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लिंडा
से रहा न गया तो एक दिन पूछ लिया—
“तुम्हें सारा दिन अकेले घबराहट नहीं होती ?”
“आप भी तो अकेली रहती हैं”, जवाब मिला था।
“मेरी बात और है”, लिंडा बोली थी। “मैं तो अब बूढ़ी हो गई
हूँ।”
मैरिएन पल भर को चुप रही थी। फिर जैसे सोचते हुए बोली-
“व्यक्ति अकेला बुढ़ापे के साथ ही नहीं होता मिसेज़ स्मिथ।”
लिंडा का मन हुआ था कहे-जब तुम मेरी उम्र में आओगी, तब यह बात
नहीं करोगी। इंसान तुम्हारी उम्र में ही अकेलापन ओढ़ ले तो मैं
उसे बहाना कहूँगी। अभी तुम्हारे सामने कई रास्ते खुले हैं। तुम
जो चाहो चुन सकती हो। लेकिन जैसे-जैसे
बुढ़ापे की पदचाप सुनाई पड़ने
लगती है, चुनने की यह आज़ादी ख़त्म होने लगती है। रह जाती है
एक सँकरी गली – वह भी आगे से बंद।
वह यह सब समझाना चाहती थीं मैरियन को। पर वह तो बिना कोई नोटिस
दिए एक दिन अचानक चली गई और लिंडा फिर अकेली रह गई – अकेली और
बूढ़ी...
इसीलिए तो इस बार क्रिसमस पर उन्होंने आसपास के कुछ लोगों को
दावत देने की सोची। क्या लिखा था भला निमंत्रण पत्र में – वह
मुस्कुराईं – “अगर आप भी मेरी तरह अकेले और बूढ़े हैं तो
क्रिसमस की यह शाम मेरे साथ मेरे घर पर बिताइए.” डर था, कहीं
कोई इसे भद्दा मज़ाक ना समझ ले। पर नहीं, पीटर परसों सुपर
मार्केट में मिले थे तो बोले – “मिसेज़ स्मिथ, थैंक्यू, आपका
निमंत्रण पाकर बहुत ख़ुशी हुई.” रोज़मैरी भी आएगी। हाँ, मिस्टर
लॉरेंस का पता नहीं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि जैसे अपनी ही
ज़िद से बंद हुआ कोई दरवाज़ा हो – आप कितनी ही दस्तक दें, नहीं
खुलेगा। कल अपने बाग़ में
से बर्फ़ निकाल रहे थे। लिंडा को सड़क से गुज़रते देखा भी था
लेकिन कुछ नहीं बोले.....
फ़ायरप्लेस में एक लकड़ी चटखी। लिंडा उठीं। एक बार भोजन का
प्रबंध तो देख लें। कितने शौक से टर्की पकाई है। और क्रिसमस
पुडिंग भी है। वाइन तो सुबह ही ठंडी होने के लिए फ्रिज में रखी
दी थी। काम तो सारा हो गया – अब बस मेहमानों का इंतज़ार है। वह
घुटनों के दर्द को सहलाती हुई खिड़की के क़रीब गईं। कितना फीका
पड़ गया है खिड़की का पर्दा। पर क्या करेंगी वह नया लाकर। बाहर
झाँका, बर्फ़ की सफ़ेदी के अलावा और कुछ भी दिखाई नहीं देता –
पेड़ तो इस तरह ढके हैं कि पहचानना भी मुश्किल है। किसी कार की
हैडलाइट की पीली बीमार रौशनी सड़क पर लेट गई। दरवाज़े खुलने-बंद
होने की आवाज़ आई – और फिर हँसी का एक फ़व्वारा छूटा। एक बच्चे
का शिकायती स्वर उठा – “पर तुमने तो कहा था कि इस बार फ़ादर
क्रिसमस मेरे लिए हवाईजहाज़ लाएँगे... ”
लिंडा खिड़की से हट गईं। कमरे के एक कोने में सजे छोटे से
क्रिसमस ट्री को निहारा। जॉर्ज जीवित थे तो हर क्रिसमस पर बड़ा
सा पेड़ आता था। बिजली के लट्टुओं और उपहारों से कैसे जगमग
करता था। लिंडा कालीन पर गिरा अख़बार उठाने को झुकीं – तो
आँखों का चश्मा खिसककर नाक पर आ गया। कितनी बार सोचा है इसे
ठीक कराएँगी पर अब तो शायद नंबर भी बढ़ गया है। अख़बार की
बारीक़ छपाई पढ़ने के लिए तो मैग्नीफाइंग ग्लास से देखना पड़ता
है। बुढ़ापा भी अजीब चीज़ है, वह मुस्कुराईं। लगता है नए सिरे
से ए बी सी सीख रहे हों। शुरू-शुरू में परेशानी होती है पर फिर
अभ्यास हो जाता है। धीरे-धीरे आदत सी पड़ जाती है। क्या है यह
जीवन – लिंडा अकसर सोचती हैं। आदतों का सिलसिला – कभी
किसी के साथ रहने की आदत डाल लो,
कभी किसी के बग़ैर रहने की....... लगता है जैसे दरवाज़े की
घंटी बजी है। हाँ, घंटी ही तो है – कानों से तो अभी ठीक-ठाक
सुनती हैं वह। चश्मे को ठीक से आँखों पर टिकाते हुए वे दरवाज़ा
खोलने को बढ़ीं।
“अरे पीटर – मैरी क्रिसमस...”
