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कहानियाँ  

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
यू. के. से उषा वर्मा की कहानी— रिश्ते


कर्नल स्टुअर्ट राबर्टसन सुबह कुत्ते को लेकर घूमने गए और आकर चाय का प्याला लेकर बैठकर अख़बार देखने लगे। रिटायरमेंट के बाद से यह उनका रोज़ का क्रम था। कायदे कानून के पाबंद कर्नल साहब अख़बार पढ़ कर रोज़ ही अपना गुबार निकालते, मसलन, ज़माना कितना ख़राब हो गया है, पॉप म्यूज़िक भी कोई संगीत है, कि बच्चों में कोई अनुशासन नहीं बचा वगैरह-वगैरह। सत्यानाश हो इस समतावादी सोच का, और आज की ख़बर ने तो उन्हें बिलकुल ही परेशान कर दिया था तो अब समलैंगिकों को नौकरियों में भी स्वीकार कर लेंगे। अब रह ही क्या गया?

कर्नल साहब छ फुट चार इंच लंबे गठा शरीर, चौड़ा माथा, बड़े ही रौबीले व्यक्तित्व के मालिक थे। सर पर बाल थोड़े ही बचे थे। मोटे चश्मे के पीछे सतर्क निगाहों में एक पैनापन था। अपने जूनियर्स से बातें करते समय उनकी आँखें सिकुड़ी रहतीं मानो वह अपना भेद छिपा कर रखना चाहते हों। सेवा से अवकाश के बाद उन्होंने टेडकास्टर के इलाके में एक खूबसूरत बंगला ख़रीद लिया था। और बाकी ज़िंदगी यहीं आराम से रहने का उनका इरादा था। यद्यपि उनकी पत्नी को इंग्लैंड पसंद नहीं था, पर उन्होंने तो आजीवन कभी कोई विरोध किया ही नहीं तो अब इस उम्र में क्या बोलतीं।

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