अनुभूति

 9. 5. 2004

आज सिरहानेआभारउपन्यासउपहारकहानियांकला दीर्घाकविताएंगौरवगाथापुराने अंकनगरनामा
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पिछले सप्ताह

सामयिकी में
मई दिवस के अवसर पर
योगश चंद्र शर्मा प्रस्तुत कर रहे हैं
मई दिवस की यात्रा कथा

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नगरनामा में
असगर वजाहत द्वारा पत्र शैली में लिखा गया बुदापेस्त का नगर वृतांत
इस पतझड़ में आना

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फुलवारी में
जंगल के पशु श्रृखला में जानकारी 
कस्तूरी मृग
हिरन का एक सुंदर सा चित्र
रंगने के लिए
और कविता
हिरन

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मंच मचान में
अशोक चक्रधर प्रस्तुत कर रहे हैं
ढिंचिक–ढिंचिक वाली रामचरित मानस

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कहानियों में
भारत से रवीन्द्र कालिया की कहानी
गौरैया

जेठ की उजली दुपहरी थी। पत्ता तक नहीं हिल रहा था। लू के थपेड़े, घने पेडों के बावजूद, बदन पर आग की लपटों की तरह लपलपा रहे थे। इस खौफनाक मौसम में बस एक ही राहत थी, गौरैया की मधुर आवाज़। दोपहर के इस घनघोर सन्नाटे में उसकी आवाज़ पेड़–पौधों के ऊपर तितली की तरह थिरक रही थी। इस आवाज़ के सम्मोहन में ही मैं बाहर बगिया में निकल आया था और पेड़ के नीचे पड़ी खटिया पर पसर गया था। गौरैया चुप हो जाती तो लगता, पूरी कायनात धू–धू जल रही है, अभी सब कुछ जल कर राख हो जाएगा। गौरैया बोलती तो लगता, अभी प्रलय बहुत दूर है। पृथ्वी पर जीवन के चिह्न बाकी हैं।
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!इस सप्ताह

कहानियों में
भारत से अलका प्रमोद की कहानी
बादल छंट गए

उस पत्र पर उकेरे चिरपरिचित अक्षर देख कर, अतीत के धुंधलके से विस्मृत हुए चित्र, उभरकर सामने आ गए, जिन्होंने कनु को क्षण भर के लिए निस्पंद कर दिया। इस लिखावट को वह कैसे भूल सकती है, इसी लिखावट को लिखने वाले ने उसकी जीवन पत्री के चंद पन्ने ऐसे लिखे जिन्हें स्मरण करने मात्र से उसके मुंह का स्वाद कसैला हो जाता है। आज उसी के द्वारा लिखा पत्र पता नहीं किस झंझावात की पूर्व सूचना है। 

°

उपन्यास में
स्वदेश राणा के नये अप्रकाशित उपन्यास
कोठेवाली का पांचवां भाग
सिर्फ उफक वहीं का वहीं था, डूबते सूरज की फैलती सुर्खी में नहाया। छोटे छोटे रूई के गोलो जैसी बदलियों के तौलिए से बदन पोंछता ताहिरा आंख झपकने से कतरा रही थी। बीच आसमान में उगते डूबते सूरज के रंग उसने देखे थे। लेकिन मीलों फैली हरियाली के पार रंग बदलता उफक? नज़र के सामने! पहुंच से दूर! इतनी नज़दीकी, इतना फासला!

°!

परिक्रमा में
दिल्ली दरबार के अंतर्गत
भारत से बृजेश कुमार शुक्ला का आलेख
हाईटेक हुए साधू संत
1°1

वैदिक कहानियों में
डा रति सक्सेना की कलम से
वरूण(2)
°

रसोईघर में
शाकाहारी मुगलई के अंतर्गत तैयार है
तंदूरी शिमला मिर्च
1

!सप्ताह का विचार!
पतियां मनुष्यता की कसौटी हैं।
इन पर खरा उतरे बिना कोई भी व्यक्ति
सफल नहीं हो सकता।
—पं रामप्रताप त्रिपाठी

 

अनुभूति में

काव्यचर्चा के
साथ साथ
स्वयम दत्ता,
गगन गुप्ता व अमिताभ मित्रा की रचनाएं

उपहार में
मातृदिवस के अवसर पर कृतज्ञता संदेश
नमन में मन

° पिछले अंकों से°

कहानियों में

ढंकी हुई बातेंतरूण भटनागर
यही सच हैमन्नू भंडारी
आई एस आई एजेंट–महेश चंद्र द्विवेदी
टेपचूउदय प्रकाश 
आते समयडा कुसुम अंसल
सारांशशुभांगी भड़भड़े

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परिक्रमा में 
शैल अग्रवाल की कलम से
वसुधैव कुटुम्बकम

°

विज्ञान वार्ता में
'
आपका सूरज आपकी मेज़ पर'
डा गुरूदयाल प्रदीप का आलेख
डेस्कटॉप न्युक्लियर फ्यूज़न संयंत्र

°

प्रौद्योगिकी में
भारत में कंप्यूटर के बढ़ते कदम
नगर नगर कंप्यूटर

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हास्य व्यंग्य में
संजय ग्रोवर की कलम से
मरा हुआ लेखक सवा लाख का

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आज सिरहाने में
आचार्य भगवत दुबे के कविता संग्रह
हिन्दी तुझे प्रणाम
से संक्षिप्त परिचय डा इसाक 'अश्क'
के शब्दों में

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प्रकृति और पर्यावरण में
प्रभात कुमार का जानकारी पूर्ण आलेख
आपदाओं का धनजल

°

नगरनामा में
सूरज प्रकाश का सजीव रेखाचित्र

!अहमदाबाद एटले अहमदाबाद

 

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"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरूचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों  अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1 – 9 – 16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

प्रकाशन : प्रवीन सक्सेना   परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन, कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन     
      सहयोग : दीपिका जोशी
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