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पवन ज़्यादा देर स्मृतियों में नहीं रह पाया। यकायक बिजली आ गई,  अँधेरे के बाद चकाचौंध करती बिजली के साथ ही ऑफ़िस में जैसे प्राण लौट आए। दातार ने हाट प्लेट कॉफी का पानी चढ़ा दिया, बाबू भाई ज़ेराक्स मशीन में काग़ज़ लगाने लगे और शिल्पा काबरा अपनी टेबल से उठ कर नाचती हुई-सी चित्रेश की टेबल तक गई, ''यू नो हमें नरूलाज़ का कांट्रेक्ट मिल गया।''

पवन ने अपनी टेबल पर बैठे-बैठे दाँत पीसे। यह बेवकूफ़ लड़की हमेशा ग़लत आदमी से मुख़ातिब रहती है। इसे क्या पता कि चित्रेश की चौबीस तारीख को नौकरी से छुट्टी होने वाली है। उसने दो जंप्स (वेतन वृद्धी) माँगे थे, कंपनी ने उसे जंप आउट करना ही बेहतर समझा। इस समय तलवारें दोनों तरफ़ की तनी हुई हैं। चित्रेश को जवाब मिला नहीं है पर उसे इतना अंदाज़ा है कि मामला कहीं फँस गया है। इसीलिए पिछले हफ़्ते उसने एशियन पेंट्स में इंटरव्यू भी दे दिया। एशियन पेंट्स का एरिया मैनेजर पवन को नरूलाज में मिला था और उससे शान मार रहा था कि तुम्हारी कंपनी छोड़-छोड़ कर लोग हमारे यहाँ आते हैं। पवन ने चित्रेश की सिफ़ारिश कर दी ताकि चित्रेश का जो फ़ायदा होना है वह तो हो, उसकी कंपनी के सिर पर से यह सिरदर्द हटे। वहीं उसे यह भी ख़बर हुई कि नरूलाज में रोज़ बीस सिलेंडर की खपत है। आई.ओ.सी. अपने एजेंट के ज़रिए उन पर दबाव बनाए हुई है कि वे साल भर का अनुबंध उनसे कर लें। गुर्जर गैस ने भी अर्ज़ी लगा रखी है। आई.ओ.सी. की गैस कम दाम की है। संभावना तो यही है बनती है कि उनके एजेंट शाह एंड सेठ अनुबंध पा जाएँगे पर एक चीज़ पर बात अटकी है। कई बार उनके यहाँ माल की सप्लाई ठप्प पड़ जाती है। पब्लिक सेक्टर के सौ पचड़े। कभी कर्मचारियों की हड़ताल तो कभी ट्रक चालकों की शर्तें। इनके मुक़ाबले गुर्जर गैस में माँग और आपूर्ति के बीच ऐसा संतुलन रहता है कि उनका दावा है कि उनका प्रतिष्ठान संतुष्ट उपभोक्ताओं का संसार है।

पवन पांडे को इस नए शहर और अपनी नई नौकरी पर नाज़ हो गया। अब देखिए बिजली चार बजे गई ठीक साढ़े चार बजे आ गई। पूरे शहर को टाइम ज़ोन में बाँट दिया है, सिर्फ़ आधा घंटे के लिए बिजली गुल की जाती है, फिर अगले ज़ोन में आधा घंटा। इस तरह किसी भी क्षेत्र पर ज़ोर नहीं पड़ता। नहीं तो उसके पुराने शहर यानी इलाहाबाद में तो यह आलम था कि अगर बिजली चली गई तो तीन-तीन दिन तक आने के नाम न ले। बिजली जाते ही छोटू कहता, ''भइया ट्रांसफार्मर दुड़िम बोला था, हमने सुना है।'' परीक्षा के दिनों में ही शादी-ब्याह का मौसम होता। जैसे ही मोहल्ले की बिजली पर ज़्यादा ज़ोर पड़ता, बिजली फेल हो जाती। पवन झुँझलाता, ''माँ अभी तीन चैप्टर बाकी हैं, कैसे पढूँ।'' माँ उसकी टेबल के चार कोनों पर चार मोमबत्तियाँ लगा देती और बीच में रख देती, उसकी क़िताब। नए अनुभव की उत्तेजना में पवन, बिजली जाने पर और भी अच्छी तरह पढ़ाई कर डालता।

छोटू इसी बहाने बिजलीघर के चार चक्कर लगा आता। उसे छुटपन से बाज़ार घूमने का चस्का था। घर का फुटकर सौदा लाते, पोस्ट ऑफ़िस, बिजलीघर के चक्कर लगाते यह शौक अब लत में बदल गया था। परीक्षा के दिनों में भी वह कभी नई पेंसिल ख़रीदने के बहाने तो कभी यूनीफार्म इस्तरी करवाने के बहाने घर से ग़ायब रहता। जाते हुए कहता, ''हम अभी आते हैं।'' लेकिन इससे यह न पता चलता कि हज़रत जा कहाँ रहे हैं। जैसे मराठी में, घर से जाते हुए मेहमान यह नहीं कहता कि मैं जा रहा हूँ, वह कहता है 'मी येतो' अर्थात मैं आता हूँ। यहाँ गुजरात में और सुंदर रिवाज है। घर से मेहमान विदा लेता है तो मेज़बान कहते हैं, ''आऊ जो।'' यानी फिर आना।

