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नीलू की बोलती बंद हो चुकी थी। वह हर वक्त एक ताप में झुलसती सी रहती। भीतर भीषण अंतर्द्वंद्व चलता रहता। यह क्या हो रहा है। लोग क्या सोच रहे होंगे।

वह पहली जनवरी थी। लगभग दस बजे का समय। नीलू और नितिन तैयार होकर निकले। मित्रों के साथ पिकनिक मनाने। नितिन अपनी मोटर साइकिल निकालने लगा नीलू अपने घर के दरवाजे में ताला बंद करने लगी। सामने हल्की नरम धूम में मेजर बैठा हुआ था। अपने पूरे स्टाफ के साथ। नए साल की नई सुबह कुछ हँसी दिल्लगी चल रही थी। संभवतः उसी मूड में मेजर बोल उठे,
“नमस्कार शर्मा जी, किधर चल दिये। कभी हमें भी तो काफी वाफी पिलाइये भाई। सुना है आपकी मेम साहब बहुत बढ़िया काफी बनाती हैं।“
नितिन का चेहरा तमतमा गया। वह कुछ बोला नहीं।
“क्या बात है शर्मा जी, नाराज हैं क्या।“ मेजर कुछ सहम कर बोले।
नितिन ने सिर उठाकर उनकी तरफ घृणा से देखा। फिर अपनी टरटराती आवाज में बोला, “क्या बात है साहब मैं अपनी फैमिली के साथ जा रहा हूँ तो आप मुझे क्यों टोंक रहे हैं। मैंने पहले ही जता दिया था कि मैं नॉन एकेडेमिक लोगों की कंपनी पसंद नहीं करता। मेजर पर मानो घड़ों पानी पड़ गया। पूरा स्टाफ सनाका खा गया। सारे रास्ते नितिन गुस्से में फुँकारता रहा। सुबह से मूड खराब कर दिया बेहूदे ने। मैं मकान बदल लूँगा साहब।“
अवसाद की गहराइयों में डूबती वह किसी तरह बोली, “जल्द बदल लो जी मकान। उस दिन के बाद फिर कभी कोई बाहर हाते में नजर नहीं आया।“

आफिस में तो जैसे मातम छा गया था। कर्मचारियों के बोलने की आवाज तक कभी सुनाई नहीं पड़ती। मेजर की आवाज तो बिलकुल भी नहीं। दरवाजे से बहुत कान सटाकर सुनती नीलू तो आभास होता कोई बेहद कमजोर सी आवाज में कुछ निर्देश दे रहा है और फिर एकदम खामोशी छा जाती।

लेकिन एक दिन अस्थाना साहब ही आगए नीलू के घर। नितिन था नहीं। वे नीलू से ही बतियाने लगे। परेशान से बताने लगे कि कंपनी के डायरेक्टर मिस्टर एंडरसन और मिस्टर सुब्रमण्यम आ रहे हैं मुआयना करने। लेकिन यहाँ तो सब ठंडा पड़ा है कोई तैयारी ही नहीं। इस मेजर को जाने क्या हो गया है।

नीलू का हृदय विदीर्ण होने लगा। इनका डायरेक्टर्स आ रहे हैं और इनका ये हाल। क्या इनके घर में कोई इनका मूड ठीक करने वाला नहीं है। इनके मित्रों में कोई नहीं करता इनका मूड ठीक। सारी करतूत तो उसी की है। बिना बात उनका दिमाग खराब किया सरे आम अपमान करवा दिया। वह जनवरी की सात तारीख थी। संपूर्ण उत्तर भारत शीत लहर की चपेट में था। चारों ओर घना कोहरा तिसपर सुबह से लाइट नदारत, नितिन अपनी आफिस की गाड़ी में जा चुका था। मेजर की जीप भी आकर सामने हाते में खड़ी हो चुकी थी। दस बज गए थे। कुछ ही देर में आफिस के बाकी कर्मचारी भी आ जाएँगे।

नीलू का हृदय धक धक कर रहा था। वह जो कदम उठाने जारही है कहीं गलत तो नहीं समझी जाएगी। कहीं कोई बैठा न हो वहाँ। न जाए तो अच्छा। बेकार नया फसाना बन जाएगा।
मगर वह तैयार हुई। राख के रंग की सादी साड़ी हल्के भूरे रंग का पुराना कार्डिगन, बिना किसी प्रसाधन का सादा सलोना चेहरा।

दरवाजे से कान लगाकर आहट ली. एकदम सन्नाटा। कुर्सी जरा सी चरमराई तो लगा हाँ है। भीतर के सारे डर को धकेल कर वह पहुँच ही गई आफिस के दरवाजे पर। भीतर मेज पर एक मोटी सी मोमबत्ती जल रही थी। मोमबत्ती के मायावी प्रकाश में कुर्सी पर बैठे मेजर डायरी में कुछ लिख रहे थे। गहन विचारपूर्ण मुद्रा में। बदन पर मैरून रंग का पुलोवर आँखों में चश्मा सुव्यवस्थित कमरा, पूरा वातावरण स्वप्न लोक सा।

