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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है भारत से डॉ. सूर्यबाला की कहानी— 'दादी की ख़ज़ाना'


चुन्नू को लगता, ज़रूर दादी के पास कोई छुपा हुआ ख़ज़ाना है। यह बात उसने अपनी छुटंकी बहन मिट्ठू को भी कई बार बताई थी। मिट्ठू को ख़ज़ाने-वज़ाने की अकल तो भला क्या होती, लेकिन उससे पूरे तीन साल बड़े और 'तेरा भइया' का रुतबा रखनेवाले, चुन्नूजी ने इसे यह राज़ बताया, यही उसके निहाल हो लेने के लिए काफी था। उसने फुसफुसाकर पूछा, ''भइया! तुम्हें कैसे पता?''

चुन्नू ने बड़े मातबरी अंदाज़ में कहा, ''देखती नहीं, दादी हमेशा कितनी खुश, कितनी मगन रहती हैं। इतना खुश तो वही हो सकता है, जिसके पास कोई माल-खज़ाना छुपा होता है।''

मिट्ठू ने पूरे विश्वास से हामी भरी, लेकिन तत्क्षण अगली जिज्ञासा भी पेश कर दी, लेकिन ख़ज़ाने की तो चाबी भी होती है न! दादी कहाँ रखती हैं, अपनी चाबी?''
चुन्नू जी पहले तो अटपटाए, लेकिन फौरन अकल काम कर गई,
''किसी-किसी ख़ज़ाने की नहीं भी होती...बस, 'खुल जाए सिमसिम' कह देने से कितना बड़ा ख़ज़ाना खुल जाता था। दादी भी ऐसा ही कोई 'कोड-वर्ड' कहती, बोलती होंगी।
मैं कहता हूँ, उन्हें देखकर ही लगता है कि वे किसी-न-किसी ख़ज़ाने की मालकिन है ज़रूर।''

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