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“भई आज क्रिसमस है। हम लोग मातमपुर्सी के लिए इकट्ठे नहीं हुए हैं।”
“असल में हम सब डर गए हैं।” लॉरेंस ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा।
“क्यों, डरने की क्या बात है।”
“कि यही हाल हम सबका ना हो।”
“मौत तो एक ना एक दिन सभी को आनी है मिस्टर लॉरेंस,” लिंडा ने कहा।
“पर क्या इतनी भयावह कि दो दिन तक लाश घर में बंद पड़ी रहे और किसी को आहट न हो।” रोज़मैरी की आवाज़ जैसे किसी धुँए से निकली।
“अरे भई छोड़ो मौत की बातें। मैं खाना लगाती हूँ”
“मैं कुछ मदद करूँ?” रोज़मैरी ने कहा।
“अरे नहीं, नहीं, बैठो।” लिंडा जानती हैं रोज़मैरी से कुछ नहीं होगा। जब कभी वह रोज़मैरी की झुकी हुई आकृति को शॉपिंग के थैलों के बोझ तले घिसटते देखती हैं, भीतर कहीं तकलीफ़ जागती है। काश! इसका कोई तो क़रीबी होता, जो इसके लिए और कुछ नहीं, कम से कम वक़्त-बेवक़्त ख़रीददारी करके ला सकता। पर शायद अपने हिस्से के दुःख हम सबको ख़ुद ही उठाने पड़ते हैं। वरना क्या रोज़मैरी अपनी बहन और बहनोई के साथ नहीं रह सकती थी। वे लोग यार्कशर में रहते हैं। एक बार बहुत ज़िद करके रोज़मैरी को ले गए थे अपने साथ। लिंडा को उम्मीद थी – अब रोज़मैरी का मन लग जाएगा, शायद अपना मकान बेचकर वहीं चली जाए। पर महीने भर बाद रोज़मैरी लौटी तो पहले से ज़्यादा कमज़ोर लग रही थी। बोली, “मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती।”

लिंडा ने मेज़ पर खाना लगाया। टर्की, सलाद, लाल वाइन की बोतल। पिछले साल उनकी बेटी मार्गरेट यह बोतल ले आई थी। कभी खोलने का मौक़ा ही नहीं मिला। लिंडा ने मोमबत्तियाँ जलाईं। भीतर जैसे एक लौ सी काँपी। जॉर्ज ने बड़े शौक से ये कैंडलसिस्टक्स ख़रीदी थीं। अब तो इनकी चमक धूमिल पड़ गई है। फिर भी लिंडा हर क्रिसमस पर इन्हें चमकाती हैं। ठीक उसी तरह जैसे बरसों से जमा किए संगीत के रिकॉर्ड्स को निकालती-संभालती हैं, उनकी धूल पोंछती हैं – क़रीने से लगाती हैं। पुराने रिकॉर्ड प्लेयर को अपनी बूढ़ी उंगलियों से छूती हैं। यह तो जॉर्ज से उनके विवाह के भी पहले का है। जॉर्ज की मृत्यु के बाद संगीत सुनना ही छो़ड़ दिया लिंडा ने। यहाँ तक कि अपने मनपसंद रिकॉर्ड भी। विवाल्डी का ‘फ़ोर सीज़न्स’ कितना प्रिय है उन्हें – वह भी कभी नहीं सुनती। बस भीतर ही कहीं, बजता रहता है। ‘फ़ोर सीज़न्स’ – चार ऋतुएँ। जॉर्ज कहते, मनुष्य का जीवन भी चार ऋतुओं में बँटा है।
आज क्यों न वही रिकॉर्ड बजाएँ!

