
अंक १ दृश्य -
१
(मंच
पर अंधेरा। प्रकाश का एक गोल घेरा कुरसी पर बैठे रौबीले थानेदार पर आता है। उसका
हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठा हुआ है जिसमें डंडा पकड़ा हुआ है। दो–तीन फटे हाल
ग़रीब जिनकी पीठ पर 'भारतीय जनता' लिखा हुआ है आरती का सामान लिए है। नेपथ्य से
आरती का स्वर आता है।)
ओम जै पुलिस हरे, स्वामी जै पुलिस हरे
भ्रष्ट जनों के संकट, पल में दूर करे
(गुंडेजनों के संकट) पल में दूर करे।
ॐ जै...
जो चढ़ावा चढ़ावे सब, कष्ट मिटे उसका
संपति घर की जावे, जब संग मिले इनका।
ॐ जै...
तुम भ्रष्टाचार–सागर, तुम बदमाशी करता
तुमरे आसीरवाद बिना, डाका नहीं डलता।
ॐ जै...
तुम बिन हत्या न होती, अपहरण न हो पाता
तुम भ्रष्टाचार शिरोमणी, मंत्रियों के अन्नदाता।
ॐ जै...
|
|
दृश्य
– २
(एक कमरा। सभी कमरे
चारदीवारों से बनते हैं। इन दीवारों को सजाया
भिन्नभिन्न तरह से जाता है। इन दीवारों के भीतर
जो 'सजा' होता है वही बताता है कि इसमें रहने
वालों की हैसियत क्या है। जैसा रहने वाला होता है,
दीवारों की वैसी ही सजावट होती है। जनता की
झोपड़ी की सजावट, जनसेवकों की कोठी तथा
वेश्याओं का कोठा, सिद्ध करते हैं कि हम सब मानव
होते हुए भी 'एक मानव' नहीं हैं। यह कमरा राष्ट्र के
महान सेवक थानेदार का है। क्योंकि कमरें में पलंग
है अतः यह बेडरूम है।
खूंटी पर टंगी ख़ाकी वर्दी और सरकारी निशान चिह्नित
बैल्ट वैसा ही श्रद्धाभाव जन्म दे रही जैसा सफ़ेद कुर्ते,
धोती और गांधी टोपी को देखकर होता है। देखने
वाला स्वयं को 'शिकार' अनुभव करने लगता हैं।
इधरउधर बिख़रा बहुमूल्य स्वदेशी और विदेशी
सामान घोषणा कर रहा है कि यह अमूल्य है क्योंकि
इसका कोई मूल्य नहीं दिया गया है।
थानेदार का कमरे में प्रवेश। वह कच्छे और बनियान
में है। खूंटी से कमीज़ उठाकर पहनता है। इस बीच
थानेदारनी का प्रवेश। उसके हाथ में पूजा की थाली
ऐसे सुशोभित हो रही है जैसे किसी ठेकेदार के हाथ
में रिश्वत की थैली। थानेदार खूंटी से पेंट उतारता है।)
|
पत्नी
:
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
|
ये क्या, आप
पेंट पहन रहे हो?
और नहीं तो क्या इस नेशनल डे्रस में
थाने जाऊंगा। मैं थाने जा रहा हूं, किसी नाटक
कंपनी में नहीं।
पर थाने क्यों जा रहे हो? अभी रात ही तो आए
हो वहां से, थोड़ा आराम कर लेते।
इलाके में जब कत्ल हो तो थानेदार के
लिए आराम हराम होता है।
(आंख मटकाते हुए मुस्कराकर) हाय क्या इलाके
में कल कत्ल हो गया? कौन जात और धर्म था, क्या
नाम था उसका?
तुम्हारे जैसे धार्मिक अगर कोर्टकचहरी में जज बन
जाएं, थानों के थानेदार हो जाएं, तो मामले
मिनटों में सुलट जाएं, ज्यादा तफ़तीश में जाने
की ज़रूरत नहीं है, देखा कौन जात का है और फट
फ़ैसला सुना दिया, नहीं तो अपने ऊपर वाले पर
छोड़ दिया और खुद हाथ में छैने पकड़ लिए। (हाथ
जोड़ते हुए) धन्य हो भगत जी, धन्य हो।
|
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
पंडित :
थानेदार :
|
(प्यार से आंख मटकाते हुए) चलो यह तो बता दो
जिसका कत्ल हुआ है, वो मालदार है।
(प्यार से उसी तरह आंखे मटकाकर, आंखों
में प्यार से झांकते हुए) हां, और जिस पर कत्ल का
शक है, वह भी मालदार है।
जय हो ऊपर वाले की, तब तो मैं आपको
बिल्कुल नहीं रोकूंगी (माथे पर तिलक लगाते हुए)
ईश्वर करे आप दोनों तरफ़ से कामयाब हों। (प्यार
से) देखो इस बार मैं मंदिर में सोने का छतर ज़रूर
चढ़ाऊंगी और अपने लिए हीरों के टाप्स लूंगी।
मैंने सोलह शुक्रवार का व्रत रखा हुआ है, माता
रानी ने मेरी सुन ली है। सब ठीक हुआ तो बहुत
बढ़िया उद्यापन करूंगी, नहीं नहीं, इस बार मैं
सुंदर कांड का पाठ कराऊंगी। पिछले महीने वकीलन का
पति झूठा मुकदमा जीत कर आया था, उसने कराया था।
तब से अपने सुंदर कांड की तारीफ़ें कर रही है, मुई!