“मैरी क्रिसमस, मिसेज स्मिथ...” पीटर अंदर आते हुए ओवरकोट
उतारने लगे, “कहाँ रख दूँ?”
“लाओ मैं रख दूँ.” लिंडा ने ओवरकोट और छड़ी पीटर के हाथ से
लेते हुए कहा।
पीटर की नाक सर्दी से लाल हो रही थी। हाथ रगड़ते हुए वह आग के
पास खड़े हो गए। “क्या कड़ाके की सर्दी पड़ी है इस बार,
बिल्कुल व्हाइट क्रिसमस। और मुश्किल यह कि कल मेरे घर की
सेंट्रल हींटिंग ख़राब हो गई। अब तो छुट्टियों के बाद ही ठीक
होगी।”
“तब तो बड़ी परेशानी होगी...” लिंडा ने चिंता के साथ कहा।
“हाँ, घर बिल्कुल बर्फ़ हो गया है। वो तो शुक्र है – कुछ दिन
पहले मैंने पुराना फ़र्नीचर गैराज में रखा था। सो लकड़ियों से
आग जला लेता हूँ पर गर्म
पानी भी तो नहीं है।”
पीटर आग के क़रीब की कुर्सी पर बैठ गए। “उस दिन टेलीविज़न पर
एक प्रोग्राम देख रहा था, मिसेज़ स्मिथ, आपने भी देखा होगा।
सुना कि सर्दियों में बूढ़े लोगों की मृत्यु दर बढ़ जाती है।
और क्रिसमस के दौरान आत्महत्याओं की संख्या बढ़ती है।”
“छोड़िये भी पीटर”, लिंडा ने टोका, “यह बताइए क्या पियेंगे!
मैंने शैम्पेन ठंडी करके रखी है।”
“शैम्पेन!” पीटर की आवाज़
में हल्की सी नाराज़गी उभर आई। “क्रिसमस के मौक़े पर सरकार
जितना बोनस हम पेंशनयाफ़्ता लोगों को देती है, उसमें शैम्पेन
चखी भर जा सकती है। मैं तो भई थोड़ी ब्रैंडी लूँगा, अगर हो...