वे लोग चुपचाप खा रहे थे और उसी चुप्पी को भर रही थी चुरी काँटों की खनक और विवाल्डी के संगीत की स्वर लहरियाँ। लिंडा इस संगीत रचना का एक-एक सुर पहचानती है। बसंत, ग्रीष्म, पतझड़ और शीत ऋतु... शीत के बाद तो बसंत आता है। ...लेकिन वृद्धावस्था के बाद? जीवन की यह चौथी ऋतु तो मृत्यु का प्रतीक है। जीवन का शीत है। उसके बाद बसंत तो नहीं लौटता। पर नहीं, शायद लौटता है – नन्हीं कोंपलों के रूप में.... किसी नवजात शिसु की गुलाबी मुट्ठियों के रूप में...
लॉरेंस इस बीच दो बार अपना गिलास भर चुके थे। तीसरी बार वाइन डालते हुए उन्होंने मौन तोड़ा, “बड़ी उम्दा टर्की बनाई है मिसेज़ स्मिथ।”

लिंडा को लगा कि शाम भर में पहली बार मिस्टर लारेंस का स्वर अपनी भीतरी सांकल खोलकर सहज हुआ है। शायद वह भी उन लोगों में से हैं जो थोड़ी शराब पेट में जाने के बाद ही सहज होते हैं। लॉरेंस की देखादेखी पीटर ने भी नैपकिन से मुँह पोंछते हुए कहा,
“और सलाद का तो जवाब नहीं। मेरी बीवी भी काफ़ी बढ़िया फ़िश सैलेड बनाती थी पर यह तो लाजवाब है। क्यों रोज़मैरी?”
रोज़मैरी का हवा में हिलता हुआ सिर पल भर के लिए रुका - “मुझे कभी कोई दावत पर बुलाएगा, यह सोचा ही नहीं था।”
“ऐसा क्यों सोचती हो रोज़मैरी,” लिंडा ने ढाँढस बँधाया। “अगली क्रिसमस पर फिर सही।”
रोज़मैरी के चेहरे की लकीरें जैसे और गहरी हो गईं - “अगली क्रिसमस! अगली क्रिसमस तो बहुत दूर है... बेचारी मिसेज़ वुड। ”

पीटर के चेहरे पर हँसी खेल गई। “हाँ, मिसेज़ वुड इस क्रिसमस पर ज़िंदा रह लेतीं तो उन्हें भी आज बुला लेते।”
रोज़मैरी की आँखें नम हो गईं। “मौत को लेकर मज़ाक मत करो पीटर,” लिंडा ने धीरे से कहा। “अरे, मौत को लेकर ही तो मज़ाक किया जा सकता है।” पीटर ने क्रिसमस पुडिंग चखते हुए कहा। “ऊपर वाले ने बुढ़ापा बनाकर जितना बड़ा मज़ाक किया है, हमें क्या इतना भी हक़ नहीं है।”
“पता नहीं... ” लॉरेंस ने वाइन का घूँट भरकर कहा।
“क्या पता नहीं, मिस्टर लारेंस...” पीटर ने चौंककर देखा।
“पता नहीं, मुझमें ऐसी क्या कमी थी कि ...” वह रुके, गिलास में बची वाइन गले के नीचे उतारते हुए बोले - “पता नहीं मुझमें ऐसी क्या कमी थी कि बीस साल साथ रहने के बाद मेरी बीवी ने मुझसे तलाक लेकर – किसी और से शादी कर ली...”
“मुझे अफ़सोस है” पीटर ने संजीदगी के साथ कहा।

लिंडा को लगा जैसे लॉरेंस अपना ज़िद से बंद किया दरवाज़ा आज ख़ुद खोल रहे हैं।
“पर मुझे इस बात का इतना अफ़सोस नहीं,” वह कह रहे थे। “अफ़सोस इस बात का होता है कि मेरे बच्चे भी मेरे पास आने की ज़रूरत नहीं समझते। अपनी माँ के पास कभी-कभार चले जाते हैं.... मैं ज़्यादा की उम्मीद नहीं करता पर क्रिसमस के दिन तो इस बूढ़े बाप से मिल लिया करें।” वे व्यंग्य से मुस्कुराए। “इस बार तो फ़ोन भी नहीं आया। बस एक कार्ड। आपने बड़ा अच्छा किया मिसेज़ स्मिथ। जो आज अपने यहाँ बुला लिया...”

