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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
भारत से प्रत्यक्षा की कहानी- ' मुक्ति'


विभु का मन बेहद अशांत था। ऐशले की हाऊस वार्मिंग पार्टी पर उसका बिलकुल मन नहीं था जाने का। पर दोनों, ऐशले और लिजा कैरी के सहयोगी थे, जाना ज़रूरी था। कालबेल बजी। मिसेज नॉर्टन थीं। मनन की बेबी सिटर, मनन उन्हें पसंद करता था। देखकर एकदम से कूद कर आया। कैरी तैयार हो गई थीं। काले रंग के कॉकटेल ड्रेस में बेहद खूबसूरत लग रही थीं।
"शानदार लग रही हो।"
कैरी ने सुनकर रैंप वाक किया, सामने आकर अदा से घूम गई। एक चक्कर, फिर पैरों को क्रॉस करके कमर पर एक हाथ रखा, होठों को टेढ़ा कर मुस्कुराई,
"अब"
"अब और भी।"
विभु हँस दिया, "मैं नीचे हूँ तुम आ जाओ।"
"अच्छे बच्चे की तरह रहना" बेटे को कैरी ने हिदायत दी फिर मिसेज नॉर्टन को अंतिम हिदायतें देने लग गई।
बेसमेंट से गाड़ी निकाल कर विभु बाहर आ गया। कैरी भी आ गई थी। स्टिरिओ बजाया, भीमसेन जोशी की आवाज़ अंदर गूंज गई। "सावन की बूँदनिया, बरसत घनघोर।"
कैरी ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, "उदास हो क्या?"
विभु चुप रहा।

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