कीचड़ पनपने लगते हैं फिर वह पानी नहीं कहला सकता। जोगी भी ध्यान धारणा छोड़ दे तो जोगी कहाँ रह जाएगा? इसलिए जो व्यापार करता है ठहर नहीं सकता, ठहरा तो व्यापार खत्म। सो वे निरंतर व्यस्त ही रहते हैं- कार्यालय में बाज़ार में और यात्राओं में।

नीलू विरमानी यानि नीलम किरण विरमानी उनकी यह फिलॉसफी शादी के बाद से अबतक हज़ार बार सुन चुकी हैं। पैंतीस साल से यह सुनते सुनते उन्हें व्यापार की फिलॉसफी के साथ-साथ औरत की भी एक फिलॉसफी ठीक से समझ में आ गई है कि गृहणी `रमता जोगी बहता पानी' नहीं है। उसे ठहरे हुए, चुप और अकेले ही चारदीवारी के भीतर खुश रहना सीखना है। अगर वह घर के बाहर निकल पड़े और चलने लगे तो गृहणी नहीं फिर तो वह अध्यापिका, सेकरेटरी या कुछ और हो जाए। नीलू विरमानी पिछले तीस सालों से गृहणी हैं। उससे पहले वे दिल्ली के लेडी ईविंग कॉलेज की छात्रा थीं। बस होम साइंस में बीएस सी पास करते ही परिचित रिश्तेदारी में शादी तय हो गयी और वे शादी के बाद विरमानी साहब के साथ दुबई आ गयीं।

उन दिनों  यहाँ ज्यादा भारतीय नहीं थे। देरा दुबई के एक पुराने फ्लैट को, जहाँ उन्होंने अपने जीवन की शुरूआत की थी, छोड़े भी लंबा अरसा हो गया। इस बीच वे एक बेटे और फिर एक बेटी की माँ बनीं। बेटा दूसरे दर्जे में था तबसे ही वे शारजाह के इस बंगले में हैं। बच्चे इसी लॉन पर खेलकूद कर बड़े हुए। यहीं बर्थडे पार्टियाँ हुईं। फिर स्कूल ख़त्म हुए। एक ओर समय पंख लगा कर उड़ गया और दूसरी ओर बच्चे।

अब उनके दो साथी हैं एक मोबाइल फोन और दूसरा वॉकी टाकी जो लैंड लाइन के नंबर से जुड़ा है। दोपहर का ज्यादातर समय उनका इसी लॉन में रखी आराम कुर्सी पर लेटे-बैठे बीतता रहा है। बेटा यू एस ए से या बेटी ऑस्ट्रेलिया से इस फोन के ज़रिए उन्हें मिल जाते हैं। दोनों को उनका समय मालूम है कि मॉम इस समय बात करने के लिए फ्री होती हैं। कभी भारत से रिश्तेदारों के फोन, कभी स्थानीय मिलने जुलने वालों के। ख़ाली समय मिलता है तो दो पल आँखें बंद कर वे यहीं ऊँघ लेती है।

पहले कभी-कभी कढ़ाई-बुनाई भी हो जाती थी पर पिछले कुछ दिनों से वे यहाँ की शांति में आराम से बैठ कर कोई किताब पढ़ती रहती हैं। खजूर के तीन पेड़ों की छाँह में आराम कुर्सी के साथ एक मेज़ भी है जहाँ दोनो फोन, किताब, जूस का गिलास या कॉफी का मग नीलम विरमानी का साथ निभाते हैं।

आज भी विरमानी साहब के जाने के बाद नीलम विरमानी पक्षियों के लिए बने बर्ड बाथ के सामने खजूर के पेड़ों की इस छाँह में आराम कुर्सी पर आ बैठीं। कॉफी का मग मेज़ पर रखा और गले में सोने की चेन से लटका चश्मा खोल कर पहनने लगीं। कुछ ही दिन पहले नया उपन्यास पढ़ना शुरू किया है- कमलेश्वर का `सुबह द़ोपहर श़ाम'। उपन्यास भारत में स्वतंत्रता से पहले की स्थितियों पर आधारित है पर न जाने कैसे वह सागर पार पाँच छे दशक बाद के नीलम विरमानी के जीवन में घुलता जा रहा है।

