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समकालीन कहानियों में
इस माह
प्रस्तुत है- भारत से
हर्ष कुमार की
कहानी
संगी का सपना
साँझ
ढल रही थी और संगी अभी खेल में व्यस्त थी। क्या करे, हुआ कुछ
ऐसे था कि पिछले खेल में मीठू दी हार गयीं थीं तब बोलीं कि एक
और खेलो। संगी क्या करती खेलना पड़ गया। खेल के भी अपने नियम
होते हैं। चाहे जुआ हो या कोई और खेल हो, जब तक हारने वाला
बाजी न छोड़ दे खेल चलता रहता है। तो इसमें बेचारी संगी का
क्या दोष।
खेल भी क्या, वही पत्थर के चार टुकड़े और एक गेंद। हाँ गेंद न
हो तो एक बड़े गोल पत्थर से काम चल जाता है। गेंद उछालो और
पत्थर उठाओ फिर गेंद को लपक लो। गेंद गिरी तो बाजी दूसरे की।
पहले एक-एक पत्थर उठाना है, फिर दो-दो, फिर तीन एक साथ, बाद
में चारों एक साथ। जो पहले कर ले वो जीता। शायद हिन्दुस्तान के
हर छोटे शहर, कस्बे और गाँव में लड़कियाँ इसे खेलती मिलेंगी।
इसमें हाथ और आँख का तालमेल अच्छा होना चाहिये और फुर्ती भी
होनी चाहिये। जो इनमें अच्छा होगा वो जीतेगा।
...आगे-
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