मैं भी उसे दिखा दूंगी कि सुंदर कांड का पाठ कहते किसे
हैं। वो अगर वकीलन है तो मैं भी थानेदारनी हूं।
ऐसा परसाद बाटूंगी की सब देखते रह जाएंगें। क्यों
जी? इस बार।
बिल्कुल ठीक है जी। इधर कत्ल कांड, उधर
सुंदर कांड। आप भगत लोग भी कोई न कोई कांड करते
ही रहते हो। वैसे यह सुंदर कांड किस सुंदरी के साथ
हुआ था जी।
आप भी बस! यह तो रामायण के एक अध्याय का
नाम है। सीता जी को जब रावण उठा कर ले गया था।
यानि किडनैप हुआ और आप कहते हो कांड
नहीं हुआ।
आपको कुछ पता तो है नहीं।
अच्छा है कि मुझे कुछ पता नहीं है, वरना
ऐसा केस बनाता किडनैपिंग का कि तुम्हारा वो पंडित
भोलानाथ,
(इस बीच जय श्रीराम का नारासा लगाते हुए पंडित
भोलानाथ का प्रवेश।)
यह लो शैतान का नाम लो और शैतान जी हाज़िर।
(प्यारभरी नाराज़गी के साथ थानेदार को
देखती है। पंडित का गदगद भाव से स्वागत करते हुए)
आइए पंडित जी, हमारे धन्य भाग कि आप पधारे। हम
अभी आप की ही बात कर रहे थे। बहुत जल्दी मैं अपने घर
सुंदरकांड का पाठ रख रही हूं।
बहुत उतम विचार है देवी! इस पाठ से
सारे संकट दूर हो जाते हैं।
किसके संकट, हमारे या आपके? जहां आप की
दक्षिणा का विचार हो वो विचार सदा उतम ही होता
है, ब्राह्मण देवता!
|
पत्नी :
पंडित :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पंडित :
थानेदार :
पंडित :
थानेदार :
पत्नी :
|
आप भी बस, (पंडित से) आप तो जानते ही, ये बड़े मज़ाकिया
हैं। पुलिस की नौकरी में भी मज़ाक कर लेते हैं, आपके लिए
दूध लाऊं या...
नहीं देवी, आज मैं जल्दी में हूं। आप के
यहां जब भी आता हूं तृप्त होकर ही जाता हूं
..., आज
क्षमा करें। आप तो बस, आज महीने का पहला शुक्रवार
है और, (पंडित हाथ मलते हुए)
मुझे याद है पंडितजी, आज आपकी दक्षिणा का
दिन...(थानेदार से) सुनो जी, आपके पास
२01
रूपए होंगे...पंडितजी
को...
हफ्ता देना है। आप भी पंडित जी हमारी तरह
अपनी डयूटी के पक्के हो...आंधी हो, बरसात हो
महीना लेना नहीं भूलते...(जेब से पर्स
निकालने को होता है)
रूकिए, पंडितजी के लिए मैं आपकी नेक कमाई
से जो हर महीने धरमकरम के लिए निकालती हूं,
उसमें से दूंगी।
भाग्यवान, उपर की कमाई उपरवाले की
मेहरबानी से ही मिलती है, उपरवाले की मेहरबानी
से मिलने वाली कमाई से बढ़कर क्या नेक होगा?
तनख़ाह तो सरकार की मेहरबानी से मिलती है और
हमारे देश की सरकार कितने नेक बाहुबलियों से चल
रही है, सब जानते हैं। वैसे भी पंडित जी के पास
जाकर हर पैसा नेक ही हो जाता है, क्यों पंडित जी?
हां जजमान, चंदन पर सांप लिपटे रहें तो
भी उस पर विष नहीं व्याप्तता।
सांप का विष भी चंदन नहीं होता पंडित
जी!
मुझे विलंब हो रहा है, आपके कल्याण के लिए
देवी की पूजा भी . .
.(पंडित से) और पूजा समय पर ना हुई
तो अनिष्ट हो सकता है...यह आपका अनिष्ट वाला डंडा
हम पुलिस वालों के डंडे से भी तगड़ा होता है। (रूपए
देते हुए) यह लो अपने महीने की दक्षिणा।
(पंडित रूपए
को जैसे झपटता है और जय श्री राम कहता हुआ तेजी से
प्रस्थान करता है।)
बहुत जल्दी में है आज तुम्हारा पंडित,
लगता है कोई मोटी असामी फंसी हुई है। आज तो
मुफ्त की भी नहीं खाकर गया और साला दस रूपल्ली का
आशीर्वाद भी नहीं देकर गया।
आप भी वैसे ही बेचारे के पीछे लगे रहते हो...आप
को कुछ पता तो है नहीं, मैंने कितनी बार कहा कि धर्म–कर्म
के मामले में बोला मत करो जी...
(तोता मैना स्टाइल में दोनों पासपास बैठ जाते
हैं। आंखों में आंखें मिलाकर, युवा प्रेमियों की
तरह लय में कहते हैं)।
|
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
दोनों :
|
बिल्कुल ठीक है जी...तुम्हें जो करना हो
करो जी, मैंने कभी मना किया है जी?
नहीं जी।
तो पूजा पाठ के इन कांडों के चक्करों में
मुझे मत घसीटा करो जी...तेरी पूजा में एक आध
घंटे बैठता हूं तो तेरे ऊपर वाले के चक्कर में मुझे
हो जाती है बवासीर जी।
ऐसा नहीं कहना जी...ऊपर वाले की
मेहरबानी से हमारा घर भरापूरा है जी...उसका
शुक्र तो अदा करना ही होता है जी...!
