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समस्या
चित्रा के साथ थी। वह कॉलेज में 'ब्यूटी क्वीन' के नाम से
मशहूर थी, लेकिन सौन्दर्य और अहंकार शायद साथ-साथ पलते हैं।
कम-से-कम नीरज ने ऐसी अभिमानी लड़की पहले नहीं देखी थी। वही
चित्रा उसकी ओर झुकी, कितने योग्य धनी सहपाठियों के होते उसके
प्रति समर्पिता हो गई, उसमें उसे अपने पुरुषत्व के अहं की
तृप्ति महसूस हुई थी। चित्रा के वकील पिता अपनी जिद्दी बेटी को
खूब पहचानते थे, उन्होंने उसकी पसंद मान ली। वैसे भी नीरज में
कोई कभी कमी नहीं थी। सजातीय तो था ही, सुदर्शन, स्वस्थ,
शिक्षित और अच्छे परिवार का, साथ ही बड़ा शरीफ। स्वभाव का बड़ा
शांत। वकील साहब ने सोचा कि ऐसे ठंडे दिमाग का लड़का ही उनकी
गर्म मिजाज़ बेटी को सँभाल सकेगा। तय हुआ, एम. ए. कर लेने के
बाद वह बनारस जा कर पिता की अनुमति ले लेगा, फिर विवाह।
नीरज को प्यार के वे दिन भी
अच्छी तरह याद है। चित्रा से प्रेम करना तो कुछ ऐसा ही था,
जैसे कोई किसी शेरनी से प्यार करे। वह मूडी थी, जिद्दी भी। कब
भड़क पड़ेगी, कुछ ठीक नहीं रहता था। उसकी बात कोई काट दे, यह
उसे रंच मात्र सहन नहीं होता था। नीरज को प्राय: लगता, जैसे वह
शेर पर सवार है। उतर नहीं सकता, शेर खा जाएगा, और वहाँ बैठे
रहना भी बहुत दुष्कर था। उसे बहुत समय चित्रा का मूड सँभालने
में लग जाता था। अकसर सोचता, 'पत्नी के रूप में यह कैसी साबित
होगी।' लेकिन मन में भरोसा था, विवाह के बाद बदलेगी ज़रूर।
स्त्रियाँ शादी के बाद बहुत बदल जाती है। वैसे भी उसे अपने
प्रेम पर भरोसा था।
खुद चित्रा ने कहा था, "नीरज,
मुझे चाहते हो, तो मेरी ज़िद व सनक को भी सहना होगा तुम्हें।
मेरी बात कोई काट दे, अपनी राय थोपे, मैं नहीं सह सकती।"
नीरज खुद वह जानता था, किन्तु चित्रा उसके मन-प्राणों में बसी
थी। उसने बेतरह प्रेम दर्शाते हुए कहा था, "चित्रा, तुम जैसी
हो, जो कुछ भी हो, मुझे मंजूर है। अब इस मामले में कुछ न कहो।"
फिर वह हँस कर बोला था, "मेरे जैसा आज्ञाकारी नहीं मिलेगा
तुम्हें।" और चित्रा खुश हो गई थी।
अकसर उसका विचित्र स्वभाव,
सनक की हद तक जा पहुँचता था। फलाँ पिक्चर नीरज देखना चाहता है,
किन्तु चित्रा वह नहीं देखेगी। नीरज को नीला रंग पसंद है,
किन्तु चित्रा की रूचि के अनुसार ग्रे और भूरे रंग के कपड़े ही
पहनेगा। फलाँ वक्त चाय का है, फलाँ नाश्ते का यह तो तब था, जब
उनका विवाह भी न हुआ था, किंतु चित्रा अपने घर ही में
बैठे-बैठे उसके रहन-सहन पर नियंत्रण रखती। नीरज का अपना
व्यक्तित्व जैसे कुछ न हो। किंतु वह प्रसन्न था, चित्रा को वह
प्यार करता था, उसकी ये ज्यादतियाँ भी प्यारी लगती थीं।
चित्रा ने सपरिवार एक दिन पिकनिक का प्रोग्राम बनाया, उन लोगों
के साथ नीरज भी आमंत्रित था। वे चले शहर के बाहर, संजय गाँधी
उद्यान में, जहां अच्छे जू के साथ अन्य जीवों का सुरक्षित
