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 १. ७. २०१९

इस माह-

अनुभूति में-
कुटज के वृक्ष और फूलों को समर्पित, विविध विधाओं में विभिन्न रचनाकारों की ढेर-सी रचनाएँ।

-- घर परिवार में

रसोईघर में- गरमी के मौसम में नर्म तरावट के लिये हमारी रसोई संपादक शुचि प्रस्तुत कर रही हैं- इंद्रधनुष

स्वास्थ्य में- २० आसान सुझाव जो जल्दी वजन घटाने में सहायक हो सकते हैं- १३- पाँच मिनट व्यायाम की चुटकी और १४- रसोईघर को पुनर्व्यवस्थित करें।

बागबानी- तीन आसान बातें जो बागबानी को सफल, स्वस्थ और रोचक बनाने की दिशा में उपयोगी हो सकते हैं-  कुछ उपयोगी सुझाव-

अभिरुचि में- विभिन्न देशों के व्यक्तिगत डाक-टिकटों की जानकारी से सम्बंधित पूर्णिमा वर्मन का आलेख- डाकटिकटों और प्रथम दिवस आवरणों में पलाश।

- रचना व मनोरंजन में

क्या आप जानते हैं- इस माह (जुलाई) की विभिन्न तिथियों में) कितने गौरवशाली भारतीय नागरिकों ने जन्म लिया? ...विस्तार से

संग्रह और संकलन- में प्रस्तुत है- आचार्य संजीव वर्मा सलिल की कलम से अवनीश त्रिपाठी के नवगीत संग्रह- दिन कटे हैं धूप चुनते का परिचय। 

वर्ग पहेली- ३१५
गोपालकृष्ण-भट्ट-आकुल और
रश्मि-आशीष के सहयोग से


हास परिहास
में पाठकों द्वारा भेजे गए चुटकुले

साहित्य एवं संस्कृति के अंतर्गत-  कुटज विशेषांक में

वरिष्ठ कथाकारों की प्रसिद्ध कहानियों के स्तंभ
गौरव गाथा में प्रस्तुत है जयशंकर प्रसाद की
कहानी- चंदा

चैत्र-कृष्णाष्टमी का चन्द्रमा अपना उज्ज्वल प्रकाश 'चन्द्रप्रभा' के निर्मल जल पर डाल रहा है। गिरि-श्रेणी के तरुवर अपने रंग को छोड़कर धवलित हो रहे हैं, कल-नादिनी समीर के संग धीरे-धीरे बह रही है। एक शिला-तल पर बैठी हुई कोलकुमारी सुरीले स्वर से-'दरद दिल काहि सुनाऊँ प्यारे! दरद' ...गा रही है।
गीत अधूरा ही है कि अकस्मात् एक कोलयुवक धीर-पद-संचालन करता हुआ उस रमणी के सम्मुख आकर खड़ा हो गया। उसे देखते ही रमणी की हृदय-तन्त्री बज उठी। रमणी बाह्य-स्वर भूलकर आन्तरिक स्वर से सुमधुर संगीत गाने लगी और उठकर खड़ी हो गई। प्रणय के वेग को सहन न करके वर्षा-वारिपूरिता स्रोतस्विनी के समान कोलकुमार के कंध-कूल से रमणी ने आलिंगन किया। दोनों उसी शिला पर बैठ गये, और निर्निमेष सजल नेत्रों से परस्पर अवलोकन करने लगे। युवती ने कहा- तुम कैसे आये?
युवक- जैसे तुमने बुलाया।
युवती-(हँसकर) हमने तुम्हें कब बुलाया? और क्यों बुलाया?  आगे...
*

मुक्ता पाठक की
लघुकथा- कुटज और धरती
*

प्रकृति और पर्यावरण में-
सुंदर फूलों वाला वृक्ष कुटज
*

पूर्णिमा वर्मन का आलेख
साहित्य में कुटज की उपस्थिति
*

पुनर्पाठ में हजारी प्रसाद द्विवेदी
का ललित निबंध- कुटज

पिछले अंक-में---

अंतरा करवड़े की
लघुकथा- शाश्वत
*

अजयेन्द्रनाथ त्रिवेदी का
ललित निबंध- कदंब कहाँ है
*

रचना प्रसंग में कुमार रवींद्र का आलेख
कविता की मिथकीय भंगिमा  
*

पुनर्पाठ में गुरमीत बेदी के साथ
पर्यटन- चंबा की घाटी में

*

समकालीन कहानियों में भारत से सुशांत सुप्रिय
की कहानी- तितलियाँ

बाईसवीं सदी में एक दिन देश में ग़ज़ब हो गया। सुबह लोग सो कर उठे तो देखा कि चारों ओर तितलियाँ ही तितलियाँ हैं। गाँवों, क़स्बों, शहरों, महानगरों में जिधर देखो उधर तितलियाँ ही तितलियाँ थीं। घरों में तितलियाँ थीं। बाजारों में तितलियाँ थीं। खेतों में तितलियाँ थीं। आँगनों में तितलियाँ थीं। गलियों-मोहल्लों में, सड़कों-चौराहों पर करोड़ों-अरबों की संख्या में तितलियाँ ही तितलियाँ थीं। दफ़्तरों में तितलियाँ थीं। मंत्रालयों में तितलियाँ थीं। अदालतों में तितलियाँ थीं। अस्पतालों में तितलियाँ थीं। तितलियाँ इतनी तादाद में थीं कि लोग कम हो गए, तितलियाँ ज़्यादा हो गईं। सामान्य जन-जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। लगता था जैसे तितलियों ने देश पर हमला बोल दिया हो।
दिल्ली में संसद का सत्र चल रहा था। तितलियाँ भारी संख्या में लोकसभा और राज्यसभा में घुस आईं। दर्शक-दीर्घा में तितलियाँ ही तितलियाँ मँडराने लगीं। अध्यक्ष और सभापति के आसनों के चारों ओर तितलियाँ ही तितलियाँ फड़फड़ाने लगीं। आख़िर दोनों सदनों की कार्रवाई दिन भर के लिए स्थगित करनी पड़ी।  आगे...

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"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है
यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित होती है।


प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन, कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन

 
सहयोग : कल्पना रामानी
 

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