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यू के में हिन्दी(3)

भारतीयों के बीच हिन्दी 

—उषा राजे सक्सेना


न् 1903 में महावीरप्रसाद द्विवेदी जी ने 'सरस्वती' पत्रिका के एक अंक में हिन्दी को परिभाषित करते हुए लिखा था‚ "हिन्दी' शब्द के दो अर्थ हैं एक 'हिन्दुओं की भाषा'; दूसरा 'हिन्द (हिन्दुस्थान) की भाषा'। ये दोनों अर्थ बहुत व्यापक हैं। दोनों ही यह सूचित करते हैं कि इस देश यानी हिन्दुस्तान की प्रधान भाषा हिन्दी है। यदि 'हिन्दी' को हिन्द की भाषा माने तो यह सारे देश (हिन्दुस्तान) की भाषा हुई‚ और यदि इसे हिन्दुओं की भाषा मानें तो भी यह सारे हिन्दुस्तान की भाषा हुई।' इकबाल साहब ने 'हिन्दी तराना' में ठीक ही कहा है— हिन्दी है हम‚ वतन है हिन्दोस्तां हमारा'

आज यदि देखा जाए तो भारत का कोई भी कोना ऐसा नहीं है (भारत ही क्यों विश्व का कोई कोना ऐसा नहीं है) जहां हिन्दी किसी न किसी रूप में बोली या समझी न जाती हो। सैद्धांतिकरूप से देखने में भारत हिन्दीबहुल देश दीखता है किन्तु आज भी हिन्दी अंग्रेज़ी के दबाव में है। भारत में हिन्दी की जो स्थिति है वह विदेशों में भी हिन्दी की स्थिति को प्रभावित करती है। यूनिस्को के प्रतिनिधि आशर डिलियन के अनुसार 1999 में 'मशीन ट्रान्सलेशन सम्मिट 1999' जापान के प्रो. होजमी तनाका ने अपने अध्यक्षीय भाषणमें कहा था कि जनसंख्या के अनुसार विश्व में चीनी भाषा प्रथम है‚ हिन्दी दूसरे स्थान पर और अंग्रेज़ी तीसरे स्थान पर है। लेकिन हिन्दी भारत में ही अपना सही स्थान (राज भाषा और राष्ट्र भाषा का) नही बना पा रही है फिर हम विश्व के स्तर पर कहां और कैसे शुरू करें? संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में अंग्रेज़ी का एक पत्र तो अनिवार्य है किन्तु हिन्दी की अनिवार्यता नहीं है। इस तरह हिन्दी पढ़ने की अनिवार्यता नहीं रहेगी किन्तु अंग्रेज़ी पढ़ने की अनिवार्यता बनी रहेगी और अंग्रेज़ी की वर्चस्वता बनी रहेगी। इस तरह के परिवेश में पला हुआ भारतीय जब यू के पहुंचता है तो वह हिन्दी के विकास कार्य से सीधा नहीं जुड़ पाता है।

आज तक हिन्दी शिक्षण ब्रिटेन में सुचारू रूप न हो पाने के कुछ और भी कारण हैं—

30 नवम्बर 1961 से पूर्व ब्रिटेन में 'कामनवेल्थ' देशों से आने के लिए कोई वीसा या परमिट नहीं था। अतः 50वीं दशक के अंतिम चरण और 60वीं दशक के आरम्भ मे भारतीय पंजाबी सिख एक बहुत बड़ी संख्या में ईटों के भट्टों‚ कारखानों‚ तथा अन्य प्रकार के श्रमिक जैसे बढ़ई‚ राज, मिस्त्री, बस–कंडक्टर‚ पोस्टमैन‚ सफाईर्कर्मचारी आदि ब्रिटेन में भारत से जत्थे के जत्थे आने शुरू हो गए थे जिनकी भाषा पंजाबी थी। इन श्रमिकों के परिवार बड़े और संयुक्त थे। इन्होंने यहां आते ही अपनी मानसिक और सांस्कृतिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए साउथहॉल‚ ईस्टलंदन‚ वुलवरहैम्पटन‚ बरमिंघम‚ मैनचेस्टर‚ ग्लास्गो आदि जैसे उद्योग–धंधों और व्यापारिक संभावनाओं वाली जगहों पर घर्रपरिवार‚ गुरद्वारा आदि जमाते–बनाते हुए ऐसे समाज की संरचना की जिसमें स्वतंत्ररूप से स्वदेशी ढंग से रहते हुए अधिक से अधिक धनोपार्जन की सुविधा हो सके। अपने बाल बच्चों को अंग्रेज़यित से बचा कर रखने में ही वे सलामती मानते थे। पेट में रोटी पड़ रही है थैली में पैसे आ रहे हैं यही उनका सबसे बड़ा सुख था। गुरद्वारे में उनके बच्चोंं को गुरमुखी ग्रंथ साहब के पाठ के लिए अवश्य सिखाई जाती थी, जो उनके धार्मिक परिवेश के अनुकूल थी।

इन सीधे–साधे श्रमजीवियों को अंगे्रज़ी भाषा न आना‚ अंग्रेज़ों के लिए अच्छा खा़सा सिर दर्द बन गया। जल्दी ही अंग्रेज़ी सरकार ने अनुभव किया कि ये प्रवासी बीमार पड़ने पर अपने अंग्रेज़ डा. से संप्रेषण नहीं कर पा रहे हैं‚ इनके बच्चे स्कूलों शिक्षकों और साथियों से संप्रेषण न कर पाने के कारण पढ़ाई में पीछे रह जा रहे हैं। उन्होंने देखा संप्रेषण न होने के कारण समाज में तनाव भी बढ़ रहा है साथ ही एशियन इमिग्रेंट परिवार परिवेश‚ भाषा और मानसिकता के कारण असुविधा‚ अलगाव व उत्पीड़न का जीवन व्यतीत कर रहा हैं। अतः उन्हों ने 60वीं के दशक में डाक्टरों‚ नर्सों और टीचरों को एक सीमित संख्या में कड़े नियंत्रण के साथ ब्रिटेन में आने का अनौपचारिक निमंत्रण दिया। 

इस बार भारत से साक्षर और पढ़ा लिखा हिन्दी के साथ विभिन्न भाषा भाषियों का तबका आया जो हिन्दी बोलता और समझता था। इन लोगों का आगमन ब्रिटेन में सन् 1960 के अंतिम चरण में आरम्भ हुआ। ये हिन्दी भाषी अंग्रज़ीदां बुद्धिजीवी डाक्टर‚ एकाउंटेन्ट‚ शिक्षक और इंजीनियर आदि थे जो अपने को उच्च वर्ग का समझते थे और पहले आए हुए श्रमजीवियों से दूरी बनाए रखना चाहते थे। इस तरह ये प्रवासी भारतीय हर तरह के अलगाव और विभाजन की मानसिकता अपने साथ लेकर आए अंग्रेज़ी साहबी जीवन की आकांक्षा के साथ… यानी अंग्रेज़ों के वे मानस पुत्र जिनके मस्तिष्क में अंग्रेजी पहले से ही श्रेष्ठता की छवि बनाए हुए थी। इनके रिहाइश के स्थान दूर–दूर थे। यानी ये लोग अपनी विशेष बस्तियां बनाने में रूचि नहीं रखते थे। ये प्रोफेशनल भारतीय छिटपुट यहार्ंवहां अंग्रेजों के बीच समृद्ध इलाकों में रहने लगे‚ जहांॅ इनको अपने प्रोफेशन की नौकरी मिली। इन्हें अंग्रेज़ी भलीभांति आती थी और ये बहुत महत्वाकांक्षी थे। इन्होंने पाया कि ब्रिटेन में पांव जमाने के लिए इनके बच्चों को स्थानीय अंग्रेज़ बच्चों से प्रतिद्वदिता करनी होगी, अतः ये लोग अपने घरों में बच्चों के अंग्रेज़ी बोलने लगे। इस समय तक इंग्लैंण्ड एक भाषा और एक संस्कृति वाला देश था। 

