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(चौथा भाग)

इस बार पवन अपने घर गया तो उसने पाया वह अपने नए शहर और काम के बारे में घर वालों को बताते समय कई बार स्टैला का ज़िक्र कर गया। सघन बी.एससी. के बाद हार्डवेयर का कोर्स कर रहा था। पवन ने कहा, ''तुम इस बाल मेरे साथ राजकोट चलो, तुम्हें मैं ऐसे कंप्यूटर वर्ल्ड में प्रवेश दिलाऊँगा कि तुम्हारी आँखें खुली रह जाएँगी।''
सघन ने कहा, ''जाना होगा तो हैदराबाद जाऊँगा, वह तो साइबर सिटी है।''
''एक बार तुम एंटरप्राइज़ ज्वाइन करोगे तो देखोगे वह साइबर सिटी से कम नहीं।''
माँ ने कहा, ''इसको भी ले जाओगे तो हम दोनों बिल्कुल अकेले रह जाएँगे। वैसे ही सीनियर सिटीजन कालोनी बनती जा रही है। सबके बच्चे पढ़ लिख कर बाहर चले जा रहे हैं। हर घर में, समझो, एक बूढ़ा, एक बूढ़ी, एक कुत्ता और एक कार बस यह रह गया है।''
''इलाहाबाद में कुछ भी बदलता नहीं है माँ। दो साल पहले जैसा था वैसा ही अब भी है। तुम भी राजकोट चली आओ।''
''और तेरे पापा? वे यह शहर छोड़ कर जाने को तैयार नहीं है।''
पापा से बात की गई। उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया।
''शहर छोड़ने की भी एक उम्र होती है बेटे। इससे अच्छा है तुम किसी ऐसी कंपनी में हो जाओ जो आस-पास कहीं हो।''
''यहाँ मेरे लायक नौकरी कहाँ पापा। ज़्यादा से ज़्यादा नैनी में नूरामेंट की मार्केटिंग कर लूँगा।''
''दिल्ली तक भी आ जाओ तो? सच दिल्ली आना-जाना बिल्कुल मुश्किल नहीं है। रात को प्रयागराज एक्सप्रेस से चलो, सबेरे दिल्ली। कम से कम हर महीने तुम्हें देख तो लेंगे। या कलकत्ते आ जाओ। वह तो महानगर है।''
''पापा मेरे लिए शहर महत्वपूर्ण नहीं है, कैरियर है। अब कलकत्ते को ही लीजिए। कहने को महानगर है पर मार्केटिंग की दृष्टि से एकदम लद्धड़। कलकत्ते में प्रोड्यूसर्स का मार्केट है, कंज्यूमर्स का नहीं। मैं ऐसे शहर में रहना चाहता हूँ जहाँ कल्चर हो न हो, कंज्यूमर कल्चर ज़रूर हो। मुझे संस्कृति नहीं उपभोक्ता संस्कृति चाहिए, तभी मैं कामयाब रहूँगा।'' माता पिता को पवन की बातों ने स्तंभित कर दिया। बेटा उस उम्मीद को भी ख़त्म किए दे रहा था जिसकी डोर से बँधे-बँधे वे उसे टाइम्स ऑफ इंडिया की दिल्ली रिक्तियों के काग़ज़ डाक से भेजा करते थे।

रात जब पवन अपने कमरे में चला गया राकेश पांडे ने पत्नी से कहा, ''आज पवन की बातें सुन कर मुझे बड़ा धक्का लगा। इसने तो घर के संस्कारों को एकदम ही त्याग दिया।''
रेखा दिन भर के काम से पस्त थी, ''पहले तुम्हें भय था कि बच्चे कहीं तुम जैसे आदर्शवादी न बन जाएँ। इसीलिए उसे एम.बी.ए. कराया। अब वह यथार्थवादी बन गया है तो तुम्हें तकलीफ़ हो रही है। जहाँ जैसी नौकरी कर रहा है, वहीं के कायदे कानून तो ग्रहण करेगा।''
''यानी तुम्हें उसके एटिट्यूड से कोई शिकायत नहीं है।'' राकेश हैरान हुए।
''देखो अभी उसकी नई नौकरी है। इसमें उसे पाँव जमाने दो। घर से दूर जाने का मतलब यह नहीं होता कि बच्चा घर भूल गया है। कैसे मेरी गोद में सिर रख कर दोपहर को लेटा हुआ था। एम.ए., बी.ए. करके यहीं चप्पल चटकाता रहता, तब भी तो हमें परेशानी होती।''

रेखा का चचेरा भाई भी नागपुर में मार्केटिंग मैनेजर था। उसे थोड़ा अंदाज़ था कि इस क्षेत्र में कितनी स्पर्धा होती है। वह एक फटीचर पाठशाला में अध्यापिका थी। उसके लिए बेटे की कामयाबी गर्व का विषय थी। उसकी सहयोगी अध्यापिकाओं के बच्चे पढ़ाई के बाद तरह-तरह के संघर्षों में लगे थे।

