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पान की खिल्ली साथ में लपेट कर रखने की मेरी आदत तीस साल पुरानी है। वैसे मैं पान खाता पिछले बयालीस साल से हूँ किंतु नौकरी लगने के बाद पान लगवा कर रखने की आदत पड़ गई है क्योंकि ज़्यादातर लोग या तो पान घर में रखते ही नहीं और यदि रखते भी हैं तो उनका स्वाद शायद ही मेरी पसंद के लायक होता है। और मेज़बान यदि दुकान से मँगाकर ज़ोर देकर खिला भी दे तो ज़्यादातर उससे मुझे संतुष्टि नहीं मिलती। ऊपर से मेरी नौकरी भी ऐसी है कि मुझे अक्सर ही नए-नए स्थानों की यात्रा करनी पड़ती है, अनजाने लोगों के संपर्क में आना पड़ता है। ऐसे में मेरे स्वाद के अनुकूल पान हर जगह, हर बार मिल जाए उसकी गारंटी नहीं होती। अतः घर से या किसी परिचित पान वाले की दुकान से पान की खिल्लियाँ बनवाकर रख लेना मेरी आदत बन चुकी है। साथ में रखने के लिए एक ही पान लगवाया क्योंकि घर से बाहर ज़्यादा देर रुकने का मेरा इरादा नहीं था।

उधर गगनदेव जब पान लगा रहा था मैं बायीं और दायीं ओर राजमार्ग को देख लेता। बीच में पश्चिमोत्तर कोने से आने वाली तीसरी सड़क की तरफ़ भी देखने लगता। असल में मैं चाहता था कि कोई खाली रिक्शा वहाँ भूले-भटके आ जाए जिस पर सवार होकर मैं उत्तर-पश्चिम दिशा में पूर्णिया कोर्ट स्टेशन के पास स्थित अपने ममेरे भाई के आवास पर पहुँच सकूँ। असल में उसी दिन सुबह मेरे मामा गाँव से अपने बेटे के यहाँ आए थे। चूँकि उनका मुझसे गहरा लगाव है, आते ही उन्होंने मन्नू से मुझे टेलीफ़ोन कराया कि मैं उनसे तुरंत आकर मिलूँ। संयोगवश उस वक्त मेरे मकान के दूसरे तल्ले पर निर्माण कार्य चल रहा था। ऐसे में राजमिस्त्री एवं मजदूरों को छोड़कर बाहर निकलना मुझे उचित नहीं लगा। क्योंकि मेरी ज़रा-सी अनुपस्थिति में भी मजदूर वगैरह खामख़्वाह काम से देह चुराने लगते थे- कभी खैनी खाने के बहाने तो कभी पानी पीने के बहाने। इतना ही नहीं, पेशाब करने की उनकी आवृत्ति भी कुछ ज़्यादा ही बढ़ जाती थी। उधर दिन के भोजन से पहले मेरी पत्नी रसोई कार्य से रुख़सत नहीं हो पाती। अतः हमने फैसला किया कि जब वे दिन के भोजन के बाद रसोई कार्य से निश्चिंत हो जाएँगी तो मिस्त्री मजदूरों पर नज़र रखेंगी और मैं चंद घंटों के लिए मामा से मिल आऊँगा।