उस समय हिन्दी के पठन–पाठन का विचार बहुत ही कम लोगों के मन में आया। कुछ हिन्दी प्रेमी बच्चों को थोड़ी बहुत हिन्दी घर या मंदिरों में पढ़ाते रहे। दुर्भाग्यवश उन दिनों ब्रिटेन की शिक्षिकाएं भी बच्चों के अभिवाविकों को राय देती थीं कि यदि आप अपने बच्चों से घर पर अपनी भाषा में बोलेंगे तो बच्चा स्कूल में अंग्रेज़ी पूरे अधिकार से नहीं बोल पाऐगा और इसका असर उनके परीक्षाफल पर पड़ेगा। चूंकि ये महत्वाकांक्षी माता–पिता किसी तरह का कोई खतरा मोल नहीं लेना चाह रहे थे। अतः उन्होंने घर पर अंग्रेज़ी बोलना ही उचित समझा।

यह भी सहज और स्वाभाविक है कि जिस देश में आप रहते हैं उस देश की काम–काजी भाषा हर किसी को आनी आश्यक होती है। अतः अंग्रेजी न आना यहां भी एक तरह से पिछड़ेपन की निशानी हो गई। हर कोई सबसे पहले अपनी अंग्रेजी को ही तराशना चाहता था। बच्चों के साथ अंग्रेज़ी बोलने से एक पंथ दो काज सिद्ध होते थे। काांनवेल्थ इंस्टीट्यूट में उन दिनों वयस्को के लिए 'हाउ टु स्पीक गुड इंगलिश' की कक्षा लगती थी। शाम को बहुत से सजग माता–पिता इन कक्षाओं में जाते थे। अतः धीरे धीरे हिन्दी परिवारों से  हिन्दी सहज ही लुप्त होने लगी। 

उन दिनों यदि कोई हिन्दी बोलता या पढ़ता तो वह अपने शयन कक्ष में अथवा घर के अंदर। सार्वजनिक स्थलों पर हिन्दी बोलने में लोगों को लज्जा सी आती थी। अंग्रेज़ों को भी उन दिनों सार्वजनिक स्थलों में सिवाए अंग्रेज़ी के और कोई भाषा सुनने की आदत नहीं थी अतः सार्वजनिक स्थलों पर किसी और भाषा में बोलना अशिष्ट माना जाता था। 

आज समय बदल चुका है। इंग्लैण्ड में सभी विदेशी भाषाएं खुल कर सार्वजनिक स्थानों पर बोली जाती है। सन् 2002 में हिन्दी समिति के निमंत्रण पर लंदन आए प्रसिद्ध साहित्यकार कमलेेश्वर जी जब स्ट्रेथम में खरीदारी कर रहे थे तो दुकानदार ने उनका सामान पैक करते अंॅग्रेज़ी में कहा‚ 
'तुम भारतीय हो‚ मुझे भारतीय पसंद हैं इसलिए मै तुम्हें दस प्रतिशत का छूट देता हूं।' 
'ओह! तुम्हें हिन्दी आती है क्या?' कमलेश्वर जी ने छूटते ही पूछा
'नहीं‚ इतनी तो नहीं आती। मैं इज़राइल का हूं। हम हिन्दी फ़िल्में देखते है।'
मैंने फिर कमलेश्वर जी का साहित्यिक परिचय तथा उनके फ़िल्मो का परिचय उसे दिया तेा उसने उन्हें सामान और सस्ते दर पर दिया।

चलते समय कमलेश्वर जी कहने भी लगे कि इस बार तो लंदन यात्रा में अंग्रेज़ी बोलने के अवसर ही नहीं मिले। है न मज़ेदार बात! 

बहरहाल सातवी दशक के अंत में ईस्ट अफ्रीका से इदी आमीन द्वारा खदेड़े गए ईस्ट अफ्रीकन भारतीय ब्रिटेन आए जो अपने आप को भारतीय नहीं 'ईस्ट अफ्रीकन एशियन' कहतेे थे। उनके लिए ब्रिटेन में पहले से रह रहे प्रवासी भारतीय जो भारत से सीधे आए थे 'गवांडे' थे यानी गंवार थे। वे उन्हे अपने समकक्ष नहीं मानते थे और उनसे रोटी–बेटी का रिश्ता भी नहीं करते थे। ईस्ट अफ्रीकन प्रवासी भारतीयों के पास अच्छी बोलचाल वाली अंग्रेज़ी भाषा के साथ व्यापार के लिए पैसा था‚ जो वो अपने साथ ईस्ट अफ्रीका से लाए थे। उन्होंने पैसे के बल पर न्यूज़ एजेन्ट‚ फारमेसी‚ और पोस्ट ऑफिस आदि का व्यापार अंग्रेज़ों से अपने हाथ में ले लिया। चूंकि उनकी अंगे्रज़ी की पकड़ आम प्रवासी भारतीयो से अच्छी थी अतः वे अपने आपको अंगेज़ों के क़रीब समझते थे। सत्तर‚ अस्सी और नब्बे के दशकों में भारतीय चेहरे ब्रिटिश समाज के हर तबके में दिखने ही नहीं छाने भी लग गए। अंग्रेज़ों को प्रवासी भारतीयों के आपसी अलगाव यानी ख़ेमें कोई माइने नहीं रखते थे हर भूरी चमड़ी उसके लिए इंडियन होता था। फलतः आठवी और नवीं दशक तक ईस्ट अफ्रीकन एशियन और प्रवासी भारतीय समाज आवश्यकतानुसार एक मंच पर आने लगे। यह वह समय था जब ब्रिटेन में ईस्ट अफ्रीकन प्रवासियों के आने से भूरी चमड़ी की सकारात्मक शक्ति बृहतरूप में नज़र आने लगी। जो बाद में कल्याणकारी सिद्ध हुई। 

हम यदि तुलनात्मक दृष्टि से देखे तो ब्रिटेन में हिन्दीभाषी अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना बहुत कम हैं और जो हैं वे भी असंगठित और सामंती जीवन के आदी हैं। फिर भी यू.के. के तकरीबन सभी प्रवासी भारतवंशियों की संपर्क भाषा पहले नम्बर पर अंग्रेज़ी और दूसरे नम्बर पर हिन्दी ही रही। वैसे भी भारत की लगभग सभी बोलियों के व्याकरण और मूल शब्द आपस में काफ़ी मिलते–जुलते से है। पहली पीढ़ी के गुजराती और पंजाबी बोलने वाले भी हिन्दी बोल लेते हैं क्यों कि वे हिन्दी फिल्में देखते हैं हिन्दी गाने सुनते और गाते हैं। आज जब कभी हिन्दी का कोई उत्सव होता है तो लगभग सभी भारतवंशी समानरूप से अपनी रूचि के अनुसार उसमें भाग लेते है या लेने का प्रयास करते हैं। बीसवीं सदी के अंतिम चरण से तकरीबन सभी प्रवासी भारतीय अनौपचारिकरूप से सामाजिक उत्सवों‚ त्योहारों आदि पर विभिन्न एसोसिएशन‚ सोसाइटी‚ भाषा समिति‚ हिन्दी समिति और अन्य हिन्दी संस्थाओं के झंडे के तले एकत्रित होने लगे हैं। 

इस सुखद संयोजन के बावजूद हिन्दी के पठन–पाठन और लेखन में प्रवासी भारतीयो की नई पीढ़ी के साथ बहुत समस्याएं हैं। ये समस्याए मनोवैज्ञानिक‚ सामाजिक और राजनैतिक तीनों ही स्तर पर हैं। अंग्रेज़ी की प्रभावशाली शिक्षा–पद्धति‚ परिस्थितियां‚ परिवेश‚ सामाजिक गठन‚ स्वार्थी‚ असहिष्णु राजनीति‚ वैश्वीकरण‚ व्यक्तिगत महत्वकांक्षाएं‚ प्रवास की जटिल विषमताएं‚ नस्लभेद‚ रंगभेद‚ और सबसे बढ़कर सदियों पुरानी अंग्रेज़ी के वर्चस्व की मानसिक गुलामी और घर के अंदर की दोहरी सभ्यता हिन्दी के अस्तित्व को लुप्तप्रायः करने में समर्थ मालूम होते है। 

