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हास्य व्यंग्य

 

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नागरिक 1- ये हुई न बात! न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी! कितने दूर की सोची है महाराज ने!
नागरिक 2- ये तो क्रांतिकारी कदम है!
नागरिक 3- बोलो महाराज अनंत सुखदाता की!
सभी- जय!
नागरिक 5- लेकिन मेरा लड़का? उसका क्या होगा? वह एम.ए. है। उसको नौकरी कैसे मिलेगी?
नागरिक 3- उसके लिए हम विचार करेंगे न!
नागरिक 2- हाँ, हमारी पार्टी ज़रूर इस पर सोचेगी।
नागरिक 1- सोचना क्या? अब नौकरियाँ प्राइवेट सेक्टर में मिलेंगी।
नागरिक 2- और क्या! प्राइवेट सेक्टर यानी निजी कंपनियों में।
नागरिक 3- और विदेशी कंपनियों में। जहाँ तनख्वाह नहीं, पर्क मिलेगा।
नागरिक 2- यानी साल में तीन लाख! चार लाख! पाँच लाख!
नागरिक 1- हाँ। और बंगला, गाड़ी, प्राइवेट सेक्रेट्री वगैरह-वगैरह...।
नागरिक 4- लेकिन वो तो मशीनें ज़्यादा रखेंगी, आदमी कम।
नागरिक 3- तभी तो वो लाभ कमाएँगी न!
नागरिक 1- और जब लाभ कमाएँगी तभी न नौकरियाँ देंगी? इसीलिए तो बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हमारे राज्य में आ रही हैं।
नागरिक 2- प्रजा के हित में ही तो महाराज उन्हें यहाँ बुला रहे हैं।
नागरिक 4- लेकिन मेरा सवाल तो जस का तस है। मशीनें ज़्यादा और आदमी कम, तो फिर नौकरी कहाँ और कैसे? लाखों बेरोज़गार हर साल निकल रहे हैं। उन सबको कैसे नौकरी मिलेगी?
नागरिक 1- अरे तो सबको नौकरी थोड़ी दी जा सकती है भैया! इसीलिए तो हमारे राज्य का भट्ठा बैठ गया था।
नागरिक 4- लेकिन आखिर वो बेरोज़गार जाएँगे कहाँ?
नागरिक 5- वहीं, जहाँ से आए थे। इस दुनिया से बहुत दूर।
नागरिक 1- देखो, हमारे राज्य में मुद्रास्फीति कितनी कम हो गई है।
नागरिक 2- देखो, हमारे राज्य में विदेशी निवेश कितना ज़्यादा हुआ है।
नागरिक 3- देखो हमारे राज्य में विदेशी मुद्रा की भरमार हो गई है।
नागरिक 1- हम दुनिया के शक्तिशाली दस राज्यों में हो गए हैं।
नागरिक 2- हमारा राज्य फिर से सोने की चिड़िया बनने जा रहा है।
नागरिक 3- हम दुनिया का सिरमौर होने जा रहे हैं।
नागरिक 5- मुझे तो कुछ नहीं दिखता।
नागरिक 1- क्यों, तुम्हें राज्य की तरक्की नहीं दिखती?
नागरिक 2- अगर नहीं दिखती तो तुम्हें मोतियाबिंद है।
नागरिक 3- या फिर तुम विरोधी दलों से मिले हो।
नागरिक 1- या फिर तुम देशद्रोही हो।
नागरिक 4- सब झूठ है। छलावा है। धोखा है। एक सपना है। एक बहुत ही ख़तरनाक सपना।
नागरिक 1- ख़तरनाक? वो कैसे?
नागरिक 4- एक बार अंग्रेज़ों ने हमारे हाथ काटे थे। हमारे घरों में जो छोटे-छोटे रोज़गार थे, सबको ख़त्म कर दिया था उन्होंने। इस बार फिर वही हो रहा है। हमारे छोटे-बड़े उद्योग मिट्टी में मिल जाएँगे इस बार।
नागरिक 2- कैसे?
नागरिक 4- बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपनी विशाल पूँजी और नई से नई मशीनों के साथ यहाँ आ रही हैं। उनके सामान कहीं ज़्यादा अच्छे और सस्ते भी होंगे।
नागरिक 3- ये तो अच्छी बात है यार, इसमें बुरा क्या है?
नागरिक 4- बुरा यह है कि फिर हमारे घरेलू उद्योगों के माल को कौन ख़रीदेगा?
नागरिक 1- खुली प्रतियोगता बुरी नहीं होती। हमने अपना बाज़ार खोला है। आओ अपना माल बेचो। जिसका माल अच्छा होगा और सस्ता होगा लोग उसे ही ख़रीदेंगे।