पार्क है।
पार्क में नाश्ता-पानी कर वे जानवरों को देखने चले। चित्रा
बहुत प्रसन्न थी उत्सुकता से बाघ, शेर, गैंडों आदि को उनकी
गहरी खाइयों में बैठे धूप सेंकते देखा, सर्प-कक्ष में विभिन्न
जातियों के साँपों को देखा, लंबे-चौड़े बाड़ों में हिरन, बंदर
आदि देखे, विभिन्न पक्षियों को देखा। बंदरों के कठघरे के आगे
बच्चों की भीड़ लगी थी। बंदरों की विभिन्न हरकतों से सब हँसते
हुए बेहाल थे। परिवार के बच्चों के साथ चित्रा उनकी हरकतें
देख-देखकर खिलखिला कर हँसती रही। नीरज बहुत खुश था। उसे लगा,
चित्रा भी सामान्य लड़की ही है। वातावरण की एकरसता ने उसे उबा
रखा होगा।
बच्चों के साथ चित्रा ने बंदरों को टॉफियाँ, मूंगफली आदि देने
का प्रयास किया, किंतु उधर तैनात रक्षकों ने मनाही कर दी।
उन्होंने बताया, कि जानवरों को कुछ बाहरी चीजें खिलाने की
अनुमति नहीं है। बच्चे तो मान गए, किंतु चित्रा को अपना अपमान
महसूस हुआ। वह अड़ गई। नतीजा हुआ कि रक्षकों ने परिवार वालों
की मदद से उसे वहाँ से हटा दिया।
चित्रा का मूड ऐसा खराब हुआ, कि वह सीधी बाहर आकर कार में बैठ
गई। नीरज को यह बुरा लगा, लेकिन चित्रा के स्वभाव को समझते हुए
कर्तव्यवश वह उसके पीछे आया। उसे समझाने की कोशिश की, किंतु
चित्रा यही रट लगाए थी, कि उसका बड़ा अपमान हुआ है।
लेकिन ,"नीरज ने समझाया था, "बात पर गौर तो करो। चिड़ियाघरों
का यह सख्त नियम है कि बाहरी दर्शक जानवरों को कुछ खिलाएँ
नहीं। इसमें उनका पेट बिगड़ सकता है। वे बीमार पड़ जाते हैं।"
"मेरा ऐसा अपमान कभी नहीं हुआ," चित्रा ने मुँह फेरते हुए कहा।
नीरज हँसा, "चित्रा रानी, अपमान की तो कोई बात नहीं है इसमें।
तुमने बाहर लगा बोर्ड नहीं देखा, जिसमें लिखा है, कि जानवरों
को कुछ न खिलाएँ। रक्षकों ने तो बस अपने कर्तव्य का पालन किया
है। तुम्हें उनकी प्रशंसा करनी चाहिए।"
"जी, माफ कीजिए," वह व्यंगात्मक स्वर में बोली थी, "ऐसा विशाल
और उदार हृदय आपको ही मुबारक हो।"
"असल में, डियर चित्रा, तुम्हें अपनी बात की टेक रखने की आदत
है। लेकिन सोचो, ऐसा कैसे चल सकता है। हम समाज में रह कर अपनी
कैसे चला सकते हैं। सिनेमा, बस आदि के लिए 'क्यू' में टिकट
लेना होता है। रेस्तराँ, होटल आदि में भोज के अपने ही नियम
होते हैं। सड़क पर चलने के लिए भी अपने तरीके होते हैं। यह कोई
अपना घर नहीं, जो "
"बस, चुप रहो," चित्रा गुर्रा उठी, "तुम मुझे नादान बच्ची समझ
कर नागरिक शास्त्र पढ़ा रहे हो। वह बदमाश मेरा अपमान कर गया,
और तुम देखते रहे। वह न हुआ, कि उसे दो झापड़ लगा देते। तुम
कायर डरपोक हो। मेरे पास मत आओ "
नीरज उस दिन हैरान था। इसे नासमझी कहे, या हद् से बड़ा अहंकार
और सनकीपन। वह उसे फिर धैर्य से समझाने लगा था, "चित्रा, तुम
बात नहीं समझ रही हो। यह कोई बहादुरी दिखाने का मौका नहीं था।