वस्तुतः प्रवासी भारतीयों के घरों में (विभिन्न करणों र्से विशेष कर पितृसत्ता और रोज़ीरोटी के कारण) जीवन के दोहरे मानदंण्ड के साथ दोहरी सभ्यता विकसित हुई और इसके दबाव और 'कन्फ्यूज़न' ने भी नई पीढ़ी को हिन्दी के पठनपाठन और लेखन से विमुख कर रखा है। यद्यपि अन्य सभी क्षेत्रों में हमारी नई पीढ़ी तीव्र गति से आगे बढ़ रही है परंतु हिन्दी के पठनपाठन के क्षेत्र में अभी भी उदासीनता है। ब्रिटेन के हर क्षेत्र में भारतीय अपना महत्वपूर्ण स्थान बना रहे है। देखा जाए तो ब्रिटेन में प्रतिवर्ष 80 प्रतिशत एशियाई मूल के छात्र उच्च शिक्षा प्राप्त करते है और उनमें श्रेष्ठतम उपलब्धि भारतीय छात्रों की होती है। आज पूरे ब्रिटेन में व्यापार और हाईर्फ़ाई व्यवसाय में उच्चस्थ पदों पर भारतीय छाए हुए है। डाक्टर‚ चार्टेड एकाउंटेंन्ट‚ एडवोकेट‚ फ़ार्मेसिस्ट‚ व्यापार तथा ब्रिटिश सिविल सर्विस जैसे हर क्षेत्र में सफल भारतीय चेहरे बड़ी तादाद में नज़र आते है। 

यू.के. के आप्रवासी भारतीयों की नई पीढ़ी की समस्या फिजी‚ त्रिनिदाद‚ सूरीनाम और मॉरिशस के भारतवंशियों से भिन्न है। यू.के. के भारतवंशी धन‚ सुविधा और अच्छे जीवनस्तर के लिए अपनी इच्छा से देश को छोड़ कर यहां आए थे। पाश्चात्य जीवनस्तर‚ विपुल धन संचयन और सुविधा ही उनका लक्ष्य था। ब्रिटेन के प्रवासी भारतीयों ने यहां लक्ष्मी जी की ऐसी कृपा पाई कि उन्हें पीछे पलट कर देखने की आवश्यकता नहीं पड़ी। हां जब धन धान्य और सब सुख उन्हें मिल गया तो जड़ों की ओर लौटने की भी सुधि आई और तभी भाषा और संस्कृति की भी याद आई।

बहुत से नई पीढ़ी के युवा अंॅग्रेज़ी के वर्चस्व के कारण हीनग्रन्थि‚ सूक्ष्म रंगभेद एवं इंसटीट्यूशनल रेसिज़म से लड़ने के लिए श्वेत जीवनसाथी चुन लेते है‚ और ऐसा समझते है कि अंग्रेज़ जीवन साथी उन्हें ब्रिटिश समाज की बुनावट को समझने‚ और उसमें प्रवेश करने में अच्छी सुविधाएं मुहैया करा सकते है। कई ऐसे प्रयोग सफल भी होते हैं। मिक्स मैरिजेज़ भी इस तरह हिन्दी के पठनपाठन के बीच रोड़ा बन जाता हैं। यूं भी इंग्लैंण्ड में अभी भी कई ऐेसेे व्यवसाय हैं जिनमेें प्रवासियों का प्रवेश नहीं हुआ है। ऐसे व्यवसाय में प्रवेश पाने और स्थान बनाने के लिए युवकवर्ग शॉर्टकट के लिए स्थानीय यानी अंग्रेज़ जीवनसाथी का चुनाव जाने अनजाने कर लेता है। फलतः अंग्रेज़ जीवनसाथी के साथ उनकी भाषा एवं सभ्यता सहज ही उस देश की हो जाती है जिस देश में वे जन्म लेते है रहते है और जिस देश का उनका जीवन साथी है। अतः इस तरह के परिवार में भारतीय सभ्यता और भाषा दोनों का विलय ब्रिटेन के प्रभावशाली भाषा और संस्कृति में हो जाता है। 

यूं बहुत से प्रवासी ग़ैरकानूनी भारतीय नौजवान मात्र बर्तानिया की नागरिकता पाने के लिए भी 'मिक्समैरिज' कर लेते हैं। ऐसे विवाह अधिकांश सुविधा के लिए होते है। और फिर यही सुविधा उनके जीवन में वंशानुगत जड़ों से यानी भाषा एवं संस्कृति से कट जाने की जीवंत कड़ी भी बन जाती है। पुरानी पीढ़ी के प्रवासी भारतीयों के मन में बच्चों को अपनी भाषा सिखानेपढ़ाने की ललक इसलिए रही है कि बच्चे जब भारत जाएंगे तो दादा दादी और ताया चाचा के बच्चों से सहजता से हिन्दी में संप्रेषण कर सकेंगे! पर अब वह ललक नहीं रही इसलिए कि भारत में अब पहले से भी कहीं अधिक अंग्रेज़ी का बोलबाला है। तक़रीबन सभी बच्चेबूढ़े नौजवान अंग्रेज़ी से वाक़िफ है जो अपनेआप में अच्छी बात भी है। परन्तु इसके कारण वह अपने आप को 'इलीट'‚ पढ़ा लिखा और समृद्ध समझे‚ और उससे हीन ग्रंथी पनपे यह नादानी और चिंता की भी बात है। 

ब्रिटेन में मातृभाषा की स्थिति सजग प्रवासियों के लिए सदा से चिंता का विषय रहा है। सामान्यरूप से आज भी हिन्दी बहुत से लोगों के लिए कम पढ़ेलिखे और औरतों की भाषा है जिसे प्रवासी पीछे छोड़ आया था। हीन ग्रंथियों के कारण कम ही भारतीय ऐसे हैं जो गर्व से कहते है कि उनके बच्चों को हिन्दी आती है। अधिकांश यही कहते सुने गए है ओह! हमारे बच्चे को हिन्दी नहीं आती है‚ या आती तो है पर बोलते नहीं है या बच्चे हिन्दी समझ तो लेते है पर बोलने में शर्माते हैं। सच बात तो ये है कि बच्चे हिन्दी में कहे गए शब्दों के केवल भावार्थ ही समझ पाते हैं अतः उत्तर अंग्रेज़ी में देते है। हिन्दी के एक दो वाक्य समझ लेना हिन्दी जानना नहीं है। हिन्दी का शब्द भंडार अत्यंत विशाल और विस्तृत है। किंतु इन सब के पीछे अभिवावकों की उदासीनता‚ अंग्रेज़ी को आवश्यकता से अधिक महत्व देना और उनका अति समृद्ध स्वार्थी समाज ही कारक है।

बहरहाल कुछ बच्चों को भारत आनेजाने से और भारतीय फ़िल्में देखने से थोड़ी बहुत टूटीफूटी देसी भाषा आ ही जाती है। अब रही पढ़ने की बात वह तो बहुत मुश्किल है। फिर भी इंग्लैंड में बच्चों को मातृभाषा पढ़ाई जाती है। मुट्ठी भर प्रतिबद्ध संस्कारी लोग सप्ताहांत पर मंदिरों‚ घरों और स्कूलोें आदि में बच्चों को देसी भाषाऐं पढ़ाने की सुविधा उपलब्ध कराते है। भारतीय बच्चों के साथ कई अंग्रेज़ युवक­युवतियाँ भी बड़ी प्रतिबद्धता के साथ भारतीय भाषाएं पढ़ते है। हिन्दीभाषी परिवारों में हिन्दी पढ़ने के प्रति कुछ विशेष उत्साह नहीं है। अधिकांश मार्ँबाप प्रयास करके बच्चों को स्थानीय केन्द्रों में ले जाते है। कुछ बच्चे तो जल्दी ही हार मान लेते है कि पूर्वजों की भाषा हिन्दी के पढ़ने से कुछ मिलनामिलाना तो है नहीं फिर उसको पढ़ने में समय क्यों गवांया जाए। यानी उनके मन में मातृभाषा के लिए कोई सम्मान या संस्कार नहीं है बस मार्ँबाप के दबाव से सप्ताहांत की कक्षा में हाज़री लगा देते हैं। हिन्दी आज भी अपना भावनात्मक और कामकाजी महत्व नहीं बना पाई है यानी हिन्दी कामगरी‚ दफ्तरी और रोज़ीरोटी से नहीं जुड़ सकी। इस के लिए कौन जिम्मेदार है?