घर में सन्नाटा है पर ऊँची चारदीवारी के बाहर सर्दियों में रौनक रहती है। इमारात की सर्दियाँ यानि मुहल्ले की सड़कों पर बच्चों के हंगामे वाले दिन- सारे दिन फुटबॉल। फुटबॉल- जो यहाँ का राष्ट्रीय खेल है। धाड़ धाड़ धाड़ धुआँधार आवाज़ें, खड़िया से खींचे गए गोल के निशानों के गिर्द दौड़ते हुए बच्चे, `गोल' होने की खुशनुमा चीखें, भाग-दौड़, बीच-बीच में कोई ऊँचा और बेसुरा गीत, हँसी के झरने और विवाद के तूफ़ान।

किसी कार का हार्न बजता है तो कुछ पलों के लिए खेल रुक जाता है। खेल के रुकते ही आवाज़े भी थम जाती हैं। कार के निकल जाने के बाद हल्की बातों से सिलसिला शुरू होता है और खेल के तेज़ी पकड़ते ही बढते हुए उत्साह के साथ शोर और बातचीत फिर तेज़ हो जाते है। फिर शुरू हो जाती है भाग दौड़ और फिर वही धाड़ धाड़ की आवाज़ें।

घर की चारदीवारी से यह सबकुछ दिखता नहीं सिर्फ सुनाई देता है। देश के रिवाज़ के अनुसार इस मुहल्ले की बाहरी दीवारें छे सात फुट ऊँची हैं। दुमंजिले घर भी कम ही हैं। सो बाहर से भीतर और भीतर से बाहर की दुनिया पर पर्दा पड़ा रहता है। दीवारों पर जड़े हैं बड़े़-बड़े दरवाज़े, लगभग एक से। ऐसी ऊँची दीवारों पर ऐसे दरवाज़े देख शुरू शुरू में उन्हें अलीबाबा और चालीस चोर वाली कहानी याद आ जाती थी। जहाँ चोर, अलीबाबा के घर को पहचानने के लिए उसके दरवाज़े पर एक निशान बना देता है और फिर मरजीना ख़तरे को भाँप कुछ और घरों के दरवाज़ों पर भी ऐसे ही निशान बना देती है। यहाँ भी अलग अलग तरह के कुछ निशान दरवाज़ों पर हैं पर चोर या मरजीना के बनाए हुए नहीं बल्कि अलग-अलग सरकारी विभागों के।

शोरगुल फिर तेज़ हो गया है। यों तो शोरगुल रोज़ की बात है पर अक्सर यह उनकी शांति में खलल बन जाता है। आज भी कुछ ऐसा ही लगता है। बच्चे ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहे हैं। लगता है दोनों टीमों में लड़ाई हो गई है। बच्चे अरबी बोल रहे हैं। भाषा समझ में नहीं आ रही है लेकिन आवेग समझा जा सकता है। नीलम विरमानी ने बेडनुमा आरामकुर्सी पर करवट ली, उपन्यास को मेज़ पर खिसका कर हाथ के उस हिस्से को चुन्नी से ढँक लिया जो छाँह से बाहर हो गया था और शोर को नज़रंदाज करते हुए सोने का उपक्रम करने लगीं।

आँख मूँदे दस मिनट भी न हुए थे कि फुटबाल दीवार फलांग उनके पास ही आ गिरा। शोर रूक कर बातों में सिमट गया। धीरे धीरे नज़दीक आया और फिर उन्हीं के दरवाजे के पास आकर ठहर गया। तेज़ घंटी भीतर से बाहर तक बज उठी। वे नींद का मोह त्यागकर उठीं और कदम साधते हुए लॉन के पार क्यारी में पड़े फुटबॉल तक पहुँचीं। तब तक घंटी न जाने कितनी बार बज चुकी थी। जैसे ही उन्होंने दरवाज़ा खोला बच्चों के चेहरों पर रौनक फूट पड़ी। शुकरन (धन्यवाद) के एक झटकेदार उच्चार के साथ टीम फुटबॉल को ले उड़ी।

नीलम विरमानी ने दरवाज़ा बंद किया। भीतर तक गईं, एक गिलास पानी पिया और फिर से बाहर आकर आराम कुर्सी पर बैठ उपन्यास खोल लिया। उपन्यास में भी मन ठीक से रमा नहीं