सड़क पर यदि कोई तुम्हें घूर कर देख ले, तो उसकी आँख निकाल
लूँ लेकिन यह तो "
"चुप रहो," चित्रा चिल्ला उठी थी, "कान मत खाओ। तुम जाओ यहाँ
से, तंग मत करो "
नीरज हताश हो गया था। चित्रा की तेज आवाज सुनकर आस-पास के लोग
उनकी तरफ देखने लगे थे। वह वहाँ से हट कर टी-स्टॉल की तरफ चल
दिया। चित्रा गाड़ी में ही मुँह फुलाए बैठी रही थी।
वापसी में चित्रा नीरज के साथ नहीं बैठी, भाई-बहनों के साथ
पीछे की सीट पर बैठ गई थी। उसकी समझ में नीरज कापुरुष था। उस
बार कितने दिनों बाद उसका मूड ठीक हुआ था, यह नीरज भूला नहीं
था।
ऐसी घटनाएँ होती रही थीं। उन दिनों वह मन को समझाता भी रहता
था, कि अभी नासमझ है, तजुर्बा बढ़ेगा, विवाह के बाद
जिम्मेदारियों आएंगी तो खुद समझने लगेगी।
एम.ए. की परीक्षा देकर नीरज बनारस गया, और अपने घर वालों को
चित्रा के बारे में बताया। उसके पिता चाहते थे, कि वह कारोबार
में हाथ बटाएँ। बनारसी साड़ियों के विदेशों में निर्यात की
अच्छी संभावनाएँ होने से वह नीरज को यह जिम्मा देना चाहते थे,
नीरज भी रूचि ले रहा था। पिता ने राय दी, अपना कार्यालय वह अलग
खोल कर व्यापार शुरू कर दे, इसके लिए उन्होंने उसे पूंजी भी
देने की बात कही। रही चित्रा की बात, सो घर वाले यही चाहते थे
कि नीरज किसी अच्छे घर की मन-पसंद लड़की से विवाह कर ले। उन
लोगों ने किसी खास लड़की को अपनी तरफ से तय नहीं किया था।
चित्रा का घर-परिवार अच्छा था, लड़की नीरज को पसंद थी ही,
माता-पिता ने कोई आपत्ति नहीं की।
अगले वर्ष विवाह हो गया। नीरज ने व्यापार भी प्रारंभ कर दिया
था। प्रथम मिलन के लिए नीरज के मन में तरह-तरह की उत्सुकताओं
के साथ घबराहट भी उभर रही थी। ऐसे अवसरों में तो पुरूष
उत्साहित रहता है और स्त्री संकुचित, घबराई रहती है। किंतु
यहाँ मामला चित्रा का जो था।
दो दिन, दो रातें रिश्तेदारों की भीड़, आगंतुकों की बधाई, दावत
आदि में निबट गये। इसके बाद नवदम्पत्ति को फुरसत मिली। नीरज की
दोनों बहनों और मौसेरी चचेरी बहनों ने उसका शयन-कक्ष फूलों से
सजा रखा था। चित्रा वहीं सजी-धजी बैठी थी। दोनों का भोजन और
दूध भी वहीं था। कुछ घबराहट के साथ नीरज ने अपने कमरे में कदम
रखा।
बहनों ने चित्रा को नववधू के रूप में खुद सजाया था। स्वभाव के
विपरीत चित्रा ने चुपचाप सभी रस्में कीं, और जो कहा गया, मानती
रही। नीरज ने वह सब देखा, तो उसे लगा कि चित्रा अपना ज़िद्दी
स्वभाव भूल रही है, अब उसके साथ वह सामंजस्य बैठा लेगा।
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चित्रा मुसकराई। वह मधुर स्वर में बोली,"तुम मेरे हो, यही काफी
है।"
"नीरज हँसा, "सो तो है ही, फिर भी कुछ "
चित्रा उसकी आँखों में देखती हुई बोली,"तो वादा करो, हमेशा
मेरी बात मानोगे।"
"यह कैसी बात है।" नीरज असमंजस में बोला,"बात तो मैं तुम्हारी
रखता हूँ ही, इसमें भला वादे की क्या जरूरत।"
