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कहानियाँ 

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है यू.एस.ए से
सुषम बेदी की कहानी—
अवसान


जिस तरह से दिवाकर जीता जा रहा था उसे बिलकुल अंदाज़ नहीं था कि कल को वह इस दुनियाँ में नहीं होगा। यों तो अपने जाने की ख़बर किसी को नहीं होती पर उसे ख़ासतौर से नहीं थी।

इसकी जायज़ वजह भी थी उसके पास। पहली बात तो यह कि जिस संसार के सर्वोन्नत देश में वह रह रहा था वहाँ छप्पन सत्तावन साल की उम्र जीवन का मध्य माना जाता है, अंत का सूचक नहीं। फिर सामान्य तौर पर उसकी सेहत भी ठीक-ठाक रहती थी। दूसरों की बीमारियाँ ठीक करते-करते अपनी नश्वरता की चिन्ता करने की भी फ़ुरसत नहीं मिलती थी उसको।

यही बात मानकर उसने पचासवें में कदम रखते ही तीसरी शादी की थी। यों शादी तलाक आम बाते हैं इस देश में। पर वह यहाँ के अनलिखे नियमों के अनुसार हर सात साल बाद तलाक करता था और तलाक के पाँच साल के बाद ही अगली शादी। इस तरह उसके पाँच बच्चे भी पैदा हो चुके थे। जिनमें से चार अपनी अपनी दुनिया में थे। छे साल का छोटा लड़का उसकी तीसरी पत्नी हेलन से था।

शहर के प्रमुख चर्च में हो रही इस अंतिम क्रिया में शहर भर के तमाम लोग जमा थे। फूलों के ढेर सारे गुलदस्ते हॉल को महकाए थे, जिनकी ताज़गी और

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