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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है भारत से मनोज सिंह की कहानी— 'बिना टिकट'


''रघु...''
बचपन का नाम सुनते ही मेरा तुरंत पीछे मुड़कर देखना स्वाभाविक था। अब तो राघव भी कोई नहीं बोलता, मि. राघवेंद्र या मि. सिंह ही बोला जाता है। दिल्ली के निजामुद्दीन स्टेशन पर भीड़ अभी कम थी और मेरी दृष्टि अपना नाम पुकारने वाले को आसानी से ढूँढ़ सकती थी।
''कौन? सुनील! ज़्यादा फ़र्क उसमें भी नहीं आया था। नौवीं कक्षा तक आते-आते चेहरा व शरीर अपना पूरा आकार तकरीबन ले ही लेते हैं। और तभी हम बिछड़े थे। हाँ, आज उसकी जींस की पैंट घुटने के नीचे से कुछ ज़्यादा फटी हुई थी। नहीं, शायद फाड़ दी गई थी। पता नहीं। ऊपर मामूली-सी टी-शर्ट और कंधे के पीछे लटका बड़ा-सा मगर पुराना बैग। इसे झोला भी कहा जा सकता था। रंग उसका गोरा न होता तो हिंदुस्तान में उसे भीख माँगने वाला घोषित कर दिया जाता। मेरी कौतूहल व खोजती निगाहें रुक-रुक कर सरकते हुए और नीचे पहुँची तो देखा कि उसकी चप्पलें अपने जीवन की अंतिम साँसे गिन रही थीं। उसकी ऐसी हालत देख मेरी आँखें में चमक उभरी थी। और क्यों न उभरती, मेरे कपड़े जो बेहतर थे।

''कहाँ जा रहा है? उसके नज़दीक आकर पूछा था।
''मैं? भोपाल जा रहा हूँ। ... और तू?''
''वैसे तो गोवा जा रहा था, पर चल, तेरे साथ भोपाल चलता हूँ।

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