चित्रा ने उसका हाथ दबाया, 'लेकिन मेरी खुशी के लिए सही "
नीरज को लगा, जैसे फंदे में फंस रहा हो। पति अपनी प्रियतमा
पत्नी को प्यार करता है, उसकी बातें भी रखता है, यह सहज और
स्वाभाविक है। लेकिन यह तो जैसे वकील की तरह बांड भरवा लेना
चाहती है। नीरज प्रतिज्ञा कर ले, तो क्या सारी गलत-सही बातें
मानते रहना पड़ेगा।
"क्या व्यर्थ की जिद करती हो !" उसने समझाया, "चित्रा, बातें
तो सभी मानता हूँ तुम्हारी। किंतु मेरी समझ में यदि गलत करती
हो, तो समझाता भी हूँ।"
"मेरी खुशी के लिए सही," चित्रा की मुसकराहट तो बरकरार थी,
किंतु नेत्रों में जिद की कड़ाई आने लगी थी। बात बढ़ने देने से
रोकने के लिए नीरज ने कह दिया, "ठीक है, तो मैंने वादा किया।"
"क्या वादा?" चित्रा ने जिद की, "अपने मुँह से साफ-साफ तो
कहो।"
नीरज हँसा, "वकील बाप की बेटी ठहरी। खैर, मैं वादा करता हूँ,
कि तुम्हारी बातें मानूंगा। अब तो खुश हो।"
चित्रा का उभरता तनाव गायब हो गया। उसने नीरज के होंठ चूम लिए।
"अब मैं खुश हूँ।" वह बोली।
भोजन की प्लेटों के साथ केसरिया दूध के दो गिलास ढके थे। दूध
में मेवों के टुकड़े तैर रहे थे। नीरज ने एक गिलास चित्रा को
दिया, एक खुद लेकर चुस्की लेने लगा।
'लगता है, आज की रात बातों में कटेगी। जी भर कर आज बातें करना
चाहता हूँ तुमसे।"
चित्रा हँसी, "आज की ही रात क्या, जिन्दगी भर बातें बनाते रहो,
मैं बातों से ऊबती कभी नहीं।"
नीरज ने गले में पड़ी मालाएँ उतारकर सिरहाने रख दीं। चित्रा
बोली , "वह उधर की खिड़की तो खोलो, घुटन-सी लग रही है।"
"उधर गली पड़ती है," नीरज ने कहा, "कोई आता-जाता झाँक-देख सकता
है।"
"कोई परवाह नहीं, तुम खोल दो।"
उसके स्वर में कड़ापन महसूस कर नीरज ने समझाया, "देखो, जरा-सी
बात "
"वह कुछ नहीं," चित्रा ने आदेश-सा दिया, "तुम खिड़की खोल दो "
नीरज ने गौरसे देखा। उसे उसमें पुरानी चित्रा की झलक दिखी। उसे
अखरा। वह बोला, 'क्या बेकार की बात को लेकर "
"नीरज, तुमने मेरी बातें मानने की प्रतिज्ञा की है।" चित्रा ने
फटकार-सी लगाई।
नीरज के अहं को चोट लगी। अब वह पति था। पत्नी को उसका भी मन
रखना चाहिए। वह कुछ रूखी आवाज में बोला, "बात मानने का यह अर्थ
तो नहीं कि मैं तुम्हारी हर उचित-अनुचित बात मान लूँगा।"
"हाँ, तुम्हें मानना होगा।" चित्रा ने तैश में आकर कहा।
"मैं नहीं मानता।"
"तुम नहीं मानोगे?" वह कठोरता से बोली।
"तुम्हारी बात पत्नियों जैसी नहीं है। मैं प्रेम सहित किए उचित
आग्रह को तो मान लूँगा, किंतु किसी दबाव में नहीं आ सकता।"
नीरज ने दृढ़ता से कहा।
"तो यह बात है," चित्रा की आँखों से चिनगारी-सी छूटी,"तुमने
अपना रंग दिखा ही दिया।"
"यही उचित तथा सही रंग है।" नीरज ने तुर्की-ब-तुर्की उत्तर
दिया।
"नीरज, याद रखो, अभी खिड़की नहीं खोलते, तो मुझसे कोई नाता अब
नहीं रहेगा। फिर मैं कहती हूँ, खोल दो।"
"नहीं।"
"तुम नहीं खोलोगे?"
