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चित्रा मुँह फेर कर लेट गई। नीरज ने देखा, वहाँ सोफासेट की जगह आराम कुर्सी थी। रात भर आराम कुर्सी पर पड़ा वह सिगरेटें फूकता रहा। सवेरा होते ही नश्ता-पानी कर अपना सूटकेस लिए निकला, और सीधा स्टेशन चला आया। साड़ी सूटकेस में पैक पड़ी रही।
वह २१ फरवरी का ही दिन था, आज फिर नीरज २१ फरवरी को यहाँ उसी वेटिंगरूम में हैं। लेकिन इस बार वह चित्रा के लिए नहीं आया था।
तो, पाँच साल पहले वह उस २१ फरवरी को यहाँ से बनारस लौट गया। चित्रा की ज़िद की बात घर में साफ कह दी। वह बात चित्रा के घरवालों को भी मालूम हो गई थी। उन्होंने उसकी निरर्थक ज़िद को दूर करने की बहुत चेष्टा की, किंतु वह तिल भर न डिगी। घर वाले निराश हो कर बैठ गए। चित्रा ने वहीं के एक कॉलेज में पढ़ाना शुरू कर दिया। इधर बनारस में नीरज ने उसकी ओर से ध्यान हटा कर अपने व्यापार में मन लगाया।

नीरज के पिता ने वकील साहब को पत्र लिखा, कि जब बहू का यह रूख है, तो वे नीरज की दूसरी शादी की बात सोच रहे हैं। उधर से उत्तर आया कि उन लोगों ने फिर बहुत समझाया चित्रा को, किंतु वह बनारस नहीं जाना चाहती, विवाह-विच्छेद के लिए तैयार है, परस्पर सहमति से विवाह विच्छेद कर, नीरज की दूसरी शादी कर सकते हैं।

किंतु दूसरी शादी के लिए खुद नीरज तैयार नहीं हुआ। घर वाले मौन हो गए। विवाहित नीरज का जीवन विचित्र एकाकीपन में व्यतीत होने लगा।
पाँच साल गुज़र गए, नीरज को व्यापारिक व्यस्तताओं में समय का कुछ पता न लगा। उसने जान-बूझ कर खुद को व्यस्त बना लिया था। कारोबार बहुत अच्छा चलने लगा था। इस बीच छोटे भाई का विवाह हो गया, बहू घर आ गई। घर वालों ने मान लिया, नीरज ऐसे ही रहेगा।

अकसर पटना से वकील साहब के पत्र आते, वह अपनी जिद्दी लड़की के अहंकार के प्रति खेद प्रकट करते लिखते, कि इस विवाह का कोई अर्थ नहीं रहा। वह खुद कानूनी कार्रवाइयों के लिए राजी हैं, नीरज दूसरा विवाह कर ले। चित्रा ने घर में घोषित कर रखा था कि वह अब जीवन में यों ही अकेली रहेगी। पत्रोत्तर में नीरज लिख देता कि वह विवाहित है, और दूसरा विवाह उसे नहीं करना।

माँ तो चित्रा की पहले ही चल बसी थीं। तीन साल के बाद वकील साहब का भी निधन हो गया। चित्रा अब बड़े भाई-भाभी के साथ रहती, कॉलेज में नौकरी कर रही थी।
नीरज को प्रति वर्ष २१ फरवरी को चित्रा की याद खास तौर से हो आती। उसी दिन उनका प्रथम परिचय कॉलेज में हुआ था, साल भर बाद, उसी दिन वह पाँच साल पहले इसी पटना स्टेशन के वेटिंगरूम में थोड़ी देर ठहर कर बनारस लौटा था, उपहार की साड़ी उसी प्रकार पैक किए, फिर न आने के लिए। और, आज फिर पाँच साल बाद वाली २१ फरवरी है, नीरज यहाँ पटना रेल्वे स्टेशन के वेटिंग रूम में है।

असल में संयोग कुछ ऐसा रहा, कि इस बार एक व्यापारिक सम्मेलन में पटना आना पड़ा था। पिछले पाँच साल से वह पटना नहीं आया था। उत्तर पूर्वी क्षेत्रों के रेशमी वस्त्रों के विक्रेता, वितरकों आदि का वह सम्मेलन पटना में २० फरवरी को शुरू हुआ। बनारस से वह १९ की रात को पटना चला था, चलते वक्त न जाने क्या सोच कर उसने उसी प्रकार पैक पड़ी वे साड़ियाँ भी सूटकेस में पड़ी रहने दीं, हालाँकि चित्रा से मिलने का उसका कोई इरादा नहीं था।

२१ का दिन दिनभर पटना के मौर्य होटल में प्रतिनिधियों के आपसी परिचय, निजी बैठकों तथा व्यापारिक करारों में बीता। संध्या को प्रतिनिधियों ने मनोरंजन के अपने-अपने भिन्न कार्यक्रम बनाए। कल सवेरे रवानगी थी।
नीरज संध्या के चाय-जलपान के बाद जरा घूमने-फिरने का प्रोग्राम बना कर कपड़े बदलने लगा, कि सूटकेस में पैक पड़ी लाल रंग की साड़ियाँ ध्यान खींचने लगी।