”
“ज़रूर” लिंडा किचन की और मुड़ीं तो पीटर ने पाइप निकाला।
तम्बाकू भरा और फ़ायरप्लेस में से एक लक़ड़ी निकालकर सुलगा
लिया। आह- यह पहला कश जितना सुक़ून देता है, उतना ब्रैंडी का
पहला घूँट भी नहीं। रिटायर होने के बाद से वह दिनभर पाइप नहीं
पीते, बस शाम को पीते हैं। दिन भर इस पहले कश का इंतज़ार करते
हैं। सुबह घूमने जाते हैं, दोपहर को लाइब्रेरी और शाम को पब।
एक पाइंट बियर के साथ पाइप भरते हैं। कितने सालों से यही
दिनचर्या चली आ रही है... साल में दो- तीन बार, जब बेटा बहू
आते हैं तो एक दो दिन के लिए उनकी दिनचर्या भंग होती है। ईस्टर
पर और क्रिसमस पर। पर इस बार वे लोग नहीं आए। सुबह जब डेविड ने
फ़ोन पर कहा कि वे लोग नहीं आ पाएँगे तो पीटर को ज़रा बुरा लगा
था। बस एक पल को ही बुरा लगा था। वैसे बुरा भी नहीं लगा, निराश
होने की चुभन भर महसूस हुई थी। मेज़ पर रंगीन क़ाग़ज़ में
लिपटे उपहारों को उन्होंने अपनी काँपती उंगलियों से छुआ था,
डेविड के लिए बाग़वानी की किताब लाए थे वह, उसकी पत्नी के लिए
लंबे ऊनी मोज़े और उनके बेटे के लिए वीडियो गेम। इन सर्दियों
में अपने लिए एक नया ओवरकोट लेना चाहते थे पर अगले साल के लिए
टाल दिया। किसे मालूम था कि इस बार इतनी बर्फ़ पड़ेगी।
ख़ैर! पीटर ने पाइप मुँह से
लगाया, लेकिन वह बुझ चुका था।
“क्या सोचने लगे थे? लिंडा ने ब्रैंडी का गिलास थमाते हुए कहा।
“सोच रहा था – एक ज़माना था जब पैर एक जगह टिकते नहीं थे,
कितना घूमा हूँ जवानी में और अब......” पीटर हँसे, “अब जिस दिन
बहुत बेसब्र होता हूँ तो बस में सवार होकर बेमतलब शहर के चक्कर
लगाता हूँ। भई पेंशनर होने का एक फ़ायदा तो है कि मुफ़्त लंदन
दर्शन करो...”
लिंडा के चेहरे पर रौशनी सी खेल गई।
“जॉर्ज को भी बड़ा शौक था घूमने का। कहते, लिंडा मरते वक़्त यह
मलाल लेकर नहीं मरना चाहता कि मैंने पूरी दुनिया नहीं देखी।”
पर कहकर लिंडा को लगा
जैसे कुछ ग़लत कह बैठीं हैं। पीटर का मुस्कुराता चेहरा जैसे
कहीं खो गया। छोटी नीली आँखों की चमक धुँधली सी पड़ गई....
कमरे में एक सन्नाटा छा गया। सड़क पर से पुलिस की एक गाड़ी
चीखती हुई निकली। पीटर और लिंडा के बीच पुराने क़ालीन सा बिछा
सन्नाटा टूटा। लिंडा को पुलिस और एम्बुलेंस की गाड़ियों से
बड़ी दहशत होती है। उनका अलार्म दुर्भाग्य की चीख जैसा लगता
है।
“ख़ुदा जाने क्या हुआ है।” वह बुदबुदाईं।
“हुआ क्या होगा। ज़्यादा पीकर कार चलाने से एक्सीडेंट हो गया
होगा। क्रिसमस के वक़्त दुर्घटनाओं की तादाद भी कुछ बढ़ जाती
है।” पीटर ने बड़े निर्लिप्त स्वर में कहा।
तभी दरवाज़े की घंटी बजी। लिंडा उठीं। यह घुटनों का दर्द दिन
ढलते ही उम्र का अहसास कराने लगता है। वरना दिनभर तो वह दस
चक्कर लगा आएँ बाज़ार के।
“वाह, रोज़ मैरी” लिंडा ने रोज़मैरी की बाँह थाम कर भीतर आने
में सहारा दिया। रोज़मैरी की पीठ कुछ ज़्यादा ही झुकने लगी है।
रोज़मैरी के पीछे लॉरेंस भी थे। लिंडा ने उनका छाता एक कोने
में रखा।
“आइए न मिस्टर लॉरेंस।
अरे परिचय करा दूँ क्या? पीटर को आप नहीं जानते? दो मकान
छोड़कर ही तो रहते हैं।”
“देखा तो है पर परिचय अभी नहीं हुआ है।” लॉरेंस ने असंबद्ध से
स्वर में कहा। स्वयं लिंडा ने भी आज पहली बार लॉरेंस को इतने
ग़ौर से देखा है। आँखों के नीचे का माँस कितना झूल रहा है और
होठों के पास की झुर्रियों में एक सख़्ती सी है।
रोज़मैरी सैटी के एक कोने में धँस गई। सिर धीरे-धीरे हिल रहा
है। “बैठिए, मिस्टर लॉरेंस”, लिंडा ने कहा, “मुझे सचमुच बहुत
ख़ुशी है कि आपने मेरा निमंत्रण स्वीकार कर लिया।”
“लगता है फिर बर्फ़
पड़ेगी।” लॉरेंस खिड़की के बाहर झाँक रहे थे। मानो लिंडा की
बात सुनी ही न हो। लिंडा रोज़मैरी के क़रीब बैठ गईं। लॉरेंस आग
के क़रीब जाकर खड़े हो गए। जेब में से सिगार निकाला। सुलगाने
को हुए तो पीटर से मुख़ातिब हुए।
“आप पियेंगे।”
“नहीं शुक्रिया, मैं सिर्फ़ पाइप ही पीता हूँ...”
