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पर्व पंचांग   २. ६. २००८

इस सप्ताह-
समकालीन कहानियों में
भारत से राजश्री की कहानी नीचे वाली गली

बूँदाबाँदी फिर से चालू होते ही प्रियंवदा और एरिक ने अपनी अपनी छतरियाँ खोल ली। वे छतरियों को दोनों हाथों से मज‍बूती से पकड़े गिट्टी वाली कच्ची-पक्की पहाड़ी पगडंडी पर चल रहे थे। पगडंडी घाटी में कहीं जाती हुई लगती थी। बारिश तेज़ हो चुकी थी। पगडंडी प्राचीन से लगने वाले मंदिर पर खत्म हो गई। दोनों दौड़ते हुए मंदिर के अहाते में घुस गए। यह घाटी कुमारी पर्वतमाला के बीच थी, जिसका कुमारी पर्वत तीन नदियों का उद्गम स्थल था। नदियों के गिरने की आवाज़ मंदिर में नगाड़ों की भाँति आ रही थी। पहाड़ों से घिरी घाटी में घनघोर मानसून चारों ओर गहरे हरे अंधेरे का साम्राज्य, चारों ओर से पानी के गिरने की आवाज़, रह-रह कर कड़कती बिजली की जगमगाहट, सब कुछ मंदिर के खुले प्रांगण में रहस्यमय संसार की सृष्टि कर रहे थे। प्रकृति के रौद्र सम्मोहन ने दोनों को कुछ क्षणों के लिए निशब्द, निराकार कर दिया।

*

हास्य व्यंग्य में मनोहर पुरी की
हॉफ पैंट में मार्निंग वॉक

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डॉ मृदुल शर्मा का साहित्यिक निबंध
दहकती धूप की काव्य-छवियाँ

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पुनर्पाठ में दर्शन सेठी की कलम से
रहिमन धागा प्रेम का

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रचना प्रसंग में पूर्णिमा वर्मन का आलेख
जन्म एक लेखक का
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पिछले सप्ताह

प्रेम जनमेजय का व्यंग्य
पानी डरा रहा है
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स्वाद और स्वास्थ्य में
ख़ास-उल-ख़ास खजूर
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पूर्णिमा वर्मन का आलेख
ईमेल का खेल

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साहित्य समाचार में
साहित्यकार गुलशन मदान के सम्मान में ग़ज़ल गोष्ठी और नार्वे में स्वाधीनता दिवस,
वरिष्ठ कवियत्री प्रेमलता जैन तथा संगीतकार नरेन्द्र सिंघा नन्दी को स्व. प्रेम जी प्रेम स्मृति सम्मान
डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति सम्मान से अलंकृत,

हाइकु-२००९ व हिन्द-युग्म के लिए रचनाएँ आमंत्रित

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समकालीन कहानियों में
किरण राजपुरोहित नितिला की कहानी मशीन

गाड़ी में बैठ कर दीपांकर ने पास बैठी ममता को एक नज़र देखा। उदास ममता सूनी आँखों से दूर कहीं देख रही थी शून्य में। दीपांकर का मन हुआ उसको अपने सीने में भींच ले लेकिन वह जानता है ऐसे में वह फफक पड़ेगी। कुछ पल यों ही देखता रहा। हौले से कंधे को थपथपा दिया। गर्दन घुमा उसने दीपांकर को डबडबाई आँखों से देखा जिनमें कई प्रश्न आतुरता से जवाब के लिए तैर रहे थे। ''कोशिश करेंगे डॉक्टर'' यही कह पाया। वह खुद नहीं समझ पाया कि उन शब्दों में क्या है सूचना, सांत्वना या आशा? लेकिन ममता जानती है कि ये केवल सूचना है उसके जीवन में शनै: शनै: प्रवेश करते अंधकार के और निकट आने की। गाड़ी अपनी गति से चली जा रही थी। निस्तब्धता ने अपना अधिकार जमाए रखा।

 

अनुभूति में-
पूर्णिमा वर्मन, 
आलम खुर्शीद, शैलेंद्र चौहान, वीरेंद्र जैन और अरविंद चौहान की नई रचनाएँ

कलम गही नहिं हाथ
गरमी की तपन और ख़ैयार की तरावट का मज़ा वही जान सकता है जो इमारात में रहता है। ख़ैयार अरबी खीरा है जो यहाँ हर मौसम में मिलता है और तरह तरह से खाया जाता है। चाहे ख़ैयार-बि- लबान बनाएँ, मास्त-ओ-ख़ैयार बनाएँ या बोरानि-ए- ख़ैयार बनाएँ यह सब मिलते जुलते व्यंजन है जिन्हें खीरे को दही और पुदीने के साथ मिलाकर बनाया जाता है।  ज़ाहिर है इमारात की गरमी में दही और पुदीने के साथ मिली खीरे की तरावट का जवाब नहीं। ख़ैयार का अचार भी बनता है। कोई अरबी दावत ऐसी नहीं जो ख़ैयार के बिना पूरी हो। कोई सब्ज़ी की दूकान, कोई सुपर मार्केट कोई परचून की दूकान ऐसी नहीं जहाँ ख़ैयार न मिलता हो। रहीम दादा कह गए हैं-- खीरा मुख से काट कर मलियत लोन लगाय, लेकिन ख़ैयार तो जन्मा ही मीठा है। न मुख काटने की ज़रूरत न लोन मलने की। छिक्कल भी बिलकुल पतला जिसे छीलने तक की ज़रूरत नहीं बस खरीदो और खा लो। कुदरत ने इस देश को गरमी की सज़ा के साथ मीठे स्वादिष्ट ख़ैयार का वरदान दिया है। यहाँ शायद ही कोई घर हो जहाँ ख़ैयार रोज़ न खाया जाता हो। इस देश में जीना है तो ख़ैयार से दोस्ती बड़े काम की है क्यों कि ख़ैयार इस देश की आत्मा है और आत्मा के बिना भी कोई ज़िन्दगी होती है।
-पूर्णिमा वर्मन (टीम अभिव्यक्ति)

इस सप्ताह विकिपीडिया पर
विशेष लेख- जांजगीर का विष्णु मंदिर

सप्ताह का विचार
आंतरिक सौंदर्य का आह्वान करना कठिन काम है। सौंदर्य की अपनी भाषा होती है, ऐसी भाषा जिसमें न शब्द होते हैं न आवाज़। --राजश्री

क्या आप जानते हैं? रायपुर स्थित नगर-घड़ी में हर घंटे बजने वाले गजर के लिए छत्तीसगढ़ की 24 लोक-धुनों को स्थान दिया गया है।

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यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित होती है।

प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन¸ कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन
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