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समकालीन कहानियों में
इस माह प्रस्तुत है- आस्ट्रेलिया से
रेखा राजवंशी
की
कहानी
चंदामामा दूर के

आज मेरा जन्मदिन है। बर्थडे
नहीं बल्कि वह दिन, जिस दिन मैं अपनी माँ की कोख से जन्म लूँगा। माँ और पापा
बहुत खुश हैं, घर में दादा-दादी मेरे जन्म की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कुछ महीने
पहले माँ ने अल्ट्रासाउंड करा लिया था। तो उन्हें मालूम है कि उनके बेटा होने
वाला है। उनको ही नहीं घर के सभी सदस्यों को यह पता है कि आज मैं यानी कि उनका
इकलौता बेटा,-खानदान-की-संपत्ति-का-वारिस-पैदा-होने-वाला-हूँ।
मैं भी तो पैदा होना चाहता
हूँ न