लिंडा देख रही थी। लॉरेंस के चेहरे पर बहुत दिनों से भीतर दबी तकलीफ़ काँप रही है। बोलीं, “उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए मिस्टर लॉरेंस। हमारा फ़र्ज़ है बच्चों को बड़ा करना, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने के क़ाबिल बनाना। उन्हें बड़े होते देख हमें ख़ुशी भी तो होती है ना।”
“शायद आप ठीक कह रही हैं...पर कितनी अजीब बात है..” लॉरेंस का अधूरा वाक्य कुछ देर के लिए कमरे की ठहरी हुई हवा में टँगा रहा। पीटर ने पाइप निकाली, तम्बाकू भरा पर जलाई नहीं। बोले, “लाईए आज आपका एक सिगार पिएँ मिस्टर लॉरेंस...”
“ज़रूर, बड़ी ख़ुशी से।”

धुँए का एक बादल उठा और उन चारों के सिरों के ऊपर एक पतली चादर सा तन गया।
“कितनी अजीब बात है।” लॉरेंस फिर बोले, “एक ही सड़क पर रहते हुए हम इस तरह पहले कभी नहीं मिले।” रोज़मैरी की आँखों की नमी अब तक सूख गई थी। बोलीं, “यह तो लिंडा की कृपा है... ”
“कभी सोचा नहीं था.....”लॉरेंस बुदबुदाए, “.....कि अपना-अपना अकेलापन हम इस तरह मिल बैठकर बाँट सकते हैं।”

लिंडा ने महसूस किया कि इस साल पहली बार पीटर और लॉरेंस के बीच एक अनकहा रिश्ता जुड़ा है। पीटर ने जिस तरह लॉरेंस की ओर देखा, उसमें उपेक्षा या व्यंग्य नहीं, सहानुभूति थी.... “आपने सच कहा मिस्टर लॉरेंस... ”
“सिर्फ़ जॉन ही कहिए न, ” मिस्टर लारेंस ने कहा।
“ओह, थैंक्यू जॉन।” पीटर ने सिगार का एक कश लिया, “तुमने बहुत सही कहा, हम क्यों अपने अपने अँधेरे में बंद रहें। बल्कि मैं तो यह कहूँगा कि आने वाली गर्मियों में हम लोग कहीं एक साथ घूमने चलें। कितने बरस हो गए, लंदन से बाहर क़दम रखे.... क्यों?”

लिंडा मुस्कुराईं, “विचार तो बहुत अच्छा है... ”
रोज़मैरी का झुका हुआ सिर हल्का सा उठा, “गर्मियों में?” वह बोलीं, “पर गर्मियाँ तो अभी बहुत दूर हैं... ”
जॉन लॉरेंस ने बड़ी आत्मीयता के साथ रोज़मैरी के झुर्रियों वाले हाथ को छुआ। “कैसी बात करती हैं रोज़मैरी। दिसंबर का महीना तो ख़त्म ही समझो। गर्मियों में भला कितने दिन बाक़ी हैं... ”

लिंडा कॉफ़ी ले आईं।
“अभी तो थोड़ी सी ब्रैंडी और लूँगा, मिसेज़ स्मिथ।” पीटर ने कहा।
“ज़रूर, पर पहले आप लोग उठिये और वहाँ आग के पास बैठिए। मैं और लकड़ियाँ डाल देती हूँ।”
“मैं बर्तन धुलवा दूँ।” रोज़मैरी ने पूछा।
“नहीं थैंक्यू, रोज़मैरी।” लिंडा ने कॉफ़ी प्यालों में ढालते हुए कहा, “तुम यह कॉफ़ी पियो – बर्तन तो कल भी धुल जाएँगे।”

फ़ायरप्लेस में और लकड़ियाँ डालते हुए लिंडा ने ग़ौर किया – कि भले ही कोई बातचीत नहीं कर रहा था लेकिन कमरे में जैसे एक भरापन था। अपने लिए कॉफ़ी डालकर लिंडा भी आ बैठी। विवाल्डी की संगीत रचना शीत ऋतु अपने अंतिम चरण में थी। फ़ायरप्लेस में आग की लपटें उठीं। खिड़की के काँच पर हल्की-हल्की बर्फ़ दस्तक दे रही थी। लिंडा ने खिड़की के पर्दे को देख... सचमुच बहुत फीका पड़ गया है। क्रिसमस के बाद इस बार सेल में ज़रूर नया पर्दा ख़रीदकर लाएँगी... और उनकी आँखों के सामने क्रिसमस की सज्जा से आकर्षक बनीं ऑक्सफ़र्ड स्ट्रीट की दुकानें घूम गईं।

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२७ दिसंबर २०१०

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