तो तुम करो जी...मैंने तुम्हें खड़ताल
बजाने से कभी रोका है जी...?
नहीं जी...मैंने आपको मीटमांस खाने
से रोका जी?
नहीं जी...मैंने तुम्हें चरणामृत पीने
से रोका जी?
नहीं जी...मैंने आपको शराब पीने से
रोका जी?
नहीं जी...मैंने
तुम्हें मंदिर–गुरूद्वारे जाने पर रोका जी...
नहीं जी...मैंने आपको इधरउधर मुंह
मारने पर टोका जी...?
नहीं जी...इसलिए हमारी गाड़ी अलग–अलग पटरियों
पर चलती हुई साथ–साथ चल रही है जी...
इसलिए हमारे दिलों में प्यार का पवित्र सागर
हिलोरे मार रहा है जी।
इसलिए हमारे दिलों में प्यार की शराब
बह रही है जी।
मैं ऊपर वाले के गुणगान में झूमती रहती
हूं।
मैं ऊपर की कमाई में झूमता रहता हूं।
हम दोनों झूम रहे हैं...ज़िंदगी के
मज़े लूट रहे हैं, इसी को कहते हैं सहअस्तित्व।
(दोनों प्यार से झूमते हैं। प्रकाश गोलाकार उन पर
पड़ता है, दोनों नृत्य की मुद्रा में स्थिर)
दृश्य
– ३
(थानेदार का ड्राईंग कम डाइनिंग रूम। ड्राईंग इसलिए क्योंकि
इसमें एक सोफा, सेंटर टेबल, और डाइनिंग टेबल है। सोफे पर
जो समान बिखरा पड़ा है, वो बहुमूल्य सोफे को कबाड़ बना रहा
है। डाइनिंग टेबल पर खाने का सामान कम, मैले कपड़े अधिक
हैं। थानेदार की पत्नी भजन गुनगुनाते हुए डाइनिंग टेबल पर
पड़े मैले कपड़े हटाती जा रही है और नाश्ता लगाती जा रही
है। पास ही धीमे स्वर में फ़िल्मी गाना आ रहा है। मेरे तो
गिरधर गोपाल दूसरा न कोई...
(थानेदार का प्रवेश, हाथ में बेल्ट पकड़ी है। आते ही
रेडियो की नॉब छेड़ता है, तेज़ स्वर में गाना
बजता हैजब तक रहेगा समोसे में आलू।)
|
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
|
(थानेदार की ओर से देखती हैं। हाथ के इशारे
से वाल्यूम धीरे करने को कहती हैं। थानेदार धीरे
करता है।)
यह क्या कर रही हो...मेरे पास नाश्ते का
टाईम नहीं है।
देखो जी...तुम्हें कत्ल की तफ़तीश पर जाना
है। न जाने कितना टाईम लगे।
कत्ल की तफ़तीश पर जाना है इसलिए घर से
खाकर नहीं जाना है...साले इतना ठूंसठूंस कर
खिलाएंगे...अपना ससुराल याद आ जाएगा। ऐसी
वैसी पार्टी नहीं है...कपड़े फाड़फाड़कर खिलाएगी...इशारा कर दिया तो होम डिलिवरी भी कर देगी।
चलो आपकी मरज़ी मेरा तो आज व्रत है...यह
नाश्ता मंदिर में ग़रीबों को बांट दूंगी...
एक ग़रीब दास हमारे घर में भी तो है...
कौन?
ओई महापंडित, महाज्ञानी, महाकवि
'कलंक'...तुम्हारा भाई।
कलंक नही मयंक है उसका नाम...आप तो
ऐसे ही उसके पीछे पड़े रहते हैं...वो बेचारा
ग़रीब आपके घर का क्या खाता है?
यही तो अफ़सोस है साला खाता कम है पीता
ज्यादा है...बिना बोतल गटके साले की कविता
नहीं उतरती है।
बहुत नाम है उसका...जगहजगह से
बुलावे आते हैं उसको...बड़ी सोणी कविता लिखता
है।
आजतक उसकी कोई सोणी कविता समझ आई
है...न कोई सिर होता है न पैर...