लॉरेंस ने एक कश लिया और बोले, “लोग सिगार खाने के बाद पीते
हैं, मैं पहले पीता हूँ।”
रोज़मैरी खाँसी। लॉरेंस को पहली बार जैसे ख़याल आया कि वह तीन
लोगों के बीच हैं।
“आपको धुँए से परेशानी तो नहीं हो रही है?”
“नहीं”, रोज़मैरी ने पहले से ही हिलता सिर कुछ और ज़ोर से
हिलाया। लिंडा शैम्पेन की बोतल ले आई। बोलीं, “यह मैं ख़ासतौर
पर आप लोगों के लिए लाई हूँ।”
“और क्या मैं इसे खोलने का सम्मान हासिल कर सकता हूँ?” पीटर ने
नाटकीय अंदाज़ में बोतल उठाई। और उसे ज़ोर से हिलाया। “अब होगी
धमाकेदार आवाज़।”
रोज़मैरी ने अपने कानों पर हाथ रख लिया।
हल्का सी आवाज़ हुई और शैम्पेन के झाग बोतल के बाहर आने लगे।
पीटर ने चारों गिलास भरे और बोले – “चीयर्स, बुढ़ापे के नाम।”
लिंडा मुस्कुराईं, “हम बूढ़ों और अकेलों के नाम।”
लॉरेंस ने लय तोड़ी। “आपको मालूम है, कल तेरह नंबर वाली मिसेज़
वुड की मौत हो गई...”
लिंडा का गिलास होठों के पास ही रुक गया।
“असल में, मौत तो दो दिन
पहले हुई थी शायद, पर किसी को ख़बर ही नहीं थी। दरवाज़ा बंद
था, दूध की बोतलें बाहर रखी रहीं। फिर किसी पड़ोसी को शक हुआ
तो उसने पुलिस को ख़बर दी।”
“ओ माई गॉड” लिंडा बुदबुदाईं।
“हाँ” लॉरेंस बोले, “जब दरवाज़ा तोड़ा गया तो देखा वह सीढ़ियों
पर गिरी हुई थीं और पास में एक बिल्ली बैठी थी।”
रोज़मैरी का हिलता हुआ सिर थम गया, “वही मिसेज़ बुड, जिनके
यहाँ कई बिल्लियाँ थीं। उफ़ बेचारी।”
“प्रभु किसी को इतनी बेगानी मौत ना दे” लॉरेंस की नज़र छत की
ओर टिक गई।
“कोई रिश्तेदार नहीं था उनका?” लिंडा ने पूछा।
“नहीं। सारी उम्र शादी नहीं की।”
रोज़मैरी ने रुमाल निकालकर नाक सुड़की और बड़बड़ाईं, “दो दिन
तक किसी को ख़बर ही नहीं हुई... ”
“क्रिसमस की छुट्टियों में तो वैसे ही इतनी वीरानी छा जाती है,
जैसे कोई त्योहार न हो राष्ट्रीय शोक मनाया जा रहा हो।”
लॉरेंस बोले।
मौत की ख़बर का असर शायद मौत से भी ज़्यादा दहशतभरा होता है।
लिंडा ने महसूस किया - वे लोग शैम्पेन नहीं, दहशत की चुस्कियाँ
ले रहे हैं। एक सन्नाटा उसके अपने भीतर उग आया था। एक रोज़मैरी
के, एक पीटर के और एक लॉरेंस के। चारों के भीतर का सन्नाटा –
एक साथ इस एक कमरे में मौजूद था। फ़ायरप्लेस में आग की लपटें
नीली हो रही थीं। रोज़मैरी के हाथ का गिलास टेढ़ा हो गया था।
पीटर की निगाह जल चुकी लकड़ियों पर थी और लॉरेंस कहीं शून्य
में देख रहे थे। और लिंडा? नहीं, लिंडा जॉर्ज की मृत्यु को याद
नहीं करना चाहतीं। |