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कहानियाँ  

आप्रवासी भारतीय लेखकों की कहानियों के संग्रह वतन से दूर में
नार्वे से
डॉ. सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक की कहानी— 'मंजिल के करीब'।


नेशनल थियटर के करीब बैठा था। रात्रि का समय था। नार्वे की बसन्ती हवा से सिहर उठता। सोचता कि करवट बदलूँ या किसी आशियाने की गोद में चला जाऊँ। दुनिया का सबसे महँगा शहर ओसलो! यहाँ मकान मिलना इतना आसान होता तो दर–दर की ठोकरें नहीं खाता। कभी सलीम के घर सोया तो कभी हरविन्दर के साथ रात बिताई।

एक दिन इब्सेन की मूर्ति से पीठ टिकाए नेशनल थियटर के सामने बैठा–बैठा सोचता रहा – जिसने यूरोप के इतिहास में अपने निराले अन्दाज से अपने नाटकों में जीवन दिया। मुझे लगा कि मैं इब्सेन के एक नाटक का मजबूर हठी पात्र हूँ जो अपने समय से लड़ रहा हो।

पार्लियामेन्ट की नंगी सड़क पर सनसनाती कार के प्रकाश की चकाचौंध ने विचारक्रम तोड़ दिया। मुझे ऐसा लगा कि भारत के किसी बड़े शहर के चौराहे पर किसी सोते हुए कुत्ते को किसी ने कोई ढेला मारा हो, और यह चिल्लपों कर उठा हो। मैं उठा। मुँह पर सिगरेट की राख का कुछ अंश चिपक गया था यदि दिन होता तो कोई–न–कोई मुझे देखकर जरूर हँसता। चहल–पहल कम हो गई थी। मैं चार कदम चला ही था कि वापस लौट आया और दुबारा उसी सीनेटनुमा बेंच पर लेट गया। मैं हँसा। बुदबुदाया। बिना मंज़िल के भी लोग बढ़ते हैं। मेरी मंज़िल कहाँ हैं? शायद मेरी मंजिल भी है।
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