बड़े दिमाग़ वाली कविता लिखता है।
अपने जैसों के दिमाग़ में तो आती नहीं
है, परसों मेरे पीछे ही पड़ गया, जीजाजी एक
पटियाला बनाओ। मैं आपको कविता सुनाऊंगा। मेरी
तो घिग्गी बंध गई। मैंने कहा ज़रूरी काम से जाना
है...पर वो तो पूरा बेशर्म है। जेब से कविता
निकाल ही ली। इस बीच फ़ोन बज उठा। मुझे लगा
जैसे तंगहाली के मौसम में कत्ल का केस फंस गया
हो। मैंने साले को कितना कहा, कविता रख जा मैं फ़ोन
के बाद पढ़ लूंगा पर वो भी साला ढीठ, बोला आप
काम कर लें...साला पंद्रह मिनट तक इंतज़ार करता रहा
कब मैं फ़ोन रखूं और वह मेरे भेजे में कविता
घुसेड़े। साला इतना चिपकू तो फेवीकोल भी नहीं
होता है। जब तक मैंने फ़ोन रखा नहीं वो हाथ में
कविता लिए खड़ा रहा। मेरे फ़ोन रखते ही पता नहीं पंद्रह
मिनट क्या बोल गया...और कुछ देर बोलता तो
मुझे ब्रेन हेमरेज ही हो जाता। कविता भी ऐसी
बोलता है जैसे कब्जी हो गई हो। मेज़ पर से एक
कागज़ उठाता है। उसे पढ़ता है...ले सुन अपने भाई
की करतूत।
चिड़िया
ठंडे खून वाली चिड़िया
मेरे पेट से उगा एक पेड़
उस पर बैठी चिड़िया
आंखें सूने में ढूंढ़ती है
मुर्दे के पेट पर जा बैठी चिड़िया
मेरे सिर पर बैठा एक कौआ
ओ मेरे प्रभु
मुझे इतने कौए मत देना
कि मेरी लाश के नीचे
मेरे मरने पर करे कांवकांव।
इस साली कविता का कुछ समझ आया तो मुझे भी
समझा दे।
|
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
|
आजकल की कविता ऐसे ही होती है...पढे़लिखों के लिए होती हैं।
तो भई हम अनपढ़ों के पीछे क्यों पड़ते
हैं...हम तो यह जानते हैं कि कविता तो वो जो
समझ आ जाए, गुनगुनाने का मन करे...दिल को
छू जाए। गालिब के बचपन में पढ़े शेर आज भी याद
हैं मुझे...तुझे भी तो भजन याद हैं। बुल्ले
शाह...क्या बात है। पुराने टैम के ही हैं न...आज की कौन सी कविता तुझे याद है सोनयो।
कविताशविता छोड़ो जी, हमें कौनसी
गोष्ठी करनी है। आप तो अपनी डयूटी पर ध्यान दो,
कत्ल के केस पर ध्यान दो। लो एक बात तो मैं बताना
भूल गई...सुबह आप सो रहे थे तो नेता जी का
फ़ोन आया था, आने की कह रहा
था... थोड़ी देर
में।
साला ज़रूर कातिल की सिफ़ारिश लेकर अपना
हिस्सा बनाएगा। (जूता पहनते हुए) मैं निकल रहा
हूं। आए तो बोल देना सुबहसुबह निकल गए।
(दरवाज़े की घंटी बजती है।)
लगता है शैतान हाज़िर हो गया है।
(थानेदार एक जूता पहने दूसरे में जुराब पहने और
हाथ में जूता पकड़े बेडरूम की ओर जाते हुए)
मैं दूसरे कमरे में जा रहा हूं
... हरामजादे को टरका देना...(दोबारा घंटी बजती है)
साला आता भी फायर ब्रिगेड के इंजन की तरह
है...
|
|
(थानेदान जीवन में नैतिकता की तरह कमरे से
गायब होता है... पत्नी खुली अर्थव्यवस्था का बंद
दरवाज़ा खोलती है। नेताजी ने सफ़ेद झक कुरता धोती
पहनी है, जैसे चीनी की दलाली की कोठरी से निकला
हों। सिर पर गांधी टोपी, मानो मंत्रीमंडल में
ज़बरदस्ती कोई फिट किया गया हो।)
नेता जी : सीताराम, सीताराम, सीताराम भाभी... आप तो साक्षात सीता मैया लगती हैं! चेहरे पर क्या
तेज
है, पहनावे में क्या सादगी है।
|
|
पत्नी :
|
सादगी आपमें भी बहुत है
भैया... खादी के अलावा कुछ नहीं पहनते हैं।
(अंगुली की ओर देखकर) यह हीरे की अंगूठी अभी
बनवाई़.. (नेताजी के हाथ में सोने का कड़ा है... अंगुलियों को दर्शकों की ओर करते हुए। हाथ
बहुमूल्य अंगूठियों से लदा है।)
|
|
नेता जी :
|
है हैं एक ज्योतिषी ने बोला
पहन लो। इस छोटे से कस्बे से इस बार एम .पी .की
सीट पक्की है... एक बार एम .पी .बन गया तो सेंटर
में मंत्री पक्का बनूंगा और फिर आपको और हरि भैया
को दिल्ली ले जाऊंगा। देखना खूब ठाठ कराऊंगा। लाल
बती वाली गाड़ी होगी, बंगला होगा, हमारे
हरि भैया हैं कहां... मोहन प्यारे अभी जागे नहीं
क्या!
|
पत्नी :
नेता जी :
|
जाग तो बहुत पहले गए। इधर मैं मंदिर गई
और उधर वो थाने...
(भाभी शब्द को लटका कर बोलता है) भाभी हम
लोगों की तो रोज़ीरोटी झूठ के बिना चलती
नहीं है, झूठे वायदे नहीं करें तो वोट नहीं
मिलते... हाई कमान की झूठन न खाएं... झूठी
मक्खनबाजी न करें, तो़.. टिकट नहीं मिलता, झूठे
टेंडर न पास करें तो व्यापारियों का सपोर्ट नहीं
मिलता... झूठे दावें न करें तो हमें अपोजिशन खा
जाए, झूठ के दम पर न चलें तो, हस्ती ही मिट जाए।
पर भाभी, आप तो सत्य की देवी
हैं... साक्षात सीता
मैया हैं, आप आज कैसे असत्य वचन कह रही
हैं... वह भी सुबहसुबह। शामशाम को कोई झूठ
बोले तो समझ आता है, पर सुबहसुबह, भाभी...
|
पत्नी :
नेता जी :
पत्नी :
नेता जी :
पत्नी :
नेता जी :
|
पर मैंने झूठ कहां बोला!
प्रत्यक्ष को प्रमाण की ज़रूरत नहीं, हाथ कंगन को
आरसी क्या...
पढ़े–लिखे को अंग्रेज़ी क्या और भाभी हमारे जैसे नेताओं के
होते भ्रष्टाचार का उदाहरण देने की ज़रूरत क्या? जब...
