प्रौद्योगिकी

सूचना प्रौद्योगिकी और भारतीय भाषाएँ- 2
--विजय कुमार मल्होत्

वस्तुत: आज आवश्यकता इस बात की है कि 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना से विश्व की सभी भाषाओं और लिपियों को एक ही कोड़िंग प्रणाली के अंतर्गत समाहित किया जाए। रोमन लिपि की सुगमता के कारण आरंभ में विश्व की सभी भाषाओं में कुंजीयन (keying) का कार्य रोमन लिपि के माध्यम से करने के प्रयास किए गए। इस दिशा में अमरीका की ज़ीरोक्स कॉर्पोरेशन द्वारा विकसित 'स्टार' सॉफ्टवेयर अत्यंत लोकप्रिय सिद्ध हुआ। वस्तुत: रोमनेतर लिपियों में इतनी अधिक भिन्नता है कि उन्हें एक कुंजीपटल पर लाना कोई सहज कार्य नहीं है। अरबी और हिब्रू दाएँ से बाएँ लिखी जाती हैं। चीनी लिपि अधिकांशत: ऊपर से नीचे लिखी जाती है। चीनी एक रूपमिक (morphemic) लिपि है। इसमें 65,536 भावचित्र (ideographs) हैं और प्रत्येक भावचित्र का अलग-अलग अर्थ है। ऐसी वैविध्यपूर्ण और विशिष्ट लिपि को 'स्टार' के अंतर्गत 1284 रोमन अक्षरों में लिप्यंतरित किया गया है। कोरियन लिपि में अनेक अक्षरों का गुच्छा (cluster) बन जाता है। इसे 1443 रोमन अक्षरों में समाहित किया गया है। जापानी लिपि में भी लगभग 50,000 भावचित्र हैं। इन्हें जापानी भाषा में 'कंजी' कहा जाता है। इन तमाम भावचित्रों को रोमन के 2000 से 3000 अक्षरों में समाहित किया गया है। जहां तक भारतीय भाषाओं का संबंध हैं, भारत में अठारह संविधान सम्मत भाषाएँ हैं और ये भाषाएँ 10 अलग-अलग लिपियों में लिखी जाती हैं, किंतु सभी भाषाएँ ध्वन्यात्मक हैं और उर्दू को छोड़कर शेष भाषाओं की वर्णमाला भी एक है।

किंतु वर्ष 1991 में विश्व की सभी भाषाओं के लिए युनिकोड 1.0 से संबंधित एक प्रलेख प्रकाशित किया गया, जिसमें इस्की-88 कोड को भी समाहित किया गया था। बाद में उसी वर्ष के दौरान भारतीय मानक ब्यूरो ने IS 13194 : 1991 के रूप में इस्की-91 कोडिंग प्रणाली को मानक के रूप में स्वीकार कर लिया। आज विंड़ोज़ 2000 के रिलीज़ के बाद युनिकोड प्रणाली विश्वभर में लोकप्रिय हो गई है। वस्तुत: युनिकोड ही एकमात्र ऐसी मानक प्रणाली है, जिसमें विश्व की अधिकांश भाषाओं के शब्दों और अक्षरों को समाहित किया गया है। एक समय था, जब कंप्यूटर 8 बिट प्रणाली पर आधारित होते थे तो एक बाइट (byte) में 256 तरीकों से ही अक्षरों को व्यक्त किया जा सकता था। अंग्रेज़ी भाषा के 26 अक्षरों के लिए तो यह उपयुक्त थी और भारतीय भाषाओं की 55 मूल ध्वनियों को भी इसके अंतर्गत समाहित किया जा सकता था, किंतु चीनी, कोरियाई और जापानी जैसी भाषाओं की जटिल लिपियों के लिए यह पर्याप्त नहीं थी। इसलिए 16 बिट प्रणाली के अंतर्गत युनिकोड की परिकल्पना की गई, जिसके अंतर्गत 65,536 अक्षरों को समाहित किया जा सकता था। इसके फलस्वरूप सभी भाषाओं के लिए अलग-अलग परिचालन प्रणाली की आवश्यकता भी नहीं रह गई। इसका दूसरा लाभ यह होगा कि इंटरनेट पर केवल अंग्रेज़ी का वर्चस्व नहीं रहेगा। सहअस्तित्व की भावना के साथ विश्व की सभी भाषाएँ इसमें समाहित हो जाएँगी। चूँकि युनिकोड में रोमन पर आधारित मानक कोडिंग प्रणाली आस्की-7 के 256 अक्षर भी शामिल हैं, इसलिए 8 बिट पर आधारित कंप्यूटर भी युनिकोड़ के अनुरूप हैं। भारतीय भाषाओं के लिए विकसित 'इस्की-8' को भी युनिकोड में स्थान दिया गया है