अभिमंत्रित-सा वह पैक साड़ियाँ निकाल कर देखने लगा। इनके साथ पटना की, अपनी ससुराल की और चित्रा की यादें जुड़ी हुई थीं। उसे न जाने क्या प्रेरणा हुई, कि साड़ियों का पैकेट निकाल कर बैग में रखा, कमरे का ताला बंद कर चाबी नीचे काउंटर पर दे, बाहर चला आया।
एक रिक्शे से वह स्टेशन गया। बनारस के लिए ट्रेन के टाइम वगैरह की जानकारी ली, थोड़ी देर के लिए उसी वेटिंग रूम में बैठा, जहाँ पाँच साल हुए, यहाँ से निराश लौटते समय भी बैठा था।

अभी चित्रा के यहाँ जाकर पिछले पाँच साल का हिसाब साफ कर देगा, और फिर बनारस लौट कर नए सिरे से वहीं एकाकी जीवन व्यतीत करेगा फिर हमेशा के लिए वह आज़ाद। बोरिंग रोड पहुँचते बहुत देर न लगी। वह असमंजस में पड़ा था। मन में कभी होता, इधर क्यों आया है। मन कहता था,"यहाँ उसकी ससुराल है।" मस्तिष्क कहता था,"रिश्ते टूट चुके हैं।" हृदय की कामना अधिक बलवती थी, जो ज़ोर दे रही थी, कि चित्रा को ज़रा एक बार देखे तो सही।

ससुराल वालों को पाँच साल बाद आए दामाद को पहचानने में कुछ देर लगी। घर में भाभी और बच्चे थे, भाई साहब कहीं बाहर थे। भाभी ने बड़ी खातिर से नीरज को बैठाया, जलपान कराया, कुशल-मंगल पूछी, सम्मेलन की बात जानी, और खेद सहित कहा,"आप को हम क्या कहें। जब अपना ही सोना खोटा, तो..."
नीरज हँसा, "अजी भाभी जी, चित्रा को इन्हीं तमाशों में मज़ा आता है, चलने दीजिए।"
"वक्त और उम्र भी तो कोई चीज़ है, ज़िंदगी का कोई अपना सुख भी तो होता है।" भाभी ने सखेद कहा,"लेकिन आप तो चित्रा बीबी की बचकानी ज़िद के चलते अकेलेपन की यह तकलीफ़ भोग रहे हैं। क्या कहें, वह तो खुद भी अकेली है। अपने को कॉलेज के कामों में उलझा रखा है।
"जैसे मैंने खुद को व्यापार में..."
"वह किसी सहेली के यहाँ जन्मोत्सव में गई हैं, आ रही होंगी," भाभी ने कहा,"आप उनके कमरे में चलकर आराम कीजिए।"
"यहीं रहूँ तो क्या हर्ज़ है!" नीरज ने असमंजस में कहा, लेकिन भाभी मानी नहीं। वह उसे चित्रा के कमरे में ले आई। उसे सोफे पर बैठाते हुए कहा,"देखिए जरा उस खिड़की को। पाँच साल हो गए, उसे खुलने ही नहीं दिया। इस खिड़की से धूप और हवा अच्छी आती है, लेकिन बीबी जी की ज़िद!"
नीरज ऐसा लज्जित हुआ, जैसे उस खिड़की के बंद रहने में उसी का दोष हो।
"आप आज यहीं रहिए,"भाभी ने आग्रह किया,"क्या अपना घर रहते हुए भी होटल में..."
"भाभी, वह तो प्रतिनिधियों के लिए तय है।"
"जो भी हो, आप चित्रा बीबी से मिल तो लीजिए। ज़रा बैठिए, मैं आती हूँ। रात का भोजन आप को यहीं पर करना है।" कहती भाभी लौट गई।

चित्रा के कक्ष में सादगीपूर्ण सजावट थी। एक तरफ़ बुकशेल्फ में काफी किताबें, लिखने-पढ़ने की मेज़, कुर्सी लगी हुई, हैंगरों में कुछ कपड़े टँगे। किसी पढ़ाकू महिला का कमरा लग रहा था। तभी नीरज चौंका, लिखने की मेज़ पर तिरछा लगा हुआ एक फोटोग्राफ़। वह उत्सुकता दबा न सका। जा कर देखा, उसी का फोटो था। ऐसे लगा था कि पुस्तकों की आड़ में पड़ता था।
अभी भी चित्रा उसे चाहती है पता नहीं। संभवत: चित्र यों ही रखा रह गया हो। लेकिन लिखने की मेज़ पर
वह खिड़की सारी मुसीबतों की जड़...