भैया तुम बोलते बहुत हो...
भाभी हम खाते ही बोलने का हैं, हम क्या स्कूल
कॉलेजों के मास्टर... आपके साधु संत कथावाचक...
सबकी दूकान इसलिए सजी हुई है कि अच्छा बोल लेते हैं...
और तुम्हारी तरह काम की बात एक नहीं करते हैं।
भाभी काम क्रोध से हम दूर रहने वाले जीव हैं,
आपके गिरिधर गोपाल ने भी तो गीता में काम से
दूर रहने की शिक्षा दी है।
|
पत्नी :
नेता जी :
पत्नी :
|
मैं उस काम वासना की बात नहीं कर रही हूं... मैं कर्म की बात कर रही
हूं... तुम लोग बोलते ज्यादा
हो कर्म या तो करते नहीं और करते हो तो उल्टा करते
हो...
भाभी आप तो नाहक ही मेरी प्रशंसा कर रही
हैं... मुझमें कहां ऐसे गुण हैं।
अच्छा अवगुणी जी काम की बात पर आइए और मुझ
अज्ञानी को ये बताइए कि मैंने सुबहसुबह क्या
झूठ बोला है...
|
नेता जी :
पत्नी :
नेता जी :
|
आपने कहा कि हरि भाई सुबहसुबह चले गए
हैं...
इसमें मैंने झूठ क्या कहा?
भाभी जैसे
हम नेताओं की पहचान इस टोपी से है, अब खादी का
कुर्ता और धोती तो कोई भी ऐरागैरा पहन सकता
है... फैशन में कई लोग पहनते हैं, पर हर कोई नेता
तो नहीं हो जाता... नेता की पहचान होती है उसकी
इस टोपी से... आज़ादी की लड़ाई में यह टोपी
पहनना इबादत की बात होती थी। आज कोई भला आदमी
पहनता है क्या? देश सेवा के लिए हम ही पहनते हैं... तो भाभी जैसे हम देश सेवकों की पहचान टोपी से
होती है, वैसे ही जन रक्षकों, पुलिस वालों की
पहचान इस (बेल्ट उठाते हुए) पेटी से होती है।... इस
पेटी के बिना खाकी वर्दी की कोई कीमत नहीं, समझो
कि जैसे बिन स्टेथेस्कोप के डॉक्टर, बिना काले कोट
के वकील और बिना बोझ के धोबी का गधा। हम
सेवक डयूटी पर जाते समय टोपी पहनना नहीं भूलते
और जनरक्षक डयूटी पर जाते समय बेल्ट पहनना नहीं
भूलते, जब पेटी यहां है तो पेटी वाला भी यहीं
होगा... तो मी लॉर्ड इससे सिद्ध हुआ कि आपने झूठ
कहा कि इधर आप मंदिर गई और हरि भाई डयूटी पर गए...
|
पत्नी :
नेता जी :
|
(शांत भाव से) मैंने असत्य नहीं कहा भाई साहब... मैं मंदिर गई थी, और आपके हरि भैया डयूटी
पर गए थे, सुबह गए तो लौट नहीं सकते हैं कि नहीं... लौट आए
हों... उन्हें स्नानवान करने का
अधिकार है कि नहीं।
(हँसते हुए) क्यों नहीं, पर केवल स्नान करने का,
क्योंकि ध्यान करना तो आपका फील्ड है? वैसे भाभी
आपको तो वकील होना चाहिए, क्या बात पलटती हैं। (नाश्ते
की ओर लपकते हुए) जब तक हरि भाई आते हैं, हम
नाश्ते पर...
(बेचारा थानेदार एक बार हकीकत
में तैयार होने की प्रक्रिया निभा चुका था। अब उसे
तैयार होने की नौटंकी करनी थी। ऐसी नौटंकी करते
हुए उसने प्रवेश किया)
|
थानेदार :
नेता जी :
थानेदार :
नेता जी :
थानेदार :
पत्नी :
नेता जी :
थानेदार :
नेता जी :
थानेदार :
नेता जी :
|
क्यों नेता जी आज सुबहसुबह हमारा ही घर मिला
मुफ्त की खाने
को...
(समोसा खाते हुए) ठीक कहा हरि भाई़.. वैसे तो हम
अपने धर्म के लोगों के यहां मुफ्त का खाते नहीं हैं
पर सामने पड़ा मिल जाए तो छोड़ते नहीं हैं।
इसे ही कहते हैं मुफ्तखोर को मुफ्त की मिल ही जाती
है।
नहीं, इसे कहते हैं चोर के घर में मोर... क्यों
भाभी?
(थानेदारनी बस मुस्करा देती है)
कहिए मोर जी... सुबहसुबह कौनसा नाच
दिखाने के लिए आपने हमारे यहां पधारने का कष्ट किया
चुनाव के बादल भी नहीं छाए हैं फिर ये बिन
मौसम नाच कैसा?
आप दोनों देशसेवा की चर्चा करो। मैं चाय बना
लाती हूं। (जाती है।)
हैं हैं हम तो जन सेवक
हैं... जनता
की सेवा के लिए साल में 365 दिन नाचते हैं, लीप
ईयर में 366 दिन।
आज किस जन की अंगुलियों पर नाचने आए हैं?
वही रात वाला मामला, छोटे सेठ के कत्ल
का... मुझे ज़रा देर से पता चला वरना मौकाए वारदात पर
पकड़ लेता, घर में कष्ट न देता।
हमारे कष्ट की चिंता न करें, हमारी तो यह डयूटी
है सरकारी डयूटी... आपने क्यों कष्ट किया?