नागरिक 5- मेरे तीन लड़के हैं। तीनों नालायक हैं। काम-धाम कुछ नहीं करते, सिर्फ़ भोजन करते हैं...लेकिन, मैं उन्हें भोजन देना बंद तो नहीं कर सकता! मैं अपने घर में दूसरा बेटा तो नहीं ला सकता!
नागरिक 4- मैं बेरोज़गार हूँ। इस राज्य की धरती पर पैदा हुआ हूँ। जैसी शिक्षा और जैसी परवरिश इस राज्य ने दी है, वैसा ही हूँ। क्या मेरे भविष्य की ज़िम्मेवारी राज्य की नहीं है?
नागरिक 1- (नागरिक 2 से) सुनो, अब हमारी ज़िम्मेवारी सामने आ गई है।
नागरिक 2- इनके भविष्य की ज़िम्मेवारी?
नागरिक 1- नहीं। अपने भविष्य की ज़िम्मेवारी। हमें महाराज के कार्यों को जस्टीफाई करना होगा। यानी कि महाराज को जस्टीफाई करना होगा। अगर हम उनको ही जस्टीफाई नहीं कर पाएँगे तो अपने को कैसे कर पाएँगे? इसके पहले कि जनता के बीच से बग़ावत की हवा हिलना शुरू करे, हमें राजमहल से 'एड' लेकर प्रचार की आँधी चलानी होगी। एक तूफ़ान पैदा करना होगा, एक बवंडर पैदा करना होगा...।
नागरिक 2- तो खोल दो सारे चैनल! आने दो पश्चिमी हवायें!
नागरिक 1-2 - ग्लो..ब..ला..इ..जे..श..न! विश्व..व्या पी..करण!
नागरिक 1- प्रेसीडेंट क्लिंटन एक्सेप्टेड द अनवांटेड रिलेशनशिप विद मोनिका लेंवेंस्की!
नागरिक 2- द ऑस्कर गोज टु ..!
नागरिक 1-2- हे ए ए ए!
नागरिक 1- मिस युनिवर्स...
नागरिक 1-2- हे ए ए ए!
नागरिक 1- इंफार्मेशन टेक्नालॉजी! डिस-इंन्वेस्टमेंट!
नागरिक 2- अवर आई टी एक्सपर्टस् आर बेस्ट आफ़ द वर्ल्ड!
नागरिक 1- अवर लेडीज़ आर ब्यूटिएस्ट आफ़ द वर्ल्ड!
नागरिक 2- वी आर गोइंग टु बी रिचेस्ट आफ द वर्ल्ड!
नागरिक 1- अवर पब्लिक सेक्टर हैज बिकम ए बर्डन ओवर अस! प्राइवेटाइज़ इट!
नागरिक 2- कब तक जनता सहती रहेगी बोझ इन सफ़ेद हाथियों का! प्राइवेटाइज इट!
नागरिक 2- सरकारी संस्थान हमारे लिए बोझ बन चुके हैं। इनकी सेवायें अच्छी नहीं हैं। जीवन बीमा निगम, व्यापारिक बैंकें, सबको निजी हाथों में दो।
नागरिक 1- प्राइवेटाइज़ इट!
नागरिक 2- वि..वि...वि...वि..
नागरिक 2- नि...नि...नि...नि..
नागरिक 1- वे...वे...वे..वे...
नागरिक 2- श...श...श...श..
नागरिक1,2,3 (एक साथ)- विनिवेश! डिसइन्वेस्टमेंट!
नागरिक 1,2,3 विभिन्न दिशाओं में संपन्नता का भाव दर्शाते हैं।
नागरिक 1- चारों तरफ़ सुख ही सुख, ऐश्वर्य ही ऐश्वर्य! अपना राज्य फिर से बनने जा रहा है सोने की चिड़िया!
नागरिक 2- सोने की चिड़िया। यानी सोना ही सोना। धन ही धन। कोई ग़रीब नहीं रहेगा। सब अमीर होंगे। सभी संपन्न होंगे। बोलो - सभी संपन्न होंगे। मिल कर गाओ ! हम अपना राज्यगान गाएँगे।
नागरिक 1- हम होंगे कामयाब। हम होंगे कामयाब। हम होंगे कामयाब एक दिन...
नागरिक 1,2- हो ओ.. मन में है विश्वास। पूरा है विश्वास। हम होंगे कामयाब एक दिन।

नागरिक 4 व 5 आतंकित हैं, नागरिक 1 व 2 उन पर दबाव बनाते हैं।
नागरिक 1- होगा धन चारों ओर..
नागरिक 2- होगी संपत्ति चारों ओर...
नागरिक 1-2- संपन्नता चहुँ ओर एक दिन...

नागरिक 4 व 5 भी होंठ चलाने लगते हैं।
सभी- हो ओ...मन में है विश्वास। पूरा है विश्वास। हम होंगे कामयाब एक दिन...

नागरिक 5 आगे आता है। उसकी आँखों में आँसू आने लगते हैं, परंतु नागरिक 4 निराशाभरी आँखों से नागरिक 5 के पैरों के पास बैठ जाता है। वह गा तो रहा है, परंतु, निराशा के साथ। सभी चुपचाप फ्रीज होते हैं। नागरिक 1 व 2 के चेहरों पर कठोरता है।

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15 अगस्त 2007

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