गगनदेव ने पान की एक खिल्ली उठाकर मुझे खाने के लिए दे दी तथा दूसरी खिल्ली सखुए के पत्ते में लपेट कर हाथ में थमा दिया। इसके बाद जर्दा की काली पत्ती, पीली पत्ती तथा कटी सुपारी जर्दे के डिब्बे के ढक्कन पर रखकर आधा मेरी हथेली पर उसने उड़ेल दिया तथा आधा एक काग़ज़ की पुड़िया में लपेट कर दे दिया, साथ में रखने के लिए पान। पान वाले को मैंने पैसे दिए और आगे बढ़कर पेड़ की छाँव में खड़ा होकर रिक्शे का इंतज़ार करने लगा। इस प्रकार क़रीब बीस मिनटों तक मैं खड़ा रहा किंतु निराशा ही हाथ लगी। लाइन बाज़ार मोहल्ले में चूँकि दिन में तथा रात में भी मरीज़ों का तांता लगा रहता है रिक्शा किसी भी समय उपलब्ध हो जाता है। किंतु इस झुलसती दोपहर में शायद ही कोई रिक्शा गुज़रता था। और जो गुज़रता भी था वह सवारियों से भरा होता। थक-हारकर मैं अपने गंतव्य स्थान के विपरीत पूर्व दिशा में लाइन बाज़ार चौक की ओर बढ़ने लगा। गगनदेव की पान की दुकान से लगभग तीन सौ गज पर सदर अस्पताल स्थित है। क़रीब पहुँचने पर मैंने देखा कि अस्पताल के गेट के ठीक सामने की दुकान की ओट में दो खाली रिक्शे खड़े हैं। उम्मीद बँधी कि चार-पाँच किलोमीटर धूप में पैदल चलने से अब शायद बच जाऊँगा। किंतु जब मैं पास पहुँचा तो पाया कि दोनों ही रिक्शा के चालक गायब थे। दो-चार बार घंटियाँ बजाई किंतु कोई जवाब नहीं मिला। मन बिल्कुल खिन्न हो गया। मैं चारों ओर सिर घुमा-घुमाकर रिक्शेवालों को खोजने लगा। क़रीब पाँच मिनट बाद उषा मेडिकल हॉल के बगल वाले चाय के ढाबे से आवाज़ आई।
''क्या बात है?'' वह दोनों में से कोई एक रिक्शे का चालक था। वह चाय पी रहा था।
''तुम्हारा रिक्शा है?'' प्रश्न का जवाब मैंने प्रश्न से दिया।
''कहाँ जाना है?'' प्रश्न का जवाब फिर प्रश्न ही था।
''कोशी कॉलोनी, रेलवे स्टेशन से थोड़ा पहले,'' मैंने जवाब दिया।
''दस रुपए,'' वह बोला।
''छः दूँगा। चलोगे?'' मैंने ज़ोर देकर कहा।
किंतु वह नौ रुपए से कम पर जाने को तैयार नहीं हो रहा था। अभी हमारे बीच पैसों को लेकर बकझक चल रही थी कि दूसरे रिक्शे का चालक वहाँ आ पहुँचा।
बोला- ''कहाँ जाएँगे बाबू?''
छोटा कद। दुबला-पतला शरीर। बड़े-बड़े सफ़ेद बाल। लंबी पका दाढ़ी। हरे रंग की ढीली-ढाली पतलून। पैर में काले रंग का चमड़े का नुकीला जूता जिस पर जगह-जगह चिप्पियाँ लगी थीं। चूँकि पतलून लंबाई में कम थी अतः भीतर से भूरे रंग का फटा-चिटा मोजा झाँक रहा था। उसने सफ़ेद रंग की धारीदार कमीज़ पहन रखी थी जिसकी केहुनियों पर काले रंग की चिप्पियाँ लगी थीं। शर्ट का कालर पूरी तरह से तुड़ा-मुड़ा एवं गरदन पर फटा हुआ था। उसने सिर पर एक गंदी फेल्ट हैट लगा रखी थी, शायद धूप से बचने के लिए।

कुल मिलाकर वह काफ़ी रहस्यमय दिख रहा था। मेरी आदत है कि मैं किसी असामान्य से दिखने वाले या दबंग रिक्शेवाले की सवारी पर नहीं चढ़ता। ज़्यादातर यात्रा ख़त्म होने पर ऐसे रिक्शावाले अधिक भाड़े की माँग करने लगते हैं तथा झगड़ने से भी नहीं हिचकते। किंतु मैं लाचार था। मैंने कहा-
''जाना कोसी कॉलोनी और स्टेशन के बीच में है। कितना भाड़ा लोगे?''
''बाबू आपके जितना भाड़ा बुझाय, दे दीजिएगा।''
''बाद में झंझट तो नहीं करोगे?''
''कैसा बात करते हैं बाबू आप जितने भाड़ा दे दीजिएगा, हम रख लेंगे।''
''अजीब आदमी हो. . .। मैं छः रुपए तक दे सकता हूँ,'' कहते हुए मैं रिक्शे पर बैठ गया। उसकी बातों पर अब मुझे विश्वास हो गया था।