हमारी भी डयूटी
है... जनता के सेवक हैं हम, आप
तो जानते ही हैं बड़े सेठ जी जनकार्यों के लिए
हमारी पार्टी की कितनी मदद करते
हैं... ऐसे दयालु
और दानी के छोटे भाई की हत्या हुई हो और हम चुप
बैठे रहें... धिक्कार है हमें... यह किसी व्यक्ति
की हत्या नहीं है, पूरे लोकतंत्र की हत्या है।
|
थानेदार :
नेता जीः
थानेदार :
नेता जीः
थानेदार :
नेता जी :
थानेदारनीः
पत्नी :
थानेदार :
नेता जी :
|
अबे ओ... तेरी तो... भाषण मत झाड़। यह मेरा
घर है, चुनाव का दंगल नहीं। काम की बात कर।
काम यानि सेक्स की बात करूं? (हँसता है) सुन...
(फुसफुसाते
हुए) अभी एक पेटी की बात हुई है, ज्यादा भी हो सकती
है, इस मामले में खेमचंद को जरूर फंसाना है, शक
भी उसी पर जा रहा है।
शक उस पर नहीं उसके भतीजे पर है।
बात एक ही है चाचे के साथ भतीजे का गहरा संबंध
होता है।
कत्ल में भी भाईभतीजावाद... धन्य हो सेवक
जी, मैं कोशिश करूंगा।
शाम को आधी पेटी पहुंच जाएगी। (चाय लेकर
थानेदारनी आती है)
आप भी नेता भैया किसी बात को लेकर बैठ ही जाते
हैं।
क्यों, क्या हुआ भाभी?
वही पेटी वाली बात...
पेटी वाली बात, ओए तू हमारी जनानी से बिजनेस
की बात करता है, साला...
शांत... शांत... थानाधिकारी शांत... मैंने
सुबह थानेदारनी से जिस पेटी की बात की थी उसे
अंग्रेज़ी में बेल्ट कहते हैं और वो इस समय आपकी
कमर में ऐसे ही बंधी हुई है जैसे किसी पेड़ के
साथ लता लिपटी होती है...
(चाय सु़ड़कते हुए कहता
है।) चाय बहुत अच्छी बनी है भाभी और (चाय को
मेज़ पर रखकर हाथ जोड़ते हुए) हे देवी, जगत
जननी अभी मैं जिस पेटी की बात कर रहा था, वह
हमारे बिज़नेस का कोड वर्ड है यानि कूट शब्द... इसे मैं आपको समझा नहीं सकता।
|
थानेदार :
पत्नी :
नेता जी :
|
(इतनी देर में नीचे से स्कूटर की आवाज़ आती है)
ये कौन आ गया?
ये तो सिन्हा के स्कूटर की आवाज़ है। लगता है, नारद
जी आए हैं... (खिड़की की ओर देखते हुए) वही है।
साला ब्लैकमेलर... रिपोर्टर... साले ने मुझे
यहां देख लिया तो न जाने क्या मिर्च मसाला
लगाकर ख़बर छाप देगा, आजकल तो इन साले पत्रकारों
की जीजान से सेवा करनी पड़ती है...
न जाने
कब कहां कैमरा फिट कर दें।
|
थानेदार :
नेता जीः
|
ये कमीना सिन्हा... खेमचंद का माल खाकर मुझ पर गुर्राता है... मैं पिछवाड़े से निकलता हूं।
(हँसते हुए) ये आप पिछवाड़े की राजनीति कब
छोड़ेंगे देशसेवक जी?
आजकल वही सफल है जिसका पिछवाड़ा मज़बूत
है... तुम तो जानते ही हो, तुम लोगों का तो पिछवाड़े
से ख़ास वास्ता रहता है, जिसका पिछवाड़ा मज़बूत
नहीं होता, वो दो चार डंडों में ही बोल जाता
है। हमारे पिछवाड़े पर भी जनता, हाईकमांड, आदि
पड़े रहते हैं... साला पिछवाड़ा मज़बूत न होगा
तो अगवाड़ा कैसे जमेगा! चलता हूं। (नेता जाता
है)
|
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
पत्नी :
थानेदार :
|
क्या बोलना है उसे... कह दूं आप घर पर नहीं हैं?
नहीं आने दे उसे, देखता हूं खेमचंद का यह दलाल
क्या कहता है। (घंटी बजती है)
(थानेदार जूते उतारने लगता है।)
ये जूते क्यों उतार रहे हो आज जाना नहीं है क्या?
जाना क्यों नहीं है, पहले ही बहुत लेट हो गया
हूं।
नंगे पैर जाओगे?
भक्त जी, जूते सिन्हा के सामने पहनूंगा तो वो
समझेगा जाने की जल्दी में हूं... जूते पहनने की
नौटंकी करनी है।
तो ये बात सीधे मुंह से बोल दो, जूते खोलकर
क्यों बोलना . .. .(दोबारा घंटी बजती है)
चल जल्दी दरवाज़ा खोल, तू भी दिमाग़ बहुत खाती
है... पता नहीं तुम्हारा भगवान भी अपने भक्तों को
कैसेकैसे दिमाग़ देता है। (थानेदारनी दरवाज़ा
खोलने जाती है, और थानेदार दूसरा जूते के फीते
खोलकर उसे दोबारा बाधंने की नौटंकी करने लगते
है।) (स्थिर)
|
नेपथ्य से :
सिन्हा :
थानेदार :
सिन्हा :
थानेदार :
सिन्हा :
थानेदार :
सिन्हा :
|
जीवन में नौटंकियों का बहुत महत्व है। इनके
अभाव में जीवन सीधासाधा साफ़सुथरा सा
बनता है। आदमी जो हो वही दिखाई देने लगता है।
नौटंकी जीवन में हमें अनेक सच्चाइयों का सामना
करने से बचाती है।
(बिहारी उच्चारण) कैसे हैं थानेदार जी, कहीं जाने
की तैयारी है क्या?