ब्रिटेन के घरों में मातापिता स्वयं हीनग्रंथि के कारण भाषाओं की खिचड़ी करते हुए अंग्रेज़ी में ही बच्चों से संप्रेषण करते हैं। अतः बच्चे पूर्ण हिन्दी और समृद्ध वाक्यविन्यास से परिचित नहीं हो पाते हैं। प्रवास में रह रहे मातापिता अपने कार्यव्यवहार से भी मातृभाषा के प्रति वह सम्मान नहीं प्रगट करते है जो बच्चों के मन में हिन्दी भाषा के प्रति प्रेम जगाए साथ ही यह भी कहना अनुचित नहीं होगा कि हिन्दी सीखने के लिए यहां सही परिवेश और उपयोगिता नहीं हैं परंतु फिर भी हिन्दी प्रेमियों के प्रयास जारी हैं।

वस्तुतः यह दुःख की बात है कि हमारी मातृभाषा हिन्दी का कामकाज़ी मूल्य देश एवं विदेश में नहीं के बराबर ही होता जा रहा है। यदि हिन्दी रोज़गार देने में असमर्थ है तो इस उपभोक्ता संस्कृति और बाजारीकरण के माहौल में वह आम आदमी को फालतू ही प्रतीत होती है। हिन्दीे सीखना इस रैट रेस के ज़माने में आम आदमी को समय का दुरूपयोग ही लगता है। अधिकांशतः श्वेतवर्ण के लोगों के लिए अब हिन्दी‚ हिन्दुस्तानियों की पहचान नहीं है बल्कि वह सिमट कर साड़ी‚ समोसा और संगीत पर अटक गई हैं। इस तरह हम भाषा संस्कृति और जड़ों से कईर्कई दिशाओं में कट रहे है। 

ब्रिटेन अब तक एक भाषा वाला देश रहा है मुख्यधारा के स्कूलों में अभी तक कोई अन्य भाषा नहीं पढ़ाई जाती थी। पिछले दो दशको से मुख्यधारा के स्कूलाें में अन्य भाषाओं (कम्यूनिटी लैगुएज) के पढ़ाने की व्यवस्था संख्या के आधार पर की गई‚ परंतु इसमें भी गुजराती‚ पंजाबी और उर्दू को ही प्रमुखता मिल सकी क्योंकि हिन्दी भाषी एक जगह नहीं बसे हैैं। हिन्दीभाषी ब्रिटेन के विभिन्न भागों में बिखरे छितरे है। हिन्दी छात्रों की संख्या आम स्कूलों में तकरीबन ना के बराबर है। 

फिर भी कुछ हिन्दी प्रेमी छात्र समय समय पर मातृभाषा में सीनियर कैम्ब्रिज या लंदन बोर्ड की परीक्षा छिटपुट प्राइवेट संस्थाओं से देते रहे है और पास भी होते रहे है। नौकरी के लिए भी अन्य विषयों की तरह ही मातृभाषा हिन्दी की जी.सी.एस.सी. यानी हाई स्कूल एवं 'ए' लेवेल यानी इंटरमीडिएट की वही मान्यता है जो अन्य विषयों की है पर छात्र एवं उनके माता पिता हिन्दी को अन्य विषयों के समकक्ष एक विषय न मान कर स्वयं ही उसका अवमूल्यन करते हैं। देखा जाए तो इस अर्थ में हिन्दीभाषा की रोज़गारी प्रासंॅागिकता है किन्तु हमारी अज्ञानी‚ बाजारी ओछी और संकीर्ण मनोवृति ही उसे रोज़गारी की प्रासांगिकता से जोड़ने नहीं दे रही है। यद्यपि आज भी ब्रिटिश समाज में कोर्ट में‚ अस्पताल में और पुलिस व्यवस्था में हिन्दी के अनुवादक और दुभाषिये की आवश्यकता होती है। कई अन्य नौकरियों के साक्षात्कार में देसी समुदाय की भाषा जानना लाभकारी और आवश्यक पाया गया हैं। 

कुछ सजग‚ अत्यंत सचेत प्रवासी मातापिता घर में नन्हें बच्चों से हिन्दी में संवाद स्थापित करने का सायास प्रयास करते हैं। परंतु ये बच्चे भी प्राइमरी शिक्षा समाप्त करते करते सहज ही परिवेशानुसार अंग्रेज़ी में जवाब देना सुविधाजनक पाते है औरः धीरे धीरे अधिकांश हिन्दीभाषी अंग्रेज़ी के वर्चस्व को ही समर्पित हो जाते है। हिन्दी भाषाभाषियों की संख्या बर्तानियॉ में इतनी कम है कि उसके प्रयोग के अवसर समाजिक रूप से बहुत कम मिलते हैं और यदि मिलते भी है तो पहली मुलाकात में औपचारिक भाषा अंग्रेजी का ही प्रयोग उचित समझा जाता है। परिचय के बाद अधिकाशतः औपचारिक भाषा का स्थान आत्मीय भाषा हिन्दी ले लेती है‚ जो एक अच्छी बात है। 

इंग्लैण्ड के सभी स्थानीय पुस्तकालयों के एथनिक विभाग में मातृभाषा की पुस्तकें आपको मिल जाएंगी। जहाँ तक पढ़नेपढ़ाने की बात है हिन्दी की रीडरशिप बहुत कम है कारण बताने की आवश्कता नहीं है। भारत के बड़े शहर एवं समृद्धवर्ग स्वयं उस स्थिति से गुज़र रहे है। पुस्तकालयों में पुस्तकों का चयन लाइब्रेरियन करता है। किस तरह की किताबों का चयन होता है‚ वह लाइब्रेरियन की योग्यता और रूचि पर आधारित होता है। किन्तु यदि रीडरयिप ही नहीं है तो लाइब्रेरी में हिन्दी की किताबों का रखना अर्थशास्त्र के अनुकूल नहीं बैठता है। फिर भी हिन्दी की पुस्तकें इग्लैंण्ड के हर पुस्तकालय में आपको मिल जाएंगी‚ हांलांकि उनके पढ़नेवालों की संख्या शून्य बराबर है।

लंदन के इंडियाऑफ़िस लाइब्रेरी किंग्सक्रॉस में भारत की वे सब प्राचीन और मध्ययुगीन पुस्तकें मिल जाएंगी जिनकी अन्य समकालीन पुस्तकों को भारत में दीमक चाट गई है। पुस्तकों की सुरक्षा और रखरखाव को ध्यान में रखते हुए प्राचीन एवं अमूल्य पुस्तकों को यू.के. की इस लाइब्रेरी ने उन्हें माइक्रो फ़िल्म पर ट्रांस्फ़र कर दिया है। मेरे अपने बड़े पितामह सूफ़ी संत महर्षी शिवब्रत लाल जी की 2‚500 पुस्तकों में से तकरीबन 700 पुस्तके, जिसमें कबीर बीजक पर टिप्पणी भी है, अब भारत में कहीं भी उपलब्ध नहीं है‚ पर यहां मिल जाऐगी। है न मज़ेदार बात! देशविदेश से ह़ज़ारों हिन्दी एवं संस्कृत के विद्वान यहां से प्रामाणिक सामग्री शोध के लिए ले जाते हैं। आज भी इंडिया ऑफ़िस लाइब्रेरी भारत से बड़ी संख्या में पुस्तकें मंगाता है।

जिन अंगे्रज़ों ने हम पर दो सौ साल राज्य किया हमारी सभ्यता संस्कृति और भाषा को दबाया कुचला और उसे खत्म करने के लिए मैकाले शिक्षा पद्धति का आविष्कार किया वहीं अंग्रेज़ आज यू.के. में हम भारतीयों को अपनी भाषा‚ संस्कृति और सभ्यता को बचाए रखने के लिए सामाजिक स्तर पर (एथनिक माइनॉरिटी को) सुविधा‚ धन और स्थान मुहैया भी करा रहे है पर हम भारतीय अपनी संकीर्ण साम्प्रदायिक और ओछे मनोवृतियों के कारण अधिकांश सुविधाओं का दुरूपयोग कर रहे हैं। 