वह दरवाजे पर ठिठक गई। मुँह से आवाज नहीं निकल पा रही थी। मेजर ने ही सिर उठाकर देखा और मृदुल स्वर में बोले आइए। वह भीतर आ गई। कुर्सी पर बैठ गई। कागज पर लिखा एक फोन नम्बर मेजर की तरफ बढ़ा दिया। मेजर ने नंबर मिलाकर रिसीवर उसकी ओर बढ़ा दिया।
रिसीवर लेकर उसने कुछ बातें की। फिर उठने लगी। मन में एक हूक सी उठी। भय संकोच की इतनी घाटियाँ लाँघकर यहाँ तक पहुँच पाई हूँ क्या सिर्फ फोन करने के लिये। बोली,
“आपने हमें नए साल का कैलेंडर नहीं दिया?”
“अरे रे अभी लीजिये। बैठिये बैठिये तो जरा।“

घंटी बजाकर उन्होंने चपरासी को बुलाया और उसे कैलेंडर लाने को कहा। चपरासी कैलेंडर निकालने गया। अब दोनो आमने सामने थे। मेजर की अनुराग भरी दृष्टि ने उसे अपने घेरे में ले लिया था। घबराहट से वह इधर उधर देखने लगी। बोली,
“बाप रे कितनी ठंड है।“
“बहुत।“ वे वैसे ही मंत्रमुग्ध से निहारते गहरे स्वर में बोले। फिर मेज की दराज में से एक पेन निकालकर उसकी तरफ बढ़ाया,
“यह रखिये।“ उसने डायरी रख ली। चपरासी ने कैलेंडर लाकर उन्हें दिया। उन्होंने कैलेंडर उसकी ओर बढ़ाया यह भी रखिये। कैलेंडर और डायरी लेकर वह उठ खड़ी हुई। सहसा बोल गई, लेकिन आपने तो हमें कुछ नहीं दिया। मानो एक बारगी ही तड़प गए हों वे कुर्सी में सिर टिका निढाल से हो गए। बोले बैठिये बैठिये न एक मिनट। वह बैठ गई। मेजर व्यवस्थित हुए बड़े प्यार से अपनी पेन पर कैप चढ़ाया फिर उसकी तरफ यों बढ़ाया जैसे कुछ समर्पित कर रहे हों। बोले आप लिखती हैं न ये रखिये। उसने पेन ले लिया। डायरी और कलेंडर भी। उठी बाहर चली। मेजर भी उठे। साथ चले। तृप्त आह्लादित स्वर्गिक आनंदित सुख में डूबे से क्षण।

दरवाजे पर पहुँचकर उन्होंने हाथ जोड़े। उसने भी। अंतिम बार उसने साहस कर पलकें उठाईं नजर भर मेजर को देखा। आँखें डबडबा आयीं बोली, “नया साल शुभ हो मेजर।“

मेजर का चेहरा भरे बादलों सा हो रहा था भरे गले से बोले, “शुक्रिया, आपका भी।“ मंत्रमुग्ध सी वह घर लौटी। सोफे में सिर टिका आँखें मूँद लीं। पेन का ध्यान आया। आँखें खोलकर गौर से देखा नीली पेन, नीचे अत्यंत बारीक सुनहरे अक्षरों में चमक रहा था की ओर से उपहार... किसकी ओर से उससे पढ़ा नहीं गया आँखें झर झर बरसने लगीं। शाम तक पूरे आफिस का माहौल जीवित हो चुका था। जीवंत और क्रियाशील। बढ़ती हुई सरगर्मियाँ बाता रही थीं कि मिस्टर एंडरसन और मिस्टर सुब्रामण्यम के स्वागत की जोरदार तैयारयाँ हो रही हैं। मेजर अपनी स्नेह सिक्त गंभीर आवाज में कर्मचारियों को आवश्यक निर्देश दे रहे हैं।

बगल के कमरे में नीलू अपना सामान पैक कर रही थी। अपने में डूबी आत्म तृप्त नितिन ने नया मकान ले लिया था। यहाँ से दूर बहुत दूर।

ऐसे ही बहुत दूर रहते हुए बहुत बरस बीत गए नीलू को मेजर को उसने फिर कभी नहीं देखा। लेकिन हर साल सात जनवरी को दस बजकर बीस मिनट पर वह अलमारी खोलकर वही नीला पेन निकालती है पेन को देखकर कहीं खो जाती है वह मंजर आँखों के आगे जीवंत हो उठता है। सिंदूरी आभा बिखेरती वह पृथुल मोमबत्ती, अनुराग छलकाती वे अवश आँखें उसके मुँह से अनायास ही निकल पड़ता है- नव वर्ष शुभ हो मेजर
और उसे भरे कंठ की धीमी आवाज सुनाई देती है- शुक्रिया आपका भी।

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३ जनवरी २०१०

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