आओ सिन्हा, भई हम तुम्हारे जैसे खुशनसीब तो हैं
नहीं, वारदात वाली जगह गए दो चार कलम घसीटी
और हो गई डयूटी हमें तो वारदात वाली जगह जाना
पड़ता है, और फिर थाने को भी संभालना पड़ता है।
वहीं जा रहा हूं...।
का है कि हमारी नौकरी में जो फ़ालतू दिमाग़
लगाना पड़ा है उसे आप नहीं समझ सकते हैं, कत्ल
वाले मामले के चक्कर में जा रहे होंगे... कोई
गिरफ्तारीविरफ्तारी की क्या...
वो भी करनी ही है।
देखिए, ऊ भ्रष्ट नेता के चक्कर में खेमचंद पर तो हाथ
नहीं डाल रहे हैं?
मैं किसी के दबाव में काम नहीं करता सिन्हा!
लक्ष्मी मैया के दबाव में भी नहीं (हँसता है) हरि
बाबू ऊ के दबाव को तो विष्णु भगवान भी मानते
हैं और उस हमाम में सभी नंगे हैं, तो हम कह रहे
थे कि ऊ भ्रष्ट नेता इस मामले में आपको गुमराह
करेगा, तभी तो सुबहसुबह आपके यहां हाजिरी दे
गया है।
|
थानेदार :
सिन्हा :
थानेदार :
सिन्हा :
|
मेरे यहां हाजिरी! वो तो यहां...
(टोपी को ऊंगली में चक्र की तरह घुमाते है) यह
पवित्र टोपी उसी हरामी की है, आपके चरणों में
डालने आया होगा।
(बेशर्मी से
हँसते हुए) तुम भी सिन्हा पूरे खोते
पत्रकार हो।
और हम ई भी बता देते हैं कि वो ससुरवा इस समय
अपनी टोपी के चक्कर में आपके घर के ईदगिर्द चक्कर
लगा रहा होगा, ताक में होगा कि कब हम निकलें
और वो अपनी टोपी संभाले... बिना टोपी के
साला धोबी का कुता लगता है, क्या आफ़र कर गया
है?
|
थानेदार :
सिन्हा :
पत्नी :
सिन्हा :
|
टे्रड सिक्रेट... सिन्हा... सिन्हा ट्रेड सिक्रेट। तुम
जानो इस मामले में हम गुप्त ज्ञानी हैं, इधर
का माल उधर चाहे कर दें पर इधर की बात उधर नहीं
होने देते, सारा ज्ञान गुप्त ही रखते हैं। आज तक
तुम्हारी बात नेता तक पहुंची है।
(थानेदार की पत्नी का प्रवेश,
हाथ में पानी का गिलास है।)
परनाम भौजी।
जीते रहो देवर जी।
आपके सुबहसुबह दरसन हो जाते हैं ता मन परसन्न
हो जाता है। आपके दरसन के परताप से सारे रूके काम
बन जाते हैं। खेमचंद आपको बहुत मानते हैं, भाभी
जी वो आपका बहुत सम्मान करते हैं, उनके भतीजे को
कत्ल के चक्कर में फंसाया जा रहा है, खेमचंद जी इस
बात से बहुत परेशान
हैं... हमसे बोले, हरि
बाबू और तुम्हारे जैसे अपने लोगों के होते हमारा
भतीजे पर केस बने, हम पर अंगुली उठे, बहुत सरम
की बात है... बोले हरि बाबू की पत्नी धरमकरम
करने वाली है, उनकी बदौलत ही धरमकरम बचा
हुआ है, बहुत बिसवास करते हैं, बोले हम तो डेढ़
पेटी उनके चरणों पर अर्पित कर देवेंगे, चाहे जिस
में खरच करें। किस साले में हिम्मत होगी उनसे
हिसाब लेने
की... मुझे बोले सिन्हा ये आधी
पेटी तुम अभी ले जावो, फिर बोले शाम को हम खुद
ही चलेंगे और उस देवी के दरसन भी कर लेवेंगे।
क्यों हरिबाबू।
|
|
थानेदार :
|
देखो, सिन्हा... धरमकरम में हम कभी टांग नहीं
अड़ाते हैं, दसहरे पर दस जगह रामलीला होती है,
हज़ारों रूपया चढ़ावे का आता है, हमने कभी कुछ
बोला नहीं है, आपकी रामलीला समिति में हमने
कभी कुछ हिसाब, किताब की बात की है अपने मुंह से
हफ्ता मांगा... जिसकी जो श्रद्धा हो सो करे... खेमचंद की धरमकरम में श्रद्धा है सो करे... हम
क्या कह सकते हैं, धरमकरम करेंगे तो ही फल
पावेंगे।
|
सिन्हा :
थानेदार :
सिन्हा :
थानेदार :
|
(मुस्कराते हुए) सही कहा धरमकरम करेंगे तो ही फल
भी पावेंगे... अपना ही अज़ीज़ समझना, केस
थोड़ा ढीला ही बने, बाकी तो आप समझदार
ही हैं...