आज इंग्लैंण्ड में पचास से ऊपर के उम्र वाले भारतीय नागरिकों की संख्या काफ़ी तादाद में है। उन्हीं में से कुछ सजग लोग नई पीढ़ी के साथ सब कुछ खोने के बाद उसे फिर से पाने के लिए छटपटा रहे है। आज भाषा और संस्कृति को बचाने का जो प्रयास यहाँ हो रहा है उससे बड़ी आशा बंॅधती है। प्रसन्नता की बात यह है कि आज ब्रिटेन में यू.के हिन्दी समिति‚ गीतांजलि बहुभाषीय समुदाय‚ कथा यू.के. कृति यू.के. आर्य समाज‚ विश्व हिन्दू मंदिर‚ इंडियन कम्यूनिटी संन्टर‚ सनातन धर्म स्कूल आदि जैसी स्वैक्षिक संस्थाए ज़ोरशोर से हिन्दी के प्रचार–प्रसार एवं शिक्षण में अपने–अपने ढंग से लगी हुई हैं। सुख की बात है यह है कि भारतीय दूतावास उन्हें समय–समय पर अपना पूरा सहयोग दे रहा है।

वस्तुतः भारतीय उच्चयोग में प्रारम्भ से ही ब्रिटेन में भारत से आए अधिकारियों के बच्चों और अहिन्दी भाषी वयस्कों के लिए हिन्दी की कक्षाएं आयोजित की जाती रही हैं। 70 के दशक में श्री धमेंन्द्र गौतम का नाम इसी संर्दभ में आता हैं। सन् 1984 से हिन्दी प्रचार प्रसार नीति के तहत भारत से हिन्दी अधिकारी चयनित हो कर ब्रिटेन आने शुरू हुए। इन हिन्दी अधिकारियों ने समय समय पर ब्रिटेन में चल रही हिन्दी की स्वयंसेवी संस्थाओं से सम्पर्क किया तथा उनके कायरे में रूचि ली जिससे ब्रिटेन में काम करती इन स्वयंसेवी संस्थाओं को प्रेरणा और बल मिला। वर्तमान में ब्रिटेन में हिन्दी एवं भारतीय संस्कृति समन्वय का कार्य भारत के विदेश मंत्रालय के हिन्दी विभाग द्वारा किया जाता है। जिससे ब्रिटेन में हिन्दी के उन्नयन में संलग्न लोगों का मनोबल बढ़ता है। 

हिन्दी शिक्षण यदि आज ब्रिटेन में गतिमान है तो वह है उन स्वयंसेवी अध्यापकों के अथक प्रयासों से जिन्हें लोग जानते भी नहीं है। ऐसे निस्वार्थ और कर्तव्यनिष्ठ हिन्दी शिक्षको ने हिन्दी शिक्षा की मशाल को घरों‚ मंदिरों‚ सप्ताहांत स्कूलों‚ सोसाइटी हॉल और इंडियन एसोसिएशन में हर विरोधी स्थिति में जलाए रखा। इन लोगों ने हर दशक में घरघर जा कर बच्चों को इकटठा कर उनके अंदर हिन्दी के प्रति प्रेम और आदर जगाने के लिए तरहतरह के पापड़ बेले हैं।

ऐसे शिक्षकों को आदर देने के लिए कुछ नाम मैं यहां लेना चाहूंगी‚ जैसे गलास्गो की स्वर्गीया बाला भसीन‚ नॉटिघंम के बैकुंठनाथ शर्मा‚ लंदन के राम दास गुप्ता‚ वेद मोहला‚ सुदर्शन मोहिन्द्रा‚ राजेन्द्र चोपड़ा आदि। ये वे लोग हैं जिन्होंने अपना सारा जीवन ही हिन्दी शिक्षण और भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार को समर्पित कर दिया। 

इन शिक्षकों के पास 7वें और 8वें दशक में न तो कोई पाठ्यक्रम था न ही पुस्तकें। उस समय फोटो कॉपी की भी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी। ऐसे प्रतिबद्ध अध्यापक उस समय हस्तलिखित पुस्तकों और अपने बनाए पाठ्यक्रमों से बच्चों को पढ़ाते थे। एक तरफ़ स्थानीय स्कूलों में अतिसाधन सम्पन्न अंग्रेज़ीशिक्षा दूसरी तरफ़ साधन विहीन मध्य­युगीन हिन्दीशिक्षा बालकों का मन लगे तो कैसे? प्रशिक्षण न होने के कारण ये प्रतिबद्ध हिन्दी शिक्षक (इन शिक्षकों के पास कोई प्रशिक्षण नही था) अभी तक यह भी नहीं समझ पाए थे कि इन बालकों को हिन्दी द्वितीय भाषा की तरह पढ़ाई जानी चाहिए। परिवेशानुसार इन बच्चो की प्रथम भाषा हिन्दी नहीं अंग्रज़ी हो चुकी होती है। वस्तुतः ब्रिटेन‚ अमेरिकी और योरापीयन विद्यार्थियों की भाषाई आवश्यकताएंॅ और समझ‚ भारत‚ खाड़ी और लैटिन अमेरिकन देशों के विद्यार्थियों से भिन्न होती हैं।

इसी संदर्भ के अंतरगत मैं आप लोगों को ब्रिटेन की कुछ छोटीबड़ी महत्वपूर्ण हिन्दी शिक्षण संस्थाओं से परिचय करना मैं आवश्यक समझती हूं। जैसे‚ भारतीय विद्याभवन‚ महालक्ष्मी मंदिर‚ ईलिंग आर्यसमाज‚ हिन्दू कल्चरल सोसाईटी फ़िन्चले‚ हिन्दू कल्चरल सोसाइटी स्लाओ‚ हिन्दी बाल भवन‚ हिन्दू सोसाइटी टूटिंर्गलंदन‚ कला निकेतन नॉटिंघम‚ भारतीय विद्याभवन मैन्चेस्टर‚ गीताभवन लेस्टर‚ दुर्र्गाभवन रंडेल‚ श्रीलैण्ड लैंगुज कॉलेज‚ पार्कहॉल स्कूल‚ श्री कृष्ण मंदिर वुल्वरहैम्पटन‚ हिर्न्दूसमाज मंदिर र्रेडिंग आदि

70–80 के दशक के मध्य में जब प्रवासियों की दूसरी पीढ़ियां बड़ी संख्या में स्कूलों में आने लगीं तो अंॅग्रेज़ी सरकार के शिक्षाविदों को महसूस हुआ कि इंग्लैण्ड धीरे धीरे बहुसांस्कृतिक और बहुभाषीय देश होता जा रहा है। अतः उस समय की शिक्षामं़त्री श्रीमती थैचर ने ब्रिटिश शिक्षा पद्धति में मौलिक सुधार का प्रयास किया। उस समय के 'स्वान रिपोर्ट' और 'बुलक रिपोर्ट' के सर्वे ने यू.के को बहुभाषीय और बहुसांस्कृतिक देश घोषित कर दिया‚ अतः होम ऑफ़िस से प्रवासी समुदाय के सहायतार्थ काांन मार्केट से शिक्षा विभाग को आर्थिक सहयोग मिलने लगा। ब्रिटिश स्कूलों में भारतीय त्योैहार‚ इंटरनेशनल ईवनिंग आदि मनाए जाने लगे। फिर भी मुख्य धारा के स्कूलों में हिन्दी पढ़ाने की कोई व्यवस्था नहीं हो पाई क्यों कि अभी भी सदा की तरह हिन्दी भाषी छात्रों की संख्या स्कूलों में बहुत कम रही। हां स्कूलों में हिन्दी इंग्लिश की 'डुएल लैंगुएज' वाली पुस्तके‚ डिक्शनरी‚ हिन्दी बोलनेवाले दुभाषीय सहायक टीचर‚ सूचना पत्र‚ और सूचना पट्ट आदि दिखने आरम्भ हो गए। 