बच्चों का इस तरह सड़क पर खेलना उन्हें हमेशा से नागवार गुज़रता है। हिंदुस्तान में उनके बचपन में घर के सामने जब क्रिकेट चलता था तब भी। मालूम नहीं ये दिनभर खेलने वाले बच्चे स्कूल कब जाते होंगे। अपने बच्चों को उन्होंने कभी अरबी बच्चों के साथ नहीं खेलने दिया। वे अच्छी तरह जानती थीं कि हिंदुस्तानी बच्चों को पढ़ लिखकर होशियार बनना होता है। रईस अरबियों के बिगड़ैल बच्चों की तरह बरबाद होकर जीवन बिताना हिंदुस्तानी परिवार में संभव नहीं।

जब वे बारहवीं में थीं न जाने अपने मुहल्ले के कितने बच्चों का सारे दिन का क्रिकेट बंद करवा उन्हें पढ़ने बिठाया होगा। मुहल्ले की दीदी हुआ करती थीं वे। पर यहाँ किससे क्या कह सकती हैं? यह देश अपना थोड़ी है। फिर मुहल्ले के इस खंड में कोई बड़ा पार्क नहीं है जहाँ बच्चे फुटबाल खेल सकें। बीच में एक जगह ज़मीन का भीमकाय टुकड़ा खाली पड़ा है पर वहाँ इधर-उधर के मकानों से मरम्मत के समय फेंके गए मलबे के ढेर हैं, नुकीली झाड़ियाँ हैं, फुटपाथ के उखड़े हुए पत्थर हैं और दो पुरानी कारें जो न जाने कितने सालों से पड़ी कूड़ा बनने की प्रक्रिया से गुज़र रही हैं।

तो बच्चे बेचारे कहाँ खेलें, हर गली में जमे रहते हैं। यहाँ पर मोटर गाड़ियों की विशेष आवाजाही जो नहीं। फुटबॉल लोहे के दरवाज़ों से टकराती है तो ज़ोर की `धड़ांग' होती है, कारों के शीशे टूटते हैं, बच्चों की मांओं में कहासुनी होती है और तेज़ वाहनों के संतुलन भी बिड़ते हैं पर यहाँ की सड़कों पर फुटबॉल जारी रहता है। सब कुछ समझते-बूझते हुए भी वे अक्सर खीझ जाती हैं- आखिर बच्चे फुटबाल क्यों खेलते हैं?

ज़ोर की घंटी बजी तो नीलम विरमानी का ध्यान टूटा। फुटबॉल फिर से अंदर आ गया था। दरवाज़े के बाहर बच्चों का झुंड तेज़ साँसों के साथ खड़ा था। घंटी की आवाज़ गूँज उठी थी। नीलम धीरे से उठीं पहले लॉन के दूसरे कोने पर पड़े फुटबॉल को उठाया, लौट कर दरवाज़े तक आईं और कुंडी खोली।

ठंडे मौसम और गुनगुनी धूप के बावजूद गोरे अरबी बच्चों के चेहरे लाल हो गए थे। वे पसीने तरबतर थे और अभी तक हाँफ रहे थे। फुटबॉल लेने के लिए जो लड़के दरवाज़े पर खड़े थे वे कम उम्र के मालूम होते थे लगभग दस साल के। बड़े लड़के शायद शर्म या संकोच के कारण दूर खड़े उनकी ओर देख रहे थे। छोटे लड़कों के साथ तीन चार साल की एक लड़की भी थी जिसके बाल घुँघराले थे। वह हाथ में लॉलीपॉप लिए हुए लगातार चूस रही थी। किसी खिलाड़ी की छोटी बहन होगी मिसेज़ विरमानी ने सोचा। उन्होंने फुटबॉल दूर उछाल दिया। बड़े लड़कों ने उसे फुर्ती से लपक लिया और छोटे बच्चे भी उसी ओर दौड़ गए। हाँ पीछे मुड़कर `शुकरन हबीबी' कहना वे नहीं भूले। मिसेज़ विरमानी ने मुस्कुरा कर दरवाज़ा बंद कर लिया।

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