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राजीव ने सिर हिला दिया।
पास बैठी सुनीता मन ही मन गुन रही थी। ठीक ही कह रहा है। उसे चलना सीखना होगा। जब उसने बैंक में खाता खोला था तो उसे उसका बैंक कार्ड थमाते हुए काउंटर पर बैठी लड़की ने कहा था, "यह तुम्हारी दूसरी आइडेंटिटी (पहचान पत्र) है।
पहली पहचान ड्राइविंग लाइसेंस। सुनीता को अपनी पहचान चाहिए।
फिर शुरू हुआ हांगकांग मार्केट के पीछे के रास्ते पर कार चलाने का सिलसिला। तब से बहुत दूर आ चुकी है अब।
राजीव ने तय कर लिया है उसे ड्राइविंग टीचर के सुपुर्द कर देंगे। उसकी कार में दो ब्रेक होते हैं। सुनीता की बेवकूफ़ी पर वह अंकुश लगा सकता है। सुनीता को लगा, उसने जंग जीत ली।

एक सप्ताह में ही, दस घंटे की ड्राइविंग करके उसमें इतना आत्मविश्वास आ गया था जितना राजीव के साथ साल भर में नहीं आ पाया था। वह राजीव की कृतज्ञ थी कि अंतत: उन्होंने उसकी परेशानी समझी। उसे राजीव का डर भी सही लगने लगा था। उसकी एक ग़लती कार को बॉडी शॉप के दर्शन करा सकती थी। खुद उसे अस्पताल पहुँचा सकती थी। राजीव का गुस्सा ग़लत नहीं था। वह मन ही मन सहमत होती। लेकिन समानांतर पार्किंग ने फिर उसे राजीव के समानांतर ला खड़ा किया। सुनीता को लगता कि राजीव ज़बरदस्ती उसके ड्राइविंग टीचर बने रहना चाहते हैं, ताकि अंतत: उसे ड्राइविंग सिखाने का श्रेय खुद ले सकें। वह गुस्से में उन्हें कई बार कह चुकी थी कि वे कभी ड्राईविंग टीचर नहीं बन सकते। लेकिन राजीव का गुस्सा अब ठंडा पड़ता जा रहा था। उन्हें यह बात भी महसूस होने लगी थी कि सुनीता में आत्मविश्वास आ गया है। वह अब अपने बूते पर घर से निकल सकती है। घर के अंदर रहते हुए भी अपने को व्यस्त रखने के ढेरों साधन जुटा चुकी थी वह।
घर व्यवस्थित हो गया था।
घर के बाहर एक छोटा मोटा बगीचा तैयार था।
और तो और उसने घर पर ही संगीत की कक्षाएँ लेना शुरू कर दिया था। बच्चे जुटने लगे थे। वह व्यस्त थी और राजीव को अपना फैसला सुना चुकी थी, "मुझे लगता है मैं समानांतर पार्किंग कर लूँगी। मेरी थोड़ी प्रैक्टिस करवा कर मुझे रोड टेस्ट दिलवा दो।"
उसने उसी जगह पर जा कर अभ्यास किया जहाँ परीक्षा होनी थी।
राजीव ने भी माना, वह कर सकती है। सुनीता को लगा उसे पैर मिलनेवाले हैं। "मैं पास हो जाऊँगी न?" वह राजीव से पूछती। राजीव प्यार से मुस्करा देते। कभी हिदायतें देते, "सावधानी से चलाना। ठीक से टर्न लगाना। सीट बेल्ट लगाना न भूलना। कुछ मुश्किल नहीं है। हो जाएगा।"
लेकिन असली मुश्किल तो अब आनी थी।

दो दिन बाद राजीव ने उस ऑफ़िस में फ़ोन किया था। सुबह साढ़े नौ बजे। सूचना टेबल पर बैठी लड़की ने फ़ोन उठाया। उसके अनुसार सुबह साढ़े आठ बजे के अंदर ही सारे स्लॉट बुक हो गए थे।
"तो मैं कल कितने बजे आऊँ?" राजीव ने पूछा, "सुबह छह बजे? सुबह चार बजे?"
वह लड़की घबरा गई। "नहीं, नहीं, इतनी जल्दी नहीं। सात बजे तक आ जाना।"
अगले दिन ऑफ़िस के बाहर का नज़ारा दर्शनीय था।
बिल्डिंग के अगले दरवाज़े से पिछले दरवाज़े को पार करती लंबी कतार। सुनीता ने जल्दी से कार से उतरकर लाइन में अपनी जगह ली। तब सुबह के साढ़े सात बजे थे। उसके बाद भी लोग आते गए।