यह ठीक है कि पवन घर से अठारह सौ किलोमीटर दूर आ गया है। पर एम.बी.ए. के बाद कहीं न कहीं तो उसे जाना ही था। उसके माता पिता अवश्य चाहते थे कि वह वहीं उनके पास रह कर नौकरी करे पर उसने कहा, ''पापा यहाँ मेरे लायक सर्विस कहाँ? यह तो बेरोज़गारों का शहर है। ज़्यादा से ज़्यादा नूरानी तेल की मार्केटिंग मिल जाएगी।'' माँ बाप समझ गए थे कि उनका शिखरचुंबी बेटा कहीं और बसेगा।

फिर यह नौकरी पूरी तरह पवन ने स्वयं ढूँढ़ी थी। एम.बी.ए. अंतिम वर्ष की जनवरी में जो चार पाँच कंपनियाँ उनके संस्थान में आई उनमें भाईलाल भी थी। पवन पहले दिन पहली इंटरव्यू में ही चुन लिया गया। भाईलाल कंपनी ने उसे अपनी एल.पी.जी. यूनिट में प्रशिक्षु सहायक मैनेजर बना लिया। संस्थान का नियम था कि अगर एक नौकरी में छात्र का चयन हो जाए तो वह बाकी के तीन इंटरव्यू नहीं दे सकता। इससे ज़्यादा छात्र लाभान्वित हो रहे थे और कैंपस पर परस्पर स्पर्धा घटी थी। पवन को बाद में यही अफ़सोस रहा कि उसे पता ही नहीं चला कि उसके संस्थान में विप्रो, एपल और बी.पी.सी.एल जैसी कंपनियाँ भी आई थीं। फिलहाल उसे यहाँ कोई शिकायत नहीं थी। अपने अन्य कामयाब साथियों की तरह उसने सोच रखा था कि अगर साल बीतते न बीतते उसे पद और वेतन में उच्चतर ग्रेड नहीं दिया गया तो वह यह कंपनी छोड़ देगा।

सी.पी. रोड चौराहे पर खड़े होके उसने देखा, सामने से शरद जैन जा रहा है। यह एक इत्तफ़ाक़ ही था कि वे दोनों इलाहाबाद में स्कूल से साथ पढ़े और अब दोनों को अहमदाबाद में नौकरी मिली। बीच में दो साल शरद ने आई.ए.एस. की मरीचिका में नष्ट किए, फिर कैपिटेशन फीस दे कर सीधे आई.आई.एम. अहमदाबाद में दाखिल हो गया।
उसने शरद को रोका, ''कहाँ?''
''यार पिज़ा हट चलते हैं, भूख लग रही है।''
वे दोनों पिज़ा हट में जा बैठे। पिज़ा हट हमेशा की तरह लड़के-लड़कियों से गुलज़ार था। पवन ने कूपन लिए और काउंटर पर दे दिए।
शरद ने सकुचाते हुए कहा, ''मैं तो जैन पिज़ा लूँगा। तुम जो चाहे खाओ।''
''रहे तुम वहीं के वहीं साले। पिज़ा खाते हुए भी जैनिज़्म नहीं छोड़ेंगे।''

अहमदाबाद में हर जगह मेनू कार्ड में बाकायदा जैन व्यंजन शामिल रहते जैसे जैन पिज़ा, जैन आमलेट, जैन बर्गर।

पवन खाने के मामले में उन्मुक्त था। उसका मानना था कि हर व्यंजन की एक ख़ासियत होती है। उसे उसी अंदाज़ में खाया जाना चाहिए। उसे संशोधन से चिढ़ थी।
मेनू कार्ड में जैन पिज़ा के आगे उसमें पड़ने वाली चीज़ें का खुलासा भी दिया था, टमाटर, शिमला मिर्च, पत्ता गोभी और तीखी मीठी चटनी।
शरद ने कहा, ''कोई ख़ास फ़र्क तो नहीं है, सिर्फ़ चिकन की चार-पाँच कतरन उसमें नहीं होगी, और क्या?''
''सारी लज़्ज़त तो उन कतरनों की है यार।'' पवन हँसा।
''मैंने एक दो बार कोशिश की पर सफल नहीं हुआ। रात भर लगता रहा जैसे पेट में मुर्गा बोल रहा है कुकडूँकूँ।''
''तुम्हीं जैसों से महात्मा गांधी आज भी साँसें ले रहे हैं। उनके पेट में बकरा में-में करता था।''
शरद ने वेटर को बुला कर पूछा, ''कौन-सा पिज़ा ज़्यादा बिकता है यहाँ।''
''जैन पिज़ा।'' वेटर ने मुसकुराते हुए जवाब दिया।
''देख लिया,'' शरद बोला, ''पवन तुम इसको एप्रिशिएट करो कि सात समंदर पार की डिश का पहले हम भारतीयकरण करते हैं फिर खाते हैं। घर में ममी बेसन का ऐसा लज़ीज़ आमलेट बना कर खिलाती हैं कि अंडा उसके आगे पानी भरे।''
''मैं तो जब से गुजरात आया हूँ बेसन ही खा रहा हूँ। पता है बेसन को यहाँ क्या बोलते हैं? चने का लोट।''

पता नहीं यह जैन धर्म का प्रभाव था या गाँधीवाद का, गुजरात में मांस, मछली और अंडे की दुकानें मुश्किल से देखने में आतीं। होस्टल में रहने के कारण पवन के लिए अंडा भोजन का पर्याय था पर यहाँ सिर्फ़ स्टेशन के आस-पास ही अंडा मिलता। वहीं तली हुई मछली की भी चुनी दुकानें थीं। पर अक्सर मेम नगर से स्टेशन तक आने की और ट्रैफ़िक में फँसने की उसकी इच्छा न होती। तब वह किसी अच्छे रेस्तराँ में सामिष भोजन कर अपनी तलब पूरी करता। 

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