यही वह समय था जब साधारणतया अस्पतालों‚ पुलिस चौकियों और पुस्तकालयों आदि में भी दो भाषाओं में लिखी सूचना पत्र और सूचना पट के साथ दुभाषिये सहायक आदि नज़र आने शुरू हो गए। स्कूलों में बच्चों को मातर्ृभाषा द्वारा अंग्रेज़ी सीखने में सहायता मिलने लगी। अंग्रेज़ शिक्षकों को मल्टीकल्चरल एजुकेशन एवं प्रवासी सभ्यता पर इनसर्विस ट्रेनिंग आदि मिलने लगी। अतः अंग्रेज़ शिक्षको‚ डाक्टरों वकीलों आदि को हिन्दी सीखने की आश्यकता महसूस हुई। ऐसे में हिन्दी महत्वपूर्ण हो उठी और स्थानीय वयस्कों में विभिन्न कारणों से हिन्दी पढ़ने और लिखने की प्रेरणा मिली। जगह जगह हिन्दी की वयस्क शिक्षा का प्रयोजन होने लगा। 

मैं उस समय 'लंदन बारो मर्टन' के बीचहोम स्कूल में पढ़ाती थी। मेरी बहुभाषीय योग्यता को देखते हुए मुझे बहुसांस्कृतिक शिक्षा का भार सौंपा गया। बाद में मैं 'अर्ली इयरस बायलिंगुअल टीम' की डेपुटी टीम लीडर बनी। उस समय हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए मैंने विभिन्न तलों पर भारतीय समुदाय के लिए कई स्वैच्छिक कार्य किए। यही वह वक्त था जब मैंने 'लंडन बारो आफ़ मर्टन' के पाठ्यक्रम का अनुवाद किया साथ ही अंग्रेज़ शिक्षकों को 'बायलिंगुअल' बच्चों की भाषाई और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के लिए (कॉन्फ्रेन्स और वर्कशॅाप आदि के द्वारा) प्रशिक्षित और सचेत किया। उसी समय मैंने 'हाउ टु ब्रिंगअप बायलिंगुअल चिल्डे्रन इन द ब्रिटिश सोसाइटी' पर चार निबंध और 'दीपक द बास्केट मैंन' सीरीज़ की पांच करीकुलम की सहायक द्विभाषीय पुस्तकें लिखी। उसी बीच स्थानीय क्रिस्टल रोडियो पर हिन्दी के रविवारीय प्रसारण के कार्यक्रमों में बच्चों के अभिवावकों के समस्याओं का समाधान का कार्य भी किया। यही वह समय था जब संपूर्ण ब्रिटेन में बहुसांस्कृतिक और बहुभाषीय समाज के प्रति उत्सुक्ता और रूचि की लहर उठी। 

हिन्दी शिक्षा और शिक्षण संस्थाएं

पिछले एक दो दशकों में हिन्दी भाषियों के हृदय में अपनी भाषा के प्रति सम्मान बढ़ा है। एशियन विद्यार्थियों में भी अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति आत्मविश्वास जागा। स्कूलों‚ पुस्तकालयों और हिन्दी सेवियों को आर्थिक अनुदान मिला कहीं सदुपयोग हुआ तो कहीं दुरूपयोग। वास्तव में यदि रचनात्मक ढंग से इस आर्थिक अनुदान का उपयोग होता तो हिन्दी शिक्षण का विकास और अच्छा होता। 

1984–85 में हुए एक अन्य रिपोर्ट' ने यह साबित किया गया कि इंग्लैण्ड में पंजाबी‚ गुजराती और उर्दू बोलने वाले बहुसंख्यक है। हिन्दी के छात्रों की संख्या अन्य भाषाभाषियों की तुलना में बहुत कम है। अतः हिन्दी का अनुदान एक बार फिर बहुत कम हो गया। वस्तुतः इंग्लैण्ड में भारत की राजभषा हिन्दी नहीं प्रादेशिक भाषाए अधिक पनपीं हैं। 

उन दिनों मुख्यधारा के कई स्कूलों ने आधुनिक विदेशी भाषाओं के तहत अपने पाठ्यक्रम में हिन्दी को भी स्थान दिया। लंदन और कैम्ब्रिज विश्वविद्यलयों से 'ओ' और 'ए लेवल' (हाई स्कूल और इंटरमीडियट) की हिन्दी की परीक्षाएं आरम्भ की गईर्ं। किन्तु 1996 में छात्रों की कमी की वजह से केम्ब्रिज ने हिन्दी की परीक्षाऐं 'कॉस्ट इफेक्टिव' न होने के कारण बंद कर दीं तो बहुत से हिन्दी प्रमियों और शिक्षकों ने उसे बहाल कराने का प्रयास किया किन्तु अधिक विद्यार्थी न मिलने के कारण परीक्षा बहाल न हो सकी। आज भी लंदन बोर्ड से जी. सी. एस. सी. में हिन्दी की परीक्षा होती है (यद्यपि कैम्ब्रिज की परीक्षा बंद हो चुकी है) और जिसकी मान्यता किसी भी विषय की तरह मान्य है। आज कुछ भारतीय और विदेशी बच्चे जी. सी. एस. सी. यानी हाई स्कूल की परीक्षा में सम्मिलित होते हैं और पास भी होते हैं। किंतु जैसा कि मैंने पहले कहा है बारहवीं की परीक्षा दिनोर्ंदिन परीक्षार्थियों के गिरती हुई संख्या के कारण समाप्त हेाती जा रही है।

आज जब कि कैब्रिज की 'ए लेवेल' की परीक्षा रद्द कर दी गई है तो भी लंदन बोर्ड के परीक्षाओं के सहारे हिन्दी के बहुत से समर्पित लोग हिन्दी शिक्षण का कार्य साप्ताहान्त के स्कूलों में पूरे मनोयोग से कर रहे है।

लंदन के स्वास‚ ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालयों में स्नातक स्तर पर हिन्दी की पढ़ाई और शोध कार्य मध्य काल से लेकर आज तक हो रहा है। इन विश्वविद्यालयों में भारत के लिए औपनिवशिक काल में राज्य कार्य करने के लिए बड़ेबड़े औपनीवेशिक रूचि के अंग्रेज़ और यूरोपियन राजनीतिज्ञों‚ फ़ौजियों‚ व्यापारियों‚ शोध कर्ताओं ने मध्यकालीन समय में हिन्दी और संस्कृत पढ़ी। आज भी इन प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में विदेशों से आए छात्र शोध‚ स्नातक और स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए प्रवेश लेते है। 
विश्वविद्यालयों का संदर्भ आते ही ब्रिटेन की एक बेहद खूबसूरत आधुनिक यूनिवर्सिटी उभरती है वह है 'योर्क यूनिवर्सिटी'। यॉर्क यूनिवर्ािटी की स्थापना 1966 में विशेषकर हिन्दी के प्रचारप्रसार के दृष्टिकोण से की गई थी। इस विश्वविद्यालय में हिन्दी में रूचि रखने वालों को हिन्दी पढ़ाने के प्रशीक्षण के साथ हिन्दी भाषा और हिन्दी व्याकरण पर शोध आदि करने की भी सुविधा दी गई थी और यह सुविधा यॉर्क विश्वविद्यालय के पास अभी भी है।

यॉर्क विश्वविद्यालय ने पिछले दशकों में हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए‚ 1973 में इस विश्वविद्यालय के तत्वाधान में 'हिन्दी परिषद' की स्थापना की गई‚ 'परिषद' ने बहुत से अंग्रेज़ और भारतवंशी छात्रों में हिन्दी और भारतीय संस्कृति के प्रति जागरूकता पैदा की। सौभाग्य से उन्हीं दिनों भारत सरकार ने फिजी‚ मॉरिशस‚ सूरीनाम‚ टि्रनिडाड एवं सांस्कृतिक समझौते वाले देशों के छात्रों को हिन्दीज्ञानवर्धन और शिक्षण के लिए छात्रवृति देना शुरू किया। योर्क विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष श्री महेन्द्र वर्मा के सार्थक प्रयासों से 1978 में विश्वविद्यालय स्तर पर भारत सरकार द्वारा इंग्लैण्ड को भी दो छात्र वृतियां मिली। इन्हीं दिनों यू.के. के सरकारी महकमों‚ एयरपोर्ट‚ कोर्ट और पब्लिक सेक्टर में हिन्दी के दुभाषियों और और अनुवादको की भी नियुक्ति हुई जिनमें से बहुतों का प्रिशक्षण यॉर्क विश्वविद्यालय ने ही किया।