पौने आठ बजे, कर्मचारी पार्किंग एरिया में पहली कार आकर लगी। उसमें बैठी गोरी लड़की आठ बजे तक अपने चेहरे का कार के शीशे में मुआयना करती रही। आँखों पर आइ शैडो होंठों पर लिपस्टिक फिराती रही। फिर पर्स से नकली नाखून और नकली बरौनियाँ निकाल, यथास्थान चिपका, व्यस्त भाव से कोक का डिब्बा हाथ में लिए, ऊँची एड़ियों से ठक ठक करती ऑफ़िस में दाखिल हो गई। इस बीच दो काली लड़कियाँ, एक अधेड़ उम्र की गोरी औरत और एक पुलिसवाला अंदर दाखिल हो अपनी जगह पर व्यवस्थित हो चुके थे।
जब सुनीता ने देखा कि नौ बजे भी आकर लोगों ने रोड टेस्ट के लिए समय आरक्षित किया और उन्हें आरक्षण मिला तो राजीव से बोली, "ऑफ़िस के बाहर लगी लंबी कतार देखकर ये अपने को महत्वपूर्ण महसूस करते होंगे इसलिए सुबह से बुलाकर खड़ा कर देते हैं।"
"हाँ, यही समझ लो। सरकारी दफ़्तरों में काम करनेवाले यों भी अपने को तोप समझते हैं। चुप रहो, अपना काम करो और ये ग़लत भी बेलें तो सुन लो। जिरह मत करना।"

इसलिए पहले रोड टेस्ट के बाद जब उसके शालीन परीक्षक ने उसे बतलाया कि वह पास नहीं हुई है तो सुनीता को अधिक निराशा नहीं हुई।
वह जानती थी, एक बार में शायद ही कोई पास होता है। यह जनता की सुरक्षा को ध्यान में रखनेवाला विभाग है। अपनी डयूटी करने में कोई कोताही नहीं करता। जब तक ऐसी स्थिति नहीं आती कि वह पूरे टेस्ट के दौरान एक भी ग़लती न करे, वह पास नहीं होनेवाली।
वह सीट बेल्ट लगाना भूल गई थी। यह अमेरिका में कानूनन अपराध है। उसने अगले टेस्ट की तैयारी की।
"देखना, इस बार मैं पास हो जाऊँगी।" उसने राजीव से कहा।
सुनीता को उम्मीद थी, उसे वही परीक्षक फिर से मिलेगा। उस ऑफ़िस में तीन परीक्षक थे। उनमें से एक कार्ला थी।
निर्धारित समय पर जब सुनीता ने कार टेस्ट एरिया में पार्क की तो कार्ला जल्दी से उसकी ओर बढ़ आई। "तुम्हारा लर्नर लाइसेंस, गाड़ी का इंश्योरेंस और परीक्षा का समय सूचक काग़ज़ आगे बढ़ाओ। जल्दी। खिड़की का शीशा नीचे करो। सुनाई नहीं देता? श्रवण यंत्र लगाती हो? शीशा नीचे करो।"
सुनीता इस अचानक के आक्रमण से घबरा गई। ऐसे स्वागत के लिए वह प्रस्तुत नहीं थी। उसने हड़बड़ाते हुए सारे आदेशों का पालन किया। ब्रेक लाइट, हॉर्न, टर्न सिग्नल, सबकुछ जाँच कर, कार्ला कार का दरवाज़ा खोल उसकी बगल में आ बैठी।
सुनीता को उसे "हलो" कहने की भी इच्छा नहीं हुई। कार्ला ने अपना परिचय उसे दिया। सिर घुमाए बिना सुनीता ने उसे सुना। शायद यह कार्ला के लिए अपमानजनक था।
"गाड़ी आगे बढ़ाओ।" उसने आदेश दिया।
आगे बढ़ते ही व्यंग्यात्मक स्वर कानों में आया। "तो मैम आपने पिछली बार सीट बेल्ट नहीं लगाई थी। ऐसे कैसे ड्राइव कर लेती हैं आप?"
सुनीता चुप रही। उसे कार्ला का लहजा खला।
कार्ला ने फिर वही बात दुहराई। उसे किस उत्तर की अपेक्षा थी, सुनीता समझ नहीं पाई। ग़लती उसने की थी। फेल भी हो चुकी थी। तो फिर कार्ला क्या चाहती थी?

