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रंगमंच

नाटकों के इस स्तंभ में प्रस्तुत है सूरज प्रकाश का प्रहसन
हम कितना रोए


कमरे का दृश्य। मेज़ पर एक नेम प्लेट रखी है - उमा दत्त दूबे अनजान, उपन्यासकार।
एक लेखकनुमा आदमी कमरे में तेज़ से चहलकदमी कर रहा है। बार-बार घड़ी देखता है मानो किसी का इंतज़ार का रहा हो। कभी हवा से बातें करता है तो कभी सोच कर खुश हो जाता है मानो कोई बहुत बढ़िया आइडिया आ गया हो। वह जेब से पैन निकाल कर लिखना चाहता है लेकिन उसे कहीं भी कोई काग़ज़ नज़र नहीं आता है। अपने आपको कोसता है - कैसा लेखक हूँ मैं, कमरे में एक भी काग़ज़ नहीं। मजबूरन मेज़ की धूल पर ही उँगली से लिखता है। फिर हथेली पर लिखता है, दीवारों पर लिखता है और लगातार विचारों के चलते चले आने से परेशान है। बार-बार घड़ी और दरवाज़े की तरफ़ देखता है।
तभी पसीना पोंछते हुए लपकती हुई एक सुंदर, बनी ठनी लड़की आती है। आते ही सॉरी सर, सॉरी सर कहने लगती है।
अनजान साहब गुस्से में उसकी तरफ़ देखते रहते हैं लेकिन वह उनकी तरफ़ देखती ही नहीं।
वह पहले अपना मेक अप ठीक करती है और फिर पर्स से स्टेनोग्राफी वाला पैड निकाल कर डिक्टेशन लेने के लिए तैयार हो जाती है। वह एक बार भी अनजान साहब से निगाहें नहीं मिलाती।

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