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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
भारत से कमलेश भट्ट कमल की कहानी- 'चिट्ठी आई है'


शताब्दी एक्सप्रेस ठीक समय से चल पड़ी है। इसके अनुसार कानपुर पहुँचने का समय ग्यारह बज के दस मिनट है। लेकिन प्राय: यह समय से पहले ही पहुँच जाती है- ऐसा पिछले अनुभव बताते हैं। चलो अच्छा है, मक्खन से मुलाक़ात कुछ और जल्दी हो जाएगी। साल भर से अधिक समय हो गया है मक्खन से मिले। चिठ्ठी मिल गई होगी तो वह स्वयं स्टेशन पहुँच जाएगा। रात फ़ोन पर बात करने का कितना प्रयास किया, लेकिन फ़ोन ही नहीं लग पाया। हर बार एक ही तरह का स्वर सुनाई देता रहा "कृपया डायल किया गया नंबर चेक कर लें"।

टिप-टॉप दिख रहे गाँव में जब एक के घर कोई लड़की वाला शादी के लिए आता तो विरोधी खेमे वाले उसे भड़काने के लिए हर सूरत कोशिश किया करते। अपने विपक्षी के लड़के के बारे में सही ग़लत जोड़कर उसे बदचलन और आवारा बताना ऐसी कोशिश का प्रमुख अंग होता था उससे भी काम न चलता तो खानदान के बारे में ऐसे बीसियों ऐब गिना दिए जाते जैसे पिछली सात पुश्तें उनके ही आगे जन्मीं हो। इस कुचक्र में वे उनके नाते-रिश्तेदारों तक को भी नहीं बख्शते थे। इसी बीच वाक्पटु गाँव वाले अपने पक्ष के लड़को का बखान करना भी नहीं भूलते थे। इन सबका परिणाम यह होता कि लड़की वाले भाग खड़े होते थे। संभावित विवाह में अड़चन पैदा करने के ही मुद्दे पर गाँव में हुई कई-कई फौजदारियों के मुक में आज भी कोर्ट में चल रहें हैं। ज़ाहिर है ऐसे गाँव में बेटे की शादी किसी भी माँ-बाप के लिए चुनौती बनी रहती थी और मक्खन की शादी भी ऐसे ही किसी दबाव में बहुत जल्दी हो गई थी

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