई पड़ी और ऐसा लगा कि वह मेरी माँ की आवाज़ थी, यह कहती हुई कि मुझे उसके हक की हिफ़ाज़त करनी चाहिए। दो गिलासों में फ्रूट जूस लिए वह आ गयी। मेरे एकदम पास आ कर उसने एक गिलास मुझे थमाया। उसके कपड़े और संभवत: समूचे शरीर से एलिजाबेथ आर्डन की भीनी भीनी गंध आ रही थी। उस गंध में एक भारी कशिश थी। एक मूक आमंत्रण था। अपने सोफ़े पर बैठ कर उसने कहा - तुम दूरी पर बैठे हो!
आज्ञाकारी नौकर की तरह मैं उसके एकदम पासवाले सोफ़े पर जा बैठा। गिलास से पहली चुस्की लेती हुई वह मुझे एक टक देख रही थी। मैंने भी अपने में दृढ़ता लाते हुए वैसा ही करने का प्रयत्न किया। मुझे ऐसा लगा कि मेरी नज़र उससे सट गई हो। हैरत हुई, पर उसे होना था। बात कुछ भी हो, कोई इस बात को नकार नहीं सकता कि सोफिया निहायत हसीन थी।

मेरा दिल जोरों से उछलने लगा था। धड़काने तेज़ हो चली थी। मेरे भीतर का भाव तीव्रता पा चुका था। भीतर की ऊष्मता मेरी आँखों तक आ गयी थी। समुद्र के ज्वार भाटे की तरह कोई चीज मुझमें ऊधम मचा रही थी। सोफिया का गोरा हाथ मेरे सोफ़े पर टिका हुआ था। उसकी पतली-पतली अंगुलियाँ गोया प्यानो पर हों, मन में उन अँगुलियों को अपने हाथों में लेने की इच्छा हुई। यह सोच कर कि शायद उसमें बिजली हो, मैं हिचकता रहा। लेकिन जब मेरे इरादे को जैसे ताड़ती हुई उसने मुस्करा दिया, उस समय मेरा डर जाता रहा। हिचकिचाहट जाती रही और मैंने अपने हाथ को उसके कोमल हाथ पर इस तरह गिर जाने दिया। जैसे कि अनजाने में वैसा हो गया हो। उसने अपने हाथ को ज्यों का त्यों बनाए रखा और मैंने अपने में साहस का अनुभव किया। मेरी अंगुलियाँ उसकी अँगुलियों से खेलने लगी। वह मुसकुराती रही और मेरा हाथ उसके हाथ की चूड़ियों पर जा पहुँचा था। चूड़ियों की झनकार से मेरे भीतर के तार-तार भी झनझना उठे।
मन ही मन मैंने अपने को मर्द माना और दूसरे ही क्षण में सोफिया की बगल में था। मेरे ललाट से बालों की एक आवारा लट को अपनी पतली अँगुलियों से हटाते हुए उसने कहा - तुम काँप रहे हो!
- नहीं तो। पूरे विश्वास के साथ मैंने कहा।

अपने जीवन में किसी औरत के इतने अधिक निकट मैंने अपने आपको कभी नहीं पाया था। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मेरी किशोरावस्था यहाँ समाप्त हो गयी थी। और एक नई अवस्था का श्रीगणेश हुआ था। इसको कभी न कभी तो आना ही था। अगर कुछ पहले आ गयी तो हर्ज ही क्या था। सभी कंपन और गर्म धड़कानों के साथ मैंने सोफिया को अपनी बाहों में बांध लिया। वह निर्जीव-सी बंध गयी। उसे अपनी आँखे मूँदते देख मुझे आश्चर्य हुआ, पर तभी पुस्तकों में पढ़ी बातें याद आ गयी और मैंने उसे एक प्रत्यक्ष आमंत्रण समझा। सचमुच ही वह दावत थी।

मुझे अपनी माँ की याद आई। उसकी आवाज़ की वही अनुध्वनि फिर सुनाई पाड़ी। मुझे पूरा विश्वास था कि मैं अपनी माँ की बात को कभी भी टाल नहीं सकता। उसके हक को बनाए रखने में अगर मैं उसके काम नहीं आया, तो फिर और कौन आ सकता था!

जितना मैं अपने पिता को समझता हूँ, उतना मेरी माँ भी नहीं समझती। मैं भली भांति जानता हूँ कि किन चीजों से मेरे पिता को प्यार है और किन चीजों से घृणा! वे किस बात के लिए किसी के दास बन सकते है और किस बात के लिए किसी को दुत्कार सकते हैं, मैं यह भी जानता हूँ। मुझे उपाय मिल गया था, जिससे मैं उनके भीतर सोफिया के लिए नफरत पैदा कर दूँ। सौदा महंगा था, पर मुझे अपनी माँ का खयाल था। एक तरह से सौदा तनिक महँगा नहीं था, क्यों कि मैं जवान हो हो चला था और...

मैंने जो बातें सोची थी, वे सच निकली। बाहर मोटर रुकने की आवाज सुनाई पड़ी। मुझे मालूम हो गया कि मेरे पिता पहुँच गए हैं। मेरे दोनों हाथ सोफिया के बालों पर दौड़ते हुए उसके कानों पर आ गए थे, जिससे मोटर के रूकने की आवाज उसे नहीं सुनाई पड़ी।
चंद मिनटों में मेरे पिता भीतर आ जाएँगे। आज तक उन्होंने कुछ भी नहीं देखा था, पर मैं चाहता था कि आज वे कुछ देखें, अपनी आँखों से देखें और जिस बात पर उन्हें बहुत पहले विश्वास करना चाहिए था, आज कर लें। अब तक सोफिया की बाहों ने भी मुझे जकड़ लिया था। अपनी पूरी ताकत के साथ उसे अपने शरीर से कस कर मैंने अपने काँपते होठों को उसके गर्म होठों पर रख दिया। वह मुझसे अधिक सक्रिय थी। तभी एकाएक दरवाजा खुला और उस ओर बिना देखे ही मुझे मालूम हो गया कि मेरे पिता सामने खड़े अनहोनी देखते हुए काँप रहे होंगे।
प्रश्न !
उनमें हमारे सामने पहुँचने की हिम्मत थी? या अपनी वापसी जताए बिना ही वे लौट जाएँगे?

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१५ अक्तूबर २०००

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