नीरज को कुतूहल हुआ। पाँच साल से बंद पड़ी है, भाभी तो कह रही थीं। तब तो यह जाम हो गई होगी। वह उत्सुकता न दबा सका। आगे जा कर खिड़की का हैंडिल पकड़ा, खींच कर खोला, यों सपाट खुल गई, जैसे रोज़ ही खुलती रही हो।

वह घबराया। खिड़की उसे नहीं खोलनी थी। चित्रा हमेशा बंद रखती है। उसने चाहा, कि उसे फिर बंद कर दे, तभी किसी के आने की आहट से चौंक पड़ा। चित्रा सामने खड़ी थी। विस्मित नेत्र, मुँह खुला वह सब भूल कर उसे निहारने लगा।

कुछ ख़ास अंतर तो नहीं पड़ा, इस बीच बदन कुछ भर गया है। कितनी सुंदर लग रही है। चेहरे पर आत्मविश्वास है, लेकिन वही चित्रा है
"तु तु..." चित्रा हकलाई।
नीरज ने खिसियानी मुसकराहट के साथ कहा, "भाभी यहीं बैठा गई थीं।"
चित्रा कुछ सामान्य हुई। वह बोली, "तभी! किसी ने न बताया, कौन है। भाभी ने हँस कर यही कहा था, भीतर कोई तुम्हारी प्रतीक्षा में हैं। मैं समझी, कि कोई दोस्त बैठी होगी।"
"मैं क्या दोस्त नहीं, दुश्मन हूँ।" नीरज ने वातावरण को हलका करना चाहा।
"बैठो," चित्रा बोली। तभी उसकी नज़र पड़ी खिड़की की ओर।
"अरे, खिड़की तुमने खोल दी है!"
नीरज सफाई-सी देता बोला, "यों ही देख रहा था, पाँच साल से जाम पड़ी हुई है खुलती है या नहीं।"
चित्रा के होठों पर मुसकान आ गई, "तो, तुमने खोला इसे?"
"अभी बंद कर देता हूँ," नीरज पसीने-पसीने हो रहा था।
"बिलकुल नहीं," चित्रा उसके पास आ बैठी, "खुली रहने दो। कैसी अच्छी हवा आ रही है।"

नीरज सब भूल कर चित्रा के बदन की सुगंध मे खो गया। वह उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बोला, "ताज्जुब है, बड़ी आसानी से खुल गई।"
चित्रा हँसी, "बड़ी-बड़ी बातें अकसर एक बहुत ही नाजुक कमानी पर संतुलित रहती है।"
तभी भाभी ने मिठाई-नमकीन आदि की ट्रे लिए प्रवेश किया, और दोनों को साथ एक ही सोफे पर बैठ देख चहकी, "तो खूब बातें हो रही हैं पूरे पाँच साल की बातें। अरे, वह खिड़की वह कैसे खुली?"
नीरज ने सिर झुका लिया। चित्रा बोली ,"भाभी, खिड़की ने खुद को इनसे खुलवा लिया है। अब खिड़की खुल गई।"

अगले दिन, नीरज चित्रा के साथ बनारस वाली गाड़ी की प्रतीक्षा में वेटिंगरूम में बैठा था। सामान बाहर प्लेटफार्म पर रखा था। चित्रा के भाई-भाभी भी उन्हें स्टेशन तक पहुँचाने आए थे। वे बड़े खुश थे। पाँच साल बाद सही, बहन को घर मिला, अब सब सामान्य रहेगा।

भाई साहब रिज़र्वेशन कराने बुकिंग ऑफ़िस गए थे। भाभी ज़रा देर के लिए बाथरूम में गई, तो नीरज ने मौका पाकर पूछा, "चित्रा, मैं अभी भी इस चक्कर में हूँ, कि पाँच साल से बंद पड़ी खिड़की ऐसी आसानी से कैसे खुल गई थी।"
मदमाती आँखों से उसकी आँखों में देखती चित्रा मुसकराई, "मैं उसे रोज़ एक-दो घंटे के लिए खोल देती थी, तुम्हारी तरफ़ से।"
"ओह!" नीरज हँसा, "तो यह बात थी। आखिर खोली तुम्हीं ने न!"
"वाह, मैंने क्यों," चित्रा भी हँस कर बाली, "तुम्ही ने तो खोली है, तुम हार गए।"
"मैं हारा कहाँ!" नीरज ने उसका हाथ दबाया, "मैं जीत गया हूँ। सच पूछो, तो हम दोनों ने मिलकर खोली। जानती हो, कल २१ फरवरी को यहाँ टाइम पूछने आया था, इसी जगह थोड़ी देर बैठा था। सोचा था, "बोरिंग रोड जाकर पिछले पाँच साल का हिसाब कर दूँगा, और फिर बनारस जा कर अपने एकाकी जीवन की नये सिरे से शुरुआत करूँगा। लेकिन, तुम्हारे यहाँ गया, तो वही पुराना हिसाब नए खाते में चालू हो गया।"
"यह हिसाब अब साफ़ होने वाला नहीं," चित्रा मुसकराई, "यह तो बढ़ता ही रहेगा, चक्रवृद्धि ब्याज की तरह।"
भाभी जी बाथरूम से निकल आई। स्टेशन पर गाड़ी के शीघ्र पहुँचने की घोषणा की जा रही थी।

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१५ अप्रैल २००१

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