और तू कम समझदार
है... साला सिद्धांतवादी।
(टोपी उठाते हुए) अच्छा चलते
हैं... तुमको भी तो
जल्दी है, मैं साथ चलता हूं... थाने ड्राप कर दूंगा।
(उठते हुए) टोपी रख दो सिन्हा... तुम तो जानते हो
साले कि हम माल इधर का उधर कर दें पर किसी की बात
इधर की उधर नहीं होने देते
हैं... हमें नशे में
समझ रहा है, साले पूरी बोतल पीकर भी होश
ग़ायब होने नहीं देते।
सिद्धांत के बड़े पक्के हो।
|
सिन्हा :
थानेदार :
सिन्हा :
दोनों :
थानेदार :
सिन्हा :
थानेदार :
सिन्हा :
|
तू भी तो कम नहीं है।
तू भी सिंद्धांत का पक्का
है... उस हरामी की टोपी नहीं
उठाने दी, सच्चा और सिद्धांतवादी है तू़.. हमें
लिखना तेरे बारे में।
(दोनों
हँसते हैं। अंधेरा)
हम दोनों
सिद्धांतवादियों के कारण देश प्रगति के रास्ते पर दौड़
रहा है। (दोनों लड़खड़ाते हुए चलते हैं।)
कितनी तेज़ी से दौड़ रहा है(दोनों
हँसते हैं,
गिरते हैं)। साला देश गिर गया।
समझदार तो तुम भी कम नहीं हो सिन्हा।
तो दोनों की इस समझदारी पर बिलायती चरणामृत
हो जावे। (अंगूठे को मुंह पर ले जाते हुए शराब
पीने का इशारा करता है।)
चलो सिन्हा तुम भी क्या याद रखोगे, आज हम
तुम्हारे दिन की शुरूआत स्कॉच से करवा देते हैं। हम
ये सोच रहे थे... सुबहसुबह चाय पीकर साला
मुंह का ज़ायका ही ख़राब हो गया।
उस हरामी भ्रष्टाचारी नेता के साथ रहोगे तो
ज़िंदगी का ज़ायका ख़राब होवेगा कि नहीं।
(थानेदार बार की अलमारी खोलता है, सिन्हा जीभ
लपलपाता है... उचक कर देखता है, बार में विदेशी
स्काच की बोतलों का ढेर है।)
|
सिन्हा :
थानेदार :
सिन्हा :
सिन्हा :
थानेदार :
सिन्हा :
थानेदार :
सिन्हा :
थानेदार :
|
कमाल है हरि बाबू, आपके यहां तो जन्नतवाहै
विराज रही है साला शराब का दरिया बह रहा है...
(थानेदार गिलास लाकर सिन्हा को देता है)
अब नज़र मत लगाना... शराब देखकर तुम साले
पत्रकारों की लार टपकती है, साले इतनी हराम की पीते हो
पचाते कैसे हो?
जैसे तुम साले पचाते हो...
हँसता है... (दोनों जाम से जाम टकराते हैं।)
आज का यह जाम कत्ल के नाम (एक घूंट में पीता है)
देश की माली हालत जैसा मरियल पैग बनाया,
पंजाबी आदमी है... ज़रा सुपर पटियाला बना... पंजाबी हाथ दिखा...
ओए तूने पंजाबियों का हाथ नहीं देखा है... साले
शराब में नहला सकता हूं नहला... पर (पैग
बनाने जाता है) पर साले तुम नहाते समय कुछ और
राग अलापते हो और अख़बार में कुछ और अलापते हो।
हम तो जो लिखते हैं सच लिखते हैं।
और वो सच तुम्हारा होता है।
इस सच की बदौलत तो हमारा नाम है।
इस सच की बदौलत... सिन्हा जब तू यहां आया था
तो तेरे पास साइकिल नहीं थी, दोनों पैरों में
साली चप्पलें भी अलगअलग रंग की होती थी, और
आज फर्स्ट क्लास कोठी है, स्कूटर है, साले तू कह रहा
था कि कार लेने वाला है।
|
सिन्हा :
थानेदार :
सिन्हा :
थानेदारः
सिन्हा :
थानेदार :
सिन्हा :
थानेदार :
सिन्हा : |
(नशे में) सोच रहे हैं एक दो मारूति हम भी ले
लें।
तभी साली इस कस्बे में पत्रकारिता स्पीड से दौड़ेगी... कितनी चिंता है तुझे पत्रकारिता
की... साली को स्पीड
से दौड़ाने का मारूति...
(नशे में) हमारी कलम में सच की ताकत है।
ताकत तो महेश की कलम में भी है।
वो साला टटपूंजिया पत्रकार...
खूसट बू़ढा...
टटपूंजिया है तभी तो आज भी टूटीफूटी साइकिल पर
दौड़ता है... उस साले की कलम उसके पास है और
तेरी कभी खेमचंद के पास होती है, कभी मेरे पास और
कभी महेश से लोग डरते हैं और तू डराता है तो
लोग तेरे सामने टुकड़े डाल देते हैं।
अबे ओ ज्यादा मत उड़.. थानेदार...
ज्यादा मत
उड़.. तेरे जन्नत की हकीकत हम भी जानते हैं।
और हम तेरी की... तभी तो हम दोनों की दोस्ती
है... साले साथ पीते
हैं... साथ खाते हैं...
(खाने
पर ज़ोर) समझा। साथसाथ खाते हैं और साथसाथ
निगलते हैं। (हँसते हैं)
(गाता है) ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेगे (दोनों
नशें में लड़खड़ाते हैं)
|
|
|
|
दशहरा विशेषांक
दिवाली विशेषांक
पृष्ठ :
१.
२ |