बूढ़े ने रिक्शा मोड़ दिया और पैडिल चलाने लगा। वह बहुत धीमी गति से रिक्शा चला रहा था। मैंने महसूस किया कि उसे इस काम में बहुत मशक्कत करनी पड़ रही थी। मैं उकता रहा था किंतु उसकी पकी उम्र एवं कमज़ोर शरीर को देखकर मुझे उस पर दया आ रही थी। नील पैथेलोजिकल सेंटर के निकट पहुँचने पर उसने बातचीत का सिलसिला शुरू किया। उसने मुझसे पूछा, ''कोसी कॉलोनी के पास घर है आपका बाबू साहब?''
''नहीं घर तो यहीं बगल में है। मैं वहाँ अपने मामा से मिलने जा रहा हूँ।''
''बाबू आप कितना इच्छा इंसान हैं। आप हमको पाँचे रुपैया दे दिजिएगा।''

उसकी बात सुनकर मुझे थोड़ा अचंभा हुआ। असल में यदि कोई यों ही मेरी तारीफ़ करने लगे तो मुझे उसकी नीयत पर संदेह होने लगता है। किंतु मैंने अपने मनोभाव को व्यक्त नहीं होने दिया। उसने बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाया, ''आपका मामा कितना भाग्यशाली है जो उनको आपके जैसा भगिना मिला है। कितना उमर है उनका?''
''बानवे साल।'' मैं गंभीरता से बोला।
''सोचिए, बेरानवे साल के मामा से इतना मोह है आपको। इतना कड़ा धूप में उनसे मिलने जा रहे हैं। कोनो ज़रूरी काम छोड़िए के आए होंगे ना।'' मुझे वह आदमी काफ़ी रोचक लगा। अभी तक मैं उससे बिल्कुल उदासीनता से बात कर रहा था। किंतु अपनी अनौपचारिकता से उसने मुझे निहत्था कर दिया था। मैंने महसूस किया कि मेरा इस प्रकार पेश आना उचित नहीं है। आख़िर वह इतना वृद्ध आदमी है और उसने मेरे प्रति ख़ास अपनापन महसूस किया है तभी तो इतने सरोकार से मुझसे मेरे बारे में पूछ रहा है। अतः एक विवेकी आदमी होने के नाते मुझे उससे सहानुभूति के साथ बात करनी चाहिए।
''क्या नाम है तुम्हारा?'' मैं अपने स्वर में नरमी लाते हुए बोला।
''हजूर इनरदेव यादव।''
''और उम्र?''
''पैंसठ साल. . .हजूर असरी में हम साठों के नहीं हुए हैं मगर सब कोई हमको पचहत्तर से कम का नहीं समझता है।''
''कहाँ के रहने वाले हो?''
''जोनपुर, यू.पी. के रहने वाले हैं।''
''फिर यहाँ?''
''नाना-नानी हियाँ पुरनियाँ में रहता था। हैजा में जब हमारा माय-बाप मर गया तो ऊ सब हमको बच्चे में हियाँ ले आया।''
''इस उम्र में रिक्शा चला रहे हो? घर में और कोई नहीं है क्या?''
''हज़ूर इसका कारन है,'' इतना कहकर वह चुप हो गया। उसके पैर निरंतर पैडिल पर ज़ोर लगा रहे थे। फिर उसने अपनी चुप्पी तोड़ी, ''हमारी संताने हमको नहीं पूछता है। बाबू जितना गेल गुजरल हम लगते हैं उतना असली में हम हैं नहीं। मगर विधाते हमको लावारिस बना दिया है। हमको दो बेटा, एक बेटी है। हियें पर रिक्सा चलाकर हम दोनों बेटा को पढ़ाए-लिखाए और लड़की का सादी कराए।''
''कहाँ रहते हैं वे?'' मैंने पूछा किंतु मुझे लगा कि वह मेरी बातें सुन नहीं रहा था। कहने लगा, ''तीस साल पहले वाइफ मर गया। मगर हम दूसरा सादी नहीं किए. . .सिरिफ ई बच्चा सब का ख़ातिर। ई सब याद करके कब्बो-कब्बो बड़ी अफ़सोस होता है।''

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