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1. सभी भारतीय भाषाओं के लिए समान कुंजीपटल
विविधता में एकता अर्थात
Unity in Diversity
भारतीय संस्कृति को मूलभूत विशेषता रही है। यही
अंतर्निहित समानता ब्राह्मी लिपि से उद्भूत और विकसित सभी भारतीय लिपियों में भी
कमोबेश रही हैं। ब्राह्मी लिपि संस्कृत और भारतीय भाषाओं के लिए लगभग 350 ई.पू. से
लेकर 350 ई. तक केवल भारत में ही नहीं, अन्य अनेक पड़ोसी
देशों में भी प्रयुक्त होती थी। यह लिपि अपने युग की सर्वाधिक वैज्ञानिक और आदर्श
लिपि थी। यही कारण था कि खरोष्ठी आदि लिपियों के रहते हुए भी बौद्ध तथा जैन धर्म के
प्रचारकों ने भी ब्राह्मी लिपि को ही अपने धर्म के प्रचार और ग्रंथों के निर्माण के
लिए इस्तेमाल किया। चौथी शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्राह्मी लिपि दो शैलियों में भी
विभक्त हो गई, उत्तरी और दक्षिणी शैली। उत्तर भारत की सभी लिपियाँ ब्राह्मी की
उत्तरी शैली से और दक्षिण भारत की लिपियाँ दक्षिणी शैली से विकसित हुई हैं। कालांतर
में इनमें काफ़ी अंतर आ गया। इस अंतर का एक प्रमुख कारण कदाचित लेखन सामग्री की
भिन्नता भी रहा है। दक्षिण भारत में ताड़ वृक्षों की बहुलता के कारण लेखन सामग्री
के रूप में ताड़पत्रों का प्रयोग किया जाता था। और उस कलम पर सीधे लेखन से
ताड़पत्रों के फटने की आशंका रहती थी। इसलिए नोकदार सूखी कलम से वृत्ताकार रूप में
लिखने की परंपरा विकसित हुई। इसके विपरीत, उत्तर भारत में चपटी और खोखली कलम से
वृत्त के बजाय ऊपर नीचे की मात्राओं के साथ लिखने की परंपरा विकसित हुई।
इतनी विविधताओं और विभिन्नताओं के
बावजूद ध्वन्यात्मक स्वरूप होने के कारण इन सभी लिपियों की वर्णमाला के क्रम में
विलक्षण समानता है। इसी अंतर्निहित समानता को आधार बनाकर कुछ लिपियों में प्रचलित
विशिष्ट ध्वनियों को 'परिवर्धित देवनागरी' के अंतर्गत समाहित कर लिया गया है। इसी
मूलभूत समानता को आधार बनाकर वर्ष 1983 में आई.आई.टी., कानपुर के वैज्ञानिकों ने
सभी भारतीय भाषाओं के लिए एक समन्वित देवनागरी टर्मिनल का विकास किया, जिसे वर्ष
1986 में दिल्ली में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रदर्शित किया गया। दो वर्ष
के बाद भारत में सुपर कंप्यूटर के लिए इलैक्ट्रॉनिकी विभाग के अंतर्गत पुणे में
स्थापित सी-डैक ने इसे 'जिस्ट' (Graphics and
Intelligence Script Technology) के रूप में
पुष्पित और पल्लवित किया। सभी भारतीय लिपियों में अंतर्निहित समानता के आधार पर
'इस्की' (ISCII
Aqaa-t\
Indian Standard code for Information Interchange)
कोडिंग प्रणाली का विकास किया गया। कंप्यूटर जगत में अंग्रेज़ी के वर्चस्व को देखते
हुए इस प्रणाली में भारतीय लिपियों के साथ-साथ रोमन लिपि को भी समाहित किया गया और
इसके लिए 'इन्स्क्रिप्ट' (Indian
Script का
संक्षिप्त रूप) कुंजीपटल का विकास किया गया। अभी तक सभी भारतीय भाषाओं और लिपियों
के लिए यांत्रिक टाइपराइटर के लिए अलग-अलग कुंजीपटल इस्तेमाल किए जाते थे। इतना ही
नहीं, सिर्फ़ देवनागरी लिपि के लिए दो-तीन कुंजीपटल आज भी प्रचलन में हैं। ऐसी
स्थिति में रोमन, और सभी भारतीय लिपियों (उर्दू को छोड़कर) के लिए एक समन्वित
कुंजीपटल (integrated keyboard)
के विकास की परिकल्पना भी भारतीय संस्कृति की मूल भावना 'विविधता में एकता' अर्थात
'Unity in
Diversity'
के ही अनुरूप थी। इसके लिए सभी भारतीय भाषाओं की 55
मूल ध्वनियों को समान वर्ण या character
के रूप में ही 'इस्को' में समाहित किया गया था। 'इस्को' कोडिंग प्रणाली 8 बिट पर
आधारित है, जबकि अधिकांश योरोपीय भाषाओं के लिए प्रयुक्त रोमन लिपि के लिए विकसित
'आस्की' (ASCII
Aqaa-t\ American Standard Code for Information Interchange)
कोडिंग प्रणाली 7 बिट पर आधारित है किंतु 'इस्की' के अंतर्गत इसे भी समाहित किया
गया है। सह अस्तित्व (co-existence)
की इसी भावना के कारण 'इन्स्क्रिप्ट' कुंजीपटल से भारतीय भाषाओं के साथ-साथ रोमन
लिपि में लिखी जाने वाली योरोप की अधिकांश भाषाओं में भी कंप्यूटर पर काम किया जा
सकता है। सभी भारतीय लिपियों के लिए समान कोडिंग प्रणाली के कारण उनमें परस्पर
लिप्यंतरण (transliteration)
की सुविधा भी अनायास ही उपलब्ध हो गई है। साथ ही यह सुविधा रोमन में भी उपलब्ध है,
अर्थात भारतीय लिपियों से रोमन में भी लिप्यंतरण किया जा सकता है।
वस्तुत: यह एक ऐतिहासिक संयोग ही है
कि कंप्यूटर के लिए आरंभ में रोमन लिपि का उपयोग किया गया, किंतु इसका कोई तकनीकी
कारण नहीं हैं। यह तथ्य तो सर्वविदित ही है कि कंप्यूटर का विकास सर्वप्रथम उन
देशों में हुआ जिनकी भाषा मुख्यत: रोमन लिपि पर आधारित थी, किंतु आज रोमनेतर
लिपियों में भी कंप्यूटर का व्यापक उपयोग किया जाने लगा है। कुछ हद तक यह सही है कि
रोमन लिपि रेखिक(linear)
होने के कारण यंत्र के लिए अपेक्षाकृत अधिक सुगम है, किंतु "नासा" (NASA)
के प्रसिद्ध अमरीकी वैज्ञानिक रिक ब्रिग्ज़ की यह धारणा है कि देवनागरी लिपि में
लिखी जाने वाली संस्कृत भाषा कंप्यूटर प्रोग्राम की दृष्टि से आदर्श भाषा है। इसका
कारण कदाचित यही है कि यह अत्यंत सूत्रबद्ध (codified)
भाषा है।
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