"नहीं, नहीं, नहीं !" नीरज झल्लाया, "कितनी बार कहूँ, मैं नहीं
खोलूँगा।"
चित्रा ने उसकी ओर से पीठ फेर ली। वह दीवार की तरफ मुँह फेर कर
लेट गयी। नीरज कुछ देर बेवकूफों की तरह बैठा रहा, फिर बत्ती
गुल कर सोफे के ऊपर जा लेटा।
सवेरे जगा, तो चित्रा बाथरूम में थी। वह बाहर चला आया। दूसरी
रात्रि में भी वही हाल रहा। चित्रा पलंग पर, नीरज सोफे के ऊपर।
घरवालों को भनक न लगी कि कुछ गड़बड़ी है। अगले दिन चित्रा का
भाई आया, तो वह माँ के घर चली गई। इस बीच दोनों में कोई बातचीत
नहीं हुई। चित्रा का दो दिन के बाद घर जाना निश्चित था ही,
किसी को कुछ असामान्य न लगा।
महीने भर बाद नीरज के पिता ने उससे कहा,"पटना से वकील साहब का
पत्र आया है। आज के चौथे दिन विदाई को सायत बनती है, तुम जा कर
बहू को ले आओ।"
नीरज ने सोचा कि अब चित्रा का मूड ठीक हो गया होगा। उसने कई
तरह के उपहार, मिठाई आदि के साथ ही एक जोड़ी कीमती बनारसी
साड़ियों को पैक करा कर ससुराल की राह ली।
पहली बार ससुराल में आनेपर दामाद की बड़ी खातिर हुई। अब वह उस
घर में दामाद था। घर में आने पर नीरज ने इधर-उधर देखा, पर उसे
कहीं चित्रा की एक झलक भी देखने को नहीं मिली। रात में जब वह
सोने के लिए कमरे में पहुँचा, तो वह पलंग पर बैठी थी, कठोर
चेहरा बनाए।
नीरज ने हँसी में कहा, "देवी जी का गुस्सा तो बरकरार लगता है।
भौंहों पर ये धनुषबाण तने हैं।"
चित्रा ने संकेत दिया, "पहले वह खिड़की खोल दो, बाकी बातें
उसके बाद।"
नीरज का माथा ठनका। यहाँ भी एक खिड़की, और वह भी बंद पड़ी है।
चित्रा बोली,"तुम्हारे घर वाली उस खिड़की की यादगार में मैंने
यहाँ आकर इसे लगातार बंद रखा है। तुम खोलोगे, तभी यह खुलेगी,
और हम लोगों के बीच की वह उलझन वाली गाँठ भी खुलेगी।"
नीरज को बुरा लगा। वह बोला,"तुम्हारे जैसी ग़ज़ब की जिद्दी
तो..."
"जो हो," चित्रा ने बात काट दी, "तुम खिड़की खोलो, वरना जाओ
यहाँ से..."
नीरज को भी क्रोध आ गया। उठ खड़ा हुआ, "मैं नहीं खोलता।"
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