वह चुपचाप उसके आदेशों का पालन करती, कार समानांतर पार्क करने के बाद वहाँ से निकाल मुख्य सड़क पर आ गई। अभी तक उसने एक भी ग़लती नहीं की थी। कार्ला का भाषण बढ़ता जा रहा था। वह उसे दायें बायें तमाम जानी अनजानी सड़कों पर घुमा रही थी। डाँट रही थी। सुनीता चुप थी लेकिन ड्राइविंग पर ध्यान केंद्रित करने में भी असमर्थ महसूस कर रही थी। अंतत: सब ओर से घूमकर वापस उसने कार को कार्ला को आदेश पर पार्किंग एरिया में ला खड़ा किया।
"तुम पास नहीं हुई हो।" लगभग चीखते हुए कार्ला ने कहा।
यह अपेक्षित था। लेकिन असहनीय। उसने कार्ला की ओर सिर घुमाया।
"तुम बहुत गंदी ड्राइविंग करती हो। तुम सीधी लाइन में नहीं चलातीं। धीमी गति से चलाती हो। तुम ! तुम तो सारा ट्रैफ़िक जाम करा दोगी। तुमको तो मैं कभी रोड़ पर गाड़ी चलाने नहीं दूँगी।"
सुनीता इतना लंबा लेक्चर सुनकर निढाल हो गई।
पहली बार उसके मुंह से बोल फूटे। "मैं नरवस थी।"
कार्ला ने उसे घूरा। "जाओ जाकर प्रैक्टिस करो। दो हफ़्ते से पहले शकल मत दिखाना इस ऑफ़िस में।"
"खड़ूस!"
"इस ऑफ़िस में आना नहीं है अब।"
सुनीता ने सोचा। राजीव ने सब सुना और उससे सहमत हुए।
सुनीता सारा अपमान पी गई। एक बार फिर।

पिछले छह महीनों से वह राजीव की उपस्थिति में मुख्य सड़कों पर कार चला रही है आराम से। कोई ग़लती नहीं हुई। और यह कार्ला उसे कभी कार चलाने की परमीशन न देने की बात करती है। सड़क उसके बाप की है जैसे! ठीक है उससे ग़लती हुई। उसे मालूम है कि नरवस होकर वह ग़लतियाँ करती है। उसने उसे फ़ेल किया, ओ के। लेकिन उसके बोलने का तरीका इतना गंदा क्यों था? पति से लड़ाई करके आई थी? पति हो यह भी तो ज़रूरी नहीं। इनके तो ब्वाय फ्रेंड होते हैं। या फिर कुत्ते। कुत्ता मर गया क्या?

सुनीता अंदर ही अंदर खौल रही थी। घर आकर घंटों रोती रही, बिस्तर पर लेटकर। फिर दो दिन बाद टूटी हुई मन:स्थिति में ही दूसरे ऑफ़िस जाकर टेस्ट दिया। फिर फेल हो गई। उसने परीक्षक के आदेश का पालन करने में ग़लती की थी। गाड़ी पहली लेन में न मोड़कर दूसरी में मोड़ा था।
वह अब सिर्फ़ टेस्ट देने के लिए टेस्ट दे रही थी। उसने भी पहली बार जाना कि वह इतनी ग़लतियाँ कर सकती है। फिर उसे राजीव की बात सही लगी। "अपने परीक्षक के साथ सहज़ होने की कोशिश करो। उसे "हलो" कहो। अपना परिचय दो जैसे वह देता है। ये बातें तुम्हें सामान्य होने में मदद करेंगीं।"
तब सुनीता की समझ में आया कि राजीव के साथ भी वह जो शुरू में ड्राइविंग नहीं कर पाती थी वह इसीलिए! राजीव का साथ भी नया था तब। वे एक दूसरे से परिचित हो रहे थे।
उसका ड्राइविंग टीचर अनुभवी था। उसने सुनीता से पहली मुलाक़ात में दोस्ती कर ली थी।
उसने अपने परीक्षक से संवाद स्थापित किए। यों भी वे कार्ला जैसे नहीं थे।
एक दिन वह पास हो गई।

उसने कार्ला की लिखित शिकायत की थी बाद में। पता चला था कि उसके विरुद्ध और भी लोगों ने शिकायत की थी। शायद कार्ला तक बात पहुँची थी। शायद उसका लौटकर न आना उसे याद रह गया। इतनों की भीड़ में उसने उसे पहचान लिया था। क्यों?
पोस्टआफ़िस से बाहर निकल उसने मुड़कर देखा।
कार्ला अभी तक वहीं लाइन में खड़ी थी। अचानक सुनीता को उसपर तरस आया। वह हमेशा वहीं पर खड़ी रहेगी। रोड टेस्ट लेती हुई, जबकि सुनीता और बाकी सब उस मोड़ से निकलते जाएँगे आगे। उसे नकारते हुए। सुनीता को लगा उस दिन वह नहीं, कार्ला रोड टेस्ट में फेल हुई थी और आज भी उसने उसे पास होने नहीं दिया।
उसने एक संतुष्टि भरी साँस ली और अपनी कार की ओर बढ़ गई।

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२४ सितंबर २००५

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