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समकालीन कहानियों में
इस माह
प्रस्तुत है- भारत से
शुभदा मिश्रा की
कहानी
ऐसो रंग रंग दीन्हों
गुजरिया...

अब इस बक्से का ताला तोड़ ही देना चाहिए… मेरे
शौहर कह रहे थे… जाने बड़े मियाँ ने क्या छुपाकर रखा है कि चाबी ही नहीं मिल
रही है।
क्या छुपाकर रखेंगे जी… मैंने तुनककर कहा… सब कुछ तो उन्होंने हम लोगों को दे
ही दिया है। घर हम लोगों के नाम कर ही दिया। तुम्हारे लिए दुकान कर दी। बच्चों
के लिए सब करते ही रहते थे। कोई धन्नासेठ तो थे नहीं। स्कूलमास्टर थे बेचारे।
जो कमाते थे, हम लोगों पर ही खर्च करते थे। तो फिर यह बक्सा क्यों बंद रखा? हो
सकता है, इसमें तुम्हारी माँ के कुछ जेवर हों। सोचे होंगे, जो अंतिम समय में
सेवा करेगा, उसे दूँगा।
ऐसा हो सकता है — मैं सोचने लगी। मगर उन्होंने तो सेवा करने का कोई मौका ही
नहीं दिया। अचानक ही चले गए। आज उनको गए दो महीने हो गए। ऐसा लगता है, जैसे घर
की आत्मा ही चली गई। ऊपर छत के अकेले कमरे में रहते थे। वहाँ जाने की हिम्मत ही
नहीं होती। मेरे शौहर मुझे अक्सर छेड़ते रहते —
..आगे-
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