कोई आई.ए.एस, पी.सी.एस. परीक्षाओं को पार नहीं कर पा रहा था तो किसी को बैंक प्रतियोगी परीक्षा सता रही थी। किसी का बेटा कई इंटरव्यू में असफल होने के बाद नशे की लत में पड़ गया था तो किसी की बेटी हर साल पी.एम.टी. में अटक जाती। जीवन के पचपनवें साल में रेखा को यह सोचकर बहुत अच्छा लगता कि उसके दोनों बच्चे पढ़ाई में अव्वल रहे और उन्होंने खुद ही अपने कैरियर की दिशा तय कर ली। सघन अभी छोटा था पर वह भी जब अपने कैरियर पर विचार करता, उसे शहरों में ही संभावनाएँ नज़र आतीं। वह दोस्ती से माँग कर देश विदेश के कंप्यूटर जर्नल पढ़ता। उसका ज़्यादा समय ऐसे दोस्तों के घरों में बीतता जहाँ कंप्यूटर होता।

राकेश बोले, ''तुम समझ नहीं रही हो। पवन के बहाने एक पूरी की पूरी युवा पीढ़ी को पहचानो। ये अपनी जड़ों से कट कर जीने वाले लड़के समाज की कैसी तस्वीर तैयार करेंगे।''
''और जो जड़ों से जुड़े रहे हैं उन्होंने इन निन्यानवें वर्षों में कौन-सा परिवर्तन किया है। तुम्हें इतना ही कष्ट है तो क्यों करवाया था पवन को एम.बी.ए.। घर के बरामदे में दुकान खुलवा देते, माचिस और साबुन बेचता रहता।''
''तुम मूर्ख हो, ऐसा भी नहीं लगता मुझे, बस मेरी बात काटना तुम्हें अच्छा लगता है।''
''अच्छा अब सो जाओ। और देखो, सुबह पवन के सामने फिर यही बहस मत छेड़ देना। चार रोज़ को बच्चा घर आया है, राजी खुशी रहे, राजी खुशी जाए।''

रेखा ने रात को तो पुत्र की पक्षधरता की पर अगले दिन स्कूल से घर लौटी तो पवन से उसकी खटपट हो गई। दोपहर में धोबी कपड़े इस्त्री कर के लाया था। आठ कपड़ों के बाहर रुपए होते थे पर धोबी ने सोलह माँगे। पवन ने सोलह रुपए दे दिए। पता चलने पर रेखा उखड़ गई। उसने कहा, ''बेटे कपड़े ले कर रख लेने थे, हिसाब मैं अपने आप करती।''
पवन बोला, ''माँ क्या फ़र्क पड़ा, मैंने दे दिया।''
रेखा ने कहा, ''टूरिस्ट की तरह तुमने उसे मनमाने पैसे दे दिए, वह अपना रेट बढ़ा देगा तो रोज़ भुगतना तो मुझे पड़ेगा।''
पवन को टूरिस्ट शब्द पत्थर की तरह चुभ गया। उसका गोरा चेहरा क्रोध से लाल हो गया, ''माँ आपने मुझे टूरिस्ट कह दिया। मैं अपने घर आया हूँ, टूर पर नहीं निकला हूँ।''

शाम तक पवन किचकिचाता रहा। उसने पिता से शिकायत की। पिता ने कहा, ''यह निहायत टुच्ची-सी बात है। तुम क्यों परेशान हो रहे हो। तुम्हें पता है तुम्हारी माँ की जुबान बेलगाम है। छोटी-सी बात पर कड़ी-सी बात जड़ देती है।''
नौकरी लग जाने के साथ पवन बहुत नाज़ुकमिज़ाज हो गया था। उसे ऑफ़िस में अपना वर्चस्व और शक्ति याद हो आई, ''दफ्तर में सब मुझे पवन सर या फिर मिस्टर पांडे कहते हैं। किसी की हिम्मत नहीं कि मेरे आदेश की अवहेलना करे। घर में किसी को अपनी मर्जी से मैं चार रुपए नहीं दे सकता।''
रेखा सहम गई, ''बेटे मेरा मतलब यह नहीं था मैं तो सिर्फ़ यह कर रही थी कि कपड़े रोज़ इस्तिरी होते हैं, एक बार इन लोगों को ज़्यादा पैसे दे दो तो ये एकदम सिर चढ़ जाते हैं।'' और भी छोटी-छोटी कितनी ही बातें थीं जिनमें माँ बेटे का दृष्टिकोण एकदम अलग था। पवन ने कहा, ''माँ मेरा जन्मदिन इस बार यों ही निकल गया। आपने फ़ोन किया पर ग्रीटिंग कार्ड नहीं भेजा।''

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