योर्क विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष श्री महेन्द्र वर्मा ने उन दिनों हिन्दी के उन्न्यन के लिए बहुत से ऐसे महत्वपूर्ण कार्य किए जिसके कारण हिन्दी एक बार फिर जनमानस के आकर्षण का केन्द्र बनी। 
यॉर्क विश्वविद्यालय ने 6 जून 1981 में यॉर्क में प्रथम 'राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन' किया जिसमें बृहत रूप से हिन्दी शिक्षक सम्मेलन हुआ और साथ ही हिन्दी पठन–पाठन पर विचार–विमर्श हुआ। फिर यॉर्क में कई वषोर्ं तक प्रतिवर्ष हिन्दी के पठन–पाठन और शिक्षण पर शिविर लगते रहें‚ जिसमें हिन्दी के शिक्षक भाग लेते रहें। अब उसी परंपरा को यू.के. हिन्दी समिति और कृति यू.के. ने 2001 में 'हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता' और 'शिक्षक–सम्मेलन' मुहिम की तरह प्राइमरी और माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर चलाया है। 

यद्यपि इंग्लैण्ड में प्राइमरी और सेकेन्ड्री स्तर पर हिन्दी के पठन–पाठन का सुगठित इंफ्रास्ट्रकचर कभी नहीं रहा है। हिन्दी शिक्षण के लिए स्वैच्छिक स्कूलों में 'इंफ़ास्ट्रक्चर' न होना वास्तव में हिन्दी प्रेमी भारतीय समुदाय के लिए बहुत बड़े चिंता का विषय है। साथ ही ब्रिटेन में प्राइमरी और माध्यमिक हिन्दी शिक्षण के पाठ्यक्रम के पुनर्गठन और समकालीन प्रासंगिक विकास की भी बहुत बड़ी आवश्यकता रही है और अभी भी है 'इन्फ्रास्ट्रक्चर' के लिए। आज भी जो पाठ्यक्रम विदेशों मे शिक्षण के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं वे अभी भी मध्ययुगीन और प्राचीन हैं‚ उनमें चुनौती‚ आधुनिक प्रासंगिकता‚ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया‚ कम्प्यूटर और दूरसंचार के तत्वों का अभाव है। सी–डेक के लीला–प्रबोध (कंम्प्यूटर प्रोग्राम)‚ तथा डा. स्नेल‚ और वेद मोहला द्वारा बनाई गई आधुनिक पाठ्र्यसामग्री में भी सुधार और कम्प्यूटरीकरण की आवश्यकता है।

तरह–तरह के छोटे–मोटे पाठ्यक्रम से न तो हिन्दी का कोई मानक बना है और न ही महत्ता। विदेशों में हिन्दी तबतक पूरी तरह से नहीं पनप पाएगी जबतक हिन्दी का संपूर्ण पाठ्यक्रम विदेशों में पढ़ने वाले छात्रों की आवश्यकतानुसार उनके परिवेश और प्रासंगिक कान्सेपचुअल विकास के अनुरूप तैयार नही होगा यानी पाठ्यक्रम को विदेशों में हिन्दी 'ऐज़ अ सेकेन्ड लैंगुएज' की तरह पढ़ाया जाए जैसे संसार की अन्य आधुनिक एवं उन्नत भाषाएं पढ़ाई जा रही हैं। इसके लिए भारत सरकार (केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा‚ उत्तर प्रदेर्श लखनऊ‚ दिल्ली आदि) को अपने तत्वावधान में एक नया चुनौतीपूर्ण पाठ्यक्रम तैयार कराना होगा जिसे प्रतिवर्ष अवश्यकतानुसार अपडेट किया जा सकता हो।

हिन्दी में इस समय कंप्यूटर के इस्तमाल के लिए बहुत से अलग–अलग फांट चल रहे हैं। लेकिन एक फांट का दूसरे में परिवर्तन ना कर पाने के कारण कई कठिनाइयां आती हैं। इसलिए आवश्यकता है कि हिन्दी का कोई ऐसा मानक फांट बनाया जाए जिसमें परस्पर परिवर्तन संभव हो। कंप्यूटर के प्रति हमारे हिन्दी जगत में बहुत सी कुठाएं है। हमें अपनी मानसिकता को बदलना होगा। कंप्यूटर ने आज पूरे संसार में क्रांति मचा दी है। आज के संसार में कम्प्यूटर का बहुत बड़ा योगदान है। अतः हिन्दी को पूर्णरूप से काम्प्यूटराइज़ होना होगा और कंप्यूटर पर हिन्दी शिक्षण को सहज रूप से चालू करना होगा।

केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा ने इस विषय पर बहुत काम किए है। विभिन्न शिविरो‚ हिन्दी सम्मेलनों आदि में मेरी भेंट केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के पढ़े छात्रों एवं शिक्षकों से हुई है जिन्होंने केद्रीय हिन्दी संस्थान आगरा की गतिशीलता और उसकी उपलब्धियों से मुझे अवगत कराया है। आज इस व्याख्यानमाला के दौरान मै स्वयं केन्द्र में हो रहे कायरे की बानगी से परिचित हो रही हूं। मुझे केंद्रीय हिन्दी संस्थान से बहुत आशाएं है और जिस तरह से विदेशों में हिन्दी शिक्षण के पाठ्यक्रम‚ पाठ्य–सामग्री‚ शिक्षण–पद्धति आदि पर केन्द्र शोध‚ शिवर‚ वक्तव्य और सम्मेलन करा कर उस पर गतिशील आधारभूत मानक ढांचा तैयार कर रहा है उससे अवश्य ही हिन्दी शिक्षण में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आएगा और हिन्दी की महत्ता बढ़ेगी।

आज संसार के सभी देशों में किसी न किसी रूप में हिन्दी भाषा और साहित्य का शिक्षण हो रहा है। परंतु उसके शिक्षण का स्तर आज भी विश्व की अन्य उन्नत भाषा की तुलना में बहुत कम है। हिन्दी शिक्षण में ऐसी गतिशीलता और उपयोगिता होनी चाहिए जिसको विश्व भाषा स्वीकृति अपने आप दे दे। अंत में मैं एक बार फिर रेखांकित करना चाहूंगी कि आज विदेशों में विशेषकर ब्रिटेन में हिन्दी शिक्षण की राह में आवश्यकता है विश्वव्यापी हिन्दी मानक पाठ्यक्रम की‚ प्रशिक्षित शिक्षकों के साथ केेन्द्रीय संस्थागत सहायता। आज विशेषकर ऐसी पुस्तकों की आवश्यकता है जो विद्याथियोर्ं को हिन्दी में वार्तालाप करने में समर्थ करे। आज के छात्र लिखित शिक्षा से अधिक वार्तालाप में रूचि लेते है। इसके साथ ही प्राइमरी और माध्यमिक स्तर पर सहायक पाठ्यवस्तु की प्रासंगिकता और उपलब्धि में कंप्यूटर और दूरसंचार माध्यम का समुचित प्रयोग और समावेश भी आवश्यक है।

मार्च 2003 में लंदन में हुए 'यूरोपीय हिन्दी शिक्षण सम्मेलन' सत्र में हंगरी से आए डा. रविगुप्त‚ रोमानियां की सुश्री सबीना पोपार्लन‚ मयूनिख की सुश्री बिलियाना म्यूलर‚ यू.के. के हिन्दी शिक्षक श्री वेदमित्र मोहला और क्रोशिया के सुनील कुमार भट्ट सभी ने एक स्वर में कहा था‚ 'हिन्दी व्याकरण की व्यावहारिक जटिलताओं‚ संयुक्त क्रियाओं तथा विदेशी विद्यार्थियों के लिए अपनी भाषा के व्याकरण की तुलना में हिन्दी व्याकरण को ग्रहण करने और समझने में आने वाली कठिनाइयों पर विस्तार से विचार–विमर्श करने के लिए एक कार्यकारिणी कमेटी का गठन होना चाहिए। जिसमें विविध योरोपीय देशों में हिन्दी के अध्ययन अध्यापन का इतिहास‚ उसकी वर्तमान स्थिति‚ विकास और अध्यन अध्यापन में आने वाली समस्याएं‚ भारतीय धर्म दर्शन‚ संस्कृति समाज एवं अन्य भारतीय भाषाओं के अध्ययन‚ हिन्दी की पुस्तकें तथा विद्यार्थियों के लिए कक्षाओं से बाहर हिन्दी का परिवेश बनाने की समस्या आदि हिन्दी के राष्ट्रीए और अंतररष्टीय संदभरे के माध्यम से प्रकाश में आने चाहिए। 

