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पर्व पंचांग  १७. ३. २००८

इस सप्ताह होली विशेषांक में-
समकालीन कहानी के अंतर्गत भारत से
राजीव तनेजा की कहानी आसमान से गिरा
"अजी सुनते हो? या आप भी बहरे हो चुके हो इन नालायकों की तरह? सँभालो अपने लाडलों को, हर वक़्त मेरी जान पे बने रहते हैं। तंग आ चुकी हूँ मैं...काबू में ही नहीं आते। हर वक़्त बस उछल कूद और...बस उछल कूद और कुछ नहीं। ये नहीं कि टिक के बैठ जाएँ घड़ी दो घड़ी आराम से... ना पढ़ाई की चिंता ना ही किसी और चीज़ का फिक्र...हर वक़्त सिर्फ़ और सिर्फ़ शरारत...बस और कुछ नहीं। ऊपर से ये मुआ होली का त्योहार क्या आने वाला है, मेरी तो जान ही आफ़त में फँसा डाली है इन कमबख़्तों ने। दूसरे हैं ये मोहल्ले वाले हरदम सिर पर सवार बच्चे तो बच्चे, बाप रे बाप, जिसे देखो रंग से सराबोर है... कपड़े कौन धोएगा? तुम्हारा बाप?

*
अविनाश वाचस्पति द्वारा होली में
शेयरों की लगी वाट और क्रिकेटरों के हो गए ठाठ

*

नर्मदा प्रसाद उपाध्याय का ललित निबंध
माधव और माधव

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प्रो. अश्विनी केशरवानी से जानें
लोकगीतों में देवी-देवताओं की होली
और यूनुस ख़ान से फ़िल्मी गानों में होली

*

अरुणा घवाना ठाकुर के साथ
प्राकृतिक रंगों की खोज घर - बाहर

सप्ताह का विचार
रंग इसलिए हैं कि जीवन की एकरसता दूर हो सके और इसलिए भी कि हम सादगी का मूल्य पहचान सकें। -- मुक्ता

 

होली विशेषांक समग्र

कहानियाँ-
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अलग अलग तीलियाँ- प्रभु जोशी

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एक बार फिर होली- तेजेंद्र शर्मा

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राजा हरदौल- प्रेमचंद

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हो ली- स्वदेश राणा

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होली का मज़ाक-यशपाल

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होली मंगलमय हो- ओमप्रकाश अवस्थी

हास्य व्यंग्य-
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कट्टरता- डा नरेंद्र कोहली

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काव्य कामना कामदेव की- अशोक चक्रधर

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चुटकी गुलाल की- शैल अग्रवाल

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निरख सखी फिर- तोताराम चमोली

लेख-

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अल्पना क्या है

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देश विदेश की होली

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ब्रज में हरि होली मचाई

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मन बहलाव वसंत के

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मादक छंद वसंत के

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रंग बोलते हैं

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रंगों से बदलें दुनिया

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लला फिर आईयो खेलन होली

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लेकिन मुझको फागुन चाहिए

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वसंतोत्सव

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सुनिए रंगों के संदेश

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होली और गीत संगीत

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होली खेलें रघुवीरा

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होली-पुराने दौर के समाचार-पत्रों मे

फुलवारी में बच्चों के लिए-

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कहानी- होली वाला रोबोट

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कविताएँ- होली आई और होली का हंगामा

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रंगने के लिए होली का सुंदर चित्र

bullet बना कर देखें होलिका और प्रह्लाद काग़ज़ से

शुभकामनाओं के लिए सचित्र कविताएँ-

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होली है

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होली के मौसम में

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रंगों की बौछार

 

अनुभूति में-
होली के रंगारंग अवसर पर राग-रंग में डूबी, अनेक विधाओं में ढेर सी होली रचनाएँ

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कलम गही नहिं हाथ
होली वही जो हो ली। यानी जो भी बुरा हुआ उसे भूलकर नवजीवन प्रारंभ करने का अवसर देती हुई होली नव-वर्ष में नए अवसरों के द्वार खोलती है।

होलिका होली की अग्नि है। होलिका में स्थित ''हो'' संभावना और परिवर्तन को प्रकट करता है। संभावना वह, जो हो सके और परिवर्तन वह, जो तप कर प्राप्त होता है। अग्नि का सूचक होने के कारण ''हो'', होम में भी है। होम सहयोगी होता है तप में ताकि आकार ले सकें संभावनाएँ- पर्यावरण को पवित्र करने की, मनोकामनाओं को पूर्ण करने की। असीमित संभावनाएँ जो हमारा जीवन बदल दें। होलिका भी एक होम है। पूरे साल हम जो श्रम करते हैं उसकी थकान को होलिका में तपा कर नव वर्ष में हर प्रकार की खुशहाली लाने वाली संभावनाओं के लिए किया जाने वाला होम।

होलिका का एक अर्थ जलाने की लकड़ी भी है। कोई भी चीज़ जलती है तो दुख देती है लेकिन जलाने वाली लकड़ी सुख देती है। इस सुख का ही दूसरा नाम प्रह्लाद है। दूसरे शब्दों में होलिका जलती है तो प्रह्लाद बना रहता है। सर्दियों के अंत की भीगी सुबह जब होलिका जलती होगी तो नाच गाने और खाने पीने के साथ कैसे आह्लाद की सृष्टि होती होगी इसकी कल्पना करना मुश्किल नहीं। इस होली पर हर प्रकार के दुख-दर्द की होलिका जल जाए तथा प्रेम व उल्लास का प्रह्लाद (आनंद) सबके मन में बना रहे, इसी मंगल कामना के साथ,

-पूर्णिमा वर्मन (टीम अभिव्यक्ति)
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क्या आप जानते हैं?
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होली केवल एक पर्व ही नहीं संगीत की एक विधा भी है। लोक संगीत के साथ साथ होली को शास्त्रीय या उप-शास्त्रीय संगीत में ध्रुपद, धमार, ठुमरी या चैती के रूप में भी गाया जाता है।
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यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित होती है।

प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
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