2. विभिन्न परिचलन प्रणालियों में भारतीय भाषाओं की स्थिति

आज 'डॉस', 'विंडोज़' और 'युनिक्स', 'मैक' आदि सभी परिचलन प्रणालियों (Operating Systems) भारतीय भाषाओं में संसाधन की सुविधा मौजूद हैं। इस कार्य में अनेक सरकारी और गै़र-सरकारी संस्थाओं का योगदान रहा है। सरकारी संस्थाओं में भारत के लिए सुपर कंप्यूटर के निर्माता पुणे (महाराष्ट्र) स्थित 'सी-डैक' का योगदान अप्रतिम है। इस संस्था ने भारतीय भाषाओं के लिए सॉफ्टवेयरों की एक पूरी श्रृंखला विकसित की है। 'डॉस' परिवेश के अंतर्गत भारत की अनेक प्रमुख संस्थाओं ने शब्द संसाधन (Word Processing) के अनेक पैकेज विकसित किए। इनमें प्रमुख है - 'एएलपी', 'मल्टीवर्ड', 'शब्दरत्न', 'शब्दमाला', 'अक्षर', 'बाइस्क्रिप्ट', 'सुवर्ड' आदि। किंतु शब्द संसाधन के साथ-साथ डैटा संसाधन (Data Processing) का कार्य हिंदी में करने के लिए सी-डैक ने 'जिस्ट कार्ड', आर.के. कंप्यूटर्स ने 'सुलिपि' और 'सॉफ्टेक' कंपनी ने 'देवबेस' विकास किया। किंतु जहाँ 'सुलिपि' और 'देवबेस' में भारतीय भाषाओं में केवल हिंदी को ही समाहित किया गया है, वहाँ सी-डैक, पुणे द्वारा विकसित 'जिस्ट' कार्ड में भारतीय भाषाओं की सभी लिपियों के साथ-साथ दक्षिण-पूर्वेशिया और योरोप की कुछ लिपियों को भी समाहित किया गया है। फारसी-अरबी पर आधारित उर्दू लिपि भी 'जिस्ट कार्ड' की अन्यतम विशेषता है, किंतु ये सभी सॉफ्टवेयर आईबीएम पीसी के लिए है, मैक (MAC) प्लेटफॉर्म के लिए सी-डैक ने 'एएलपी' शब्द-संसाधन का विशेष वर्शन (version) विकसित किया है।

इसमें संदेह नहीं कि इन सॉफ्टवेयरों के माध्यम से डॉस परिवेश के अंतर्गत सरलता से हिंदी में काम किया जा सकता है, किंतु अभी भी इनके कमांड (
command) और मेन्यू (menu) आदि अंग्रेज़ी में ही है। इस कठिनाई को देखते हुए आईबीएम टाटा कंपनी ने आर.के.कंप्यूटर्स की मदद से 'हिंदी डॉस' नाम से एक ऐसी परिचलन प्रणाली (operating system) का विकास किया है, जिसके अंतर्गत 'कमांड' और 'मेन्यू' भी हिंदी में दिए गए हैं और फ़ाइल का नाम भी हिंदी में दिया जा सकता है। यूनिक्स परिवेश के अंतर्गत सी-डैक ने 'जिस्ट टर्मिनल' और आर.के. कंप्यूटर्स ने 'सूयूनिक्स' का विकास किया है। सी-डैक ने यूनिक्स परिवेश के अंतर्गत शब्द संसाधन के लिए एएलपी का यूनिक्स वर्शन (version) भी विकसित किया है, जिसमें स्पैल-चैकर आदि की अधुनातन सुविधाएँ भी मौजूद हैं। किंतु आज आम आदमी के लिए सर्वाधिक मैत्रीपूर्ण प्लेटफॉर्म है 'विंडोज़'। इस प्लेटफार्म पर भारतीय भाषाओं में विभिन्न प्रकार के 'इंटरफेस' विकसित किए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं : सी-डैक द्वारा विकसित 'लीप ऑफ़िस' और 'इज़्म ऑफ़िस', आर.के.कंप्यूटर्स द्वारा विकसित 'सुविंडोज़', एसीईएस कंसल्टैंट्स द्वारा विकसित 'आकृति ऑफ़िस' और 'सॉफ्टैक' कंपनी द्वारा विकसित 'अक्षर फॉर विंडोज़' आदि। मैक प्लेटफॉर्म के लिए सी-डैक ने 'मैक इज़्म' का विकास किया है, जिसके माध्यम से 'पेजमेकर'और 'क्वार्क एक्सप्रेस' आदि में भी हिंदी में कार्य किया जा सकता है। इनमें एम.एस.ऑफ़िस के अंतर्गत समाविष्ट सभी सॉफ्टवेयरों में विभिन्न भारतीय लिपियों में काम करने की सुविधा मौजूद हैं। वस्तुत: विंडोज़ और एम.एस. ऑफ़िस की लोकप्रियता के कारण आज सभी कंपनियाँ भारत की विभिन्न लिपियों में फांट (font) एम.एस.ऑफ़िस (MS Office) के साथ ही देने लगी हैं, किन्तु 'स्पैल चैकर' और 'ऑन-लाइन' शब्दकोश की सुविधा कुछेक सॉफ्टवेयरों में ही उपलब्ध हैं।