आज लगभग हिन्दी के सभी नए–पुराने संस्थापक‚ शिक्षा–शास्त्री‚ भूतपूर्व शिक्षक‚ छात्र सभी एक मंच पर एकत्र हो चुके हैं और सभी संस्थाएं एक झंडे तले आ गई हैं। पहले संस्थाओं की सीमाओं के कारण कई योग्य दूर दृष्टि रखने वाले प्रतिबद्ध और वरिष्ठ लोग स्वास्थ्य अथवा अन्य किसी कारण से हिन्दी के प्रचार–प्रसार में सक्रिय योगदान नहीं दे पा रहे थे अब वे वेब साइट और दूर संचार के द्वारा आपस में जुड़े हैं। इस तरह हिन्दी के उन्नयन‚ पठन–पाठन‚ और प्रचार–प्रसार आदि पर महीनों से विचार–विमर्श हो रहा कि दूसरी और तीसरी पीढ़ी के भारतीय मूल के लोगों को किस तरह से हिन्दी के पठन–पाठन और उन्नयन के कार्य से जोड़ा जाए। हिन्दी समिति और कृति यू.के. के आयोजको और हिन्दी समाज के पुरोधाओं के अंदर कई महत्वकांक्षी योजनाओं की रूपरेखा तैयार हो रही है। ब्रिटेन की तमाम छोटी बड़ी हिन्दी संस्थाओं से पत्र द्वारा‚ इमेल द्वारा और व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क निरंतर स्थापित किया जा रहा हैं। अब देखना है कि यह योजना कहां तक सफल होती है।

इस तरह से स्कॉटलैण्ड‚ वेल्स‚ मिडलैण्डस‚ आयरलैण्ड आदि के हिन्दी शिक्षाकेन्द्रों की एक लिस्ट बनाई गई है। और उन्हें इस योजना का उद्देश्य बता कर उन्हें एक सूत्र में गठित किया गया है। बच्चों में उत्साहवधर्न के लिए कहानी–कविता प्रतियोगिता आदि जैसी स्थानीय योजनाएं भी बनाईर् गई है।

यू.के. हिन्दी समिति ने 2001 में इंग्लैण्ड में बच्चो और अभिवावकों को हिन्दी पठर्नपाठन की ओर आकर्षित करनेे के लिए यह 'हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता' एक मुहिम की तरह चलाई। व्यवस्था और कार्यकर्ताओं की सीमा को देखते हुए सर्व प्रथम प्रतियोगिता लंदन के ईलिंंग आर्यसमाज में आयोजित की गई जहां पिछले तीन दशक से हिन्दी की कक्षाएं सुचारू रूप से चल रही थी। सन् 2001 की इस प्रतियोगिता में 150 बच्चों ने लंदन के विभिन्न क्षेत्रों से आ कर भाग लिया। लिखित प्रतियोगिता के साथ बच्चों की बोल–चाल की परीक्षा भी ली गई। सबके उत्साह को देखते हुए उसी समय 'ब्रेर्नस्टार्म' के लिए एक विचार गोष्ठी का भी आयोजन किया गया। गोष्ठी काफ़ी सफल रही बहुत से प्रस्ताव आए। जिन पर खुल कर विचार हुआ। छात्रो‚ शिक्षको और आयोजकों ने एक मत से कहा कि यदि परीक्षा केन्द्र का विकेंद्रीकरण कर दिया जाए तो अधिक विद्यार्थी परीक्षा में भाग ले सकेंगे। एक स्थान पर परीक्षा होने के कारण विद्यार्थियों और संस्थाओ के आने–जाने में अर्र्थव्यय और समर्यव्यय में कटौती हो सकती है और अपने केन्द्र में परीक्षा देनें में छात्र अधिक संयत रह पाएंगे। 

परीक्षा की सफलता से प्रेरित हो कर हिन्दी के बहुत से शुभचिंतकों ने आगे बढ़कर पुरस्कारों की घोंषणा की जिसमें डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव‚ केैम्ब्रिज विश्विद्यालय‚ उषा राजे सक्सेना‚ राजेन्द्र चोपड़ा‚ सुखराज बसरा‚ धमेर्ंद्र त्रिपाठी‚ बी. एम. गुप्ता‚ अशोक शर्मा‚ पॉल निश्चल‚ राम भट्ट आदि थे। इन पुरस्कारों में सात एयर टिकट भारत भ्रमण के थे और 50 अन्य पुरस्कार थे। पुरस्कार समारोह के अवसर पर एक भाषण प्रतियोगिता भी की गई जिसमें 63 छात्रों ने भाग लिया जो कि अपने आप में एक महत्वपूर्ण संख्या थी। हिन्दी समिति‚ कृति यू.के. एवं अन्य संस्थाओं‚ हिन्दी शिक्षको और अन्य हिन्दी के प्रवक्ताओं ने प्रश्न पत्र और मौखिक परीक्षा की तैयारी में योगदान दिया। सन् 2002 के परीक्षा पत्र को बच्चों ने काफ़ी दुरूह पाया अतः अगले वर्ष यानी 2003 में परीक्षा पत्र और उसके स्तर पर फिर से विचार किया गया। 

्रइस कार्यक्रम की सबसे बड़ी उपलब्धि अनुज अग्रवाल‚ गेब्रियल सेंगर (साउथ अफ्रीकन) नीरज पॉल‚ राजेश गोगना‚ एवं आशा वालिया जैसे हिन्दी के प्रति समर्पण रखने वाले छात्र सामने आए जो भविष्य मे आने वाली संतानों के माता–पिता होगे अतः हम भविष्य के प्रति आशान्वित होते है। ये विद्यार्थी लंदन‚ मिडलसेक्स‚ सरे‚ ससेक्स‚ बर्मिघम‚ बेडफर्ड‚ नॉटिंघम‚ लेस्टर मैनचेस्टर‚ स्कॉटलैंण्ड‚ वेल्स‚ आयरलैंण्ड आदि जगहों से आए थे। 2004 में योरोप के छात्रों के जुड़ने की आशा की जाती है। 

ब्रिटेन में हिन्दी शिक्षण का संगठित कार्य काल बहुत छोटा है फिर भी इन गिने–चुने वषरे में बहुत कुछ हुआ है। आप सब के सहयोग से अभी बहुत कुछ होना है। मैं सकारात्मक सोंच रखती हूं ब्रिटेन में हिन्दी शिक्षण के लिए हम जो प्रयास कर रहे है वह एक दिन हिन्दी को विश्व भाषा की मान्यता दिला कर रहेगी किन्तु उसमें भारत सरकार का भी सहयोग बृहतरूप से चाहिए। 

हिन्दी के प्रचार–प्रसार और उन्नयन के लिए सजग संस्थाए तो प्रतिबद्ध हैं ही किन्तु व्यापार मंडल भी अनजाने ही हिन्दी को विश्वव्यापी बना रहा है। अब यदि आवश्कता है तो हमारे आपके छोटे–बड़े प्रयासों को संगठित करने का। कहते है दीप से दीप जलता है तो कोना–कोना प्रकाशमय हो जाता है। इस दिशा में मैं भारत के एक राजनीतिक नेता के वक्तव्य का स्वागत करती हूं जब वे कहते हैं, 'विदेशों में स्थित हर भारतीय विद्यालय में हिन्दी पढ़ाने की समुचित व्यवस्था की जाएगी।' और मुझे पूर्ण आशा है कि सूदूर भविष्य में एक दिन ऐसा आएगा जब संसार में न केवल भारतीय विश्वविद्यालयों मे वरन् सभी विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभाग होगा।  


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(अगले अंक में : विदेशी परिवेश में पनपता हिन्दी लेखन)

 
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