विंडोज़ 2000 के रिलीज़ के बाद यह महसूस किया जाने लगा था कि भारतीय भाषाओं को यदि परिचालन प्रणाली में अंतर्निहित नहीं किया गया तो उनमें अनेक कमियाँ रह जाएँगी। उदाहरण के लिए कोश निर्माण के लिए भारतीय भाषाओं की वर्णमाला के अनुरूप 'सॉर्टिंग' की सुविधा अत्यंत आवश्यक है और यह सुविधा आज मूल प्रणाली में हिंदी को अंतर्निहित करने के कारण अनायास ही सुलभ हो गई है। इसलिए यह कदम भारतीय भाषाओं में कंप्यूटिंग के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। विंड़ोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम के बाद अब 'लोटस', 'लाइनेक्स' और 'ऑरेकल' कंपनियों ने भी घोषणा कर दी है कि वे भी यथाशीघ्र अपनी परिचालन प्रणालियों में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को समाहित कर लेंगी

3. हिंदी में डीटीपी अर्थात डैस्क प्रकाशन

यह तो स्पष्ट ही है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में प्रकाशन कार्य में गुणात्मक सुधार लाने में 'इस्फॉक' (ISFOC) मानक फौंट की विशेष भूमिका है। इस कार्य के लिए भी सरकारी और ग़ैर-सरकारी दोनों ही स्तरों पर कई सॉफ्टवेयर विकसित किए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं : समिट द्वारा विकसित 'इंडिका', एसआरजी द्वारा विकसित 'प्रकाशक' और सी-डैक द्वारा विकसित 'इज़्म पब्लिशर' या 'इज़्म सॉफ्ट' आदि। वस्तुत: हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में प्रकाशन कार्य में क्रांति तब आएगी, तब लेखक स्वयं अपने कंप्यूटर पर अपनी पांडुलिपि को टंकित करेगा। उपयोक्ता की सुविधा के लिए सभी प्रमुख सॉफ्टवेयरों में हिंदी में तीन प्रकार के कुंजीपटलों की व्यवस्था है। लीप ऑफ़िस में ''Tool'' के अंतर्गत 'Option' से आप तीनों में किसी एक कुंजीपटल का चुनाव कर सकते हैं। यांत्रिक टाइपराइटर पर काम करने के अभ्यस्त टाइपिस्ट 'Typist' विकल्प का चुनाव कर सकते हैं ओर 'क्वेर्टी(querty)' कुंजीपटल पर रोमन लिपि में काम करने के अभ्यस्त प्रयोक्ता 'Phonetic English' का चुनाव कर सकते हैं, किंतु मूलत: कंप्यूटर पर ही टंकण सीखने वाले लेखकों और अन्य प्रयोक्ताओं के लिए 'इन्स्क्रिप्ट' (Inscript) कुंजीपटल का विकास किया गया है। इस कुंजीपटल में वर्णमाला का स्वाभाविक क्रम होने के कारण इसे सीखना बहुत सरल है। सी-डैक ने व्यक्तिगत स्तर पर लेखकों के लिए कुंजीपटल को सरल बनाने के लिए 'आई-लीप' (iLeap) नामक अत्यंत मैत्रीपूर्ण और कलात्मक इंटरफेस का विकास किया है। इसके माध्यम से लेखक न केवल अपनी पांडुलिपि स्वयं टंकित कर सकते हैं, बल्कि 'बहुभाषी स्पैल चैकर' की सहायता से उसमें प्रूफ संशोधन भी कर सकते हैं। प्रूफ संशोधन के बाद 'पेज-लेआउट' तैयार करके व्यक्तिगत स्तर पर प्रकाशन कार्य भी कर सकते हैं। 'वेब प्रकाशन' की अतिरिक्त सुविधा के कारण इसके ज़रिए लेखक या उपयोक्ता इंटरनेट पर अपना 'होमपेज' या 'वेबपेज' बना सकते हैं। इस सॉफ्टवेयर में सभी भारतीय भाषाओं में उक्त सभी सुविधाएँ मौजूद हैं। हाल ही में सी-डैक ने भारतीय कला-चित्रों (Cliparts) के संकलन 'शैली' और 'प्रतिबिंब' नाम से रिलीज़ किए हैं। इसमें रंगोली के चित्रों से लेकर अनेक भारतीय भाषाओं के प्रतीक 'क्लिपार्ट' के रूप में दिए गए हैं। इन्हें 'कोरल ड्रॉ', '3-डी स्टुडिओ' और वेब प्रकाशन के सॉफ्टवेयर के साथ भारतीय भाषाओं का संयोजन करते हुए इस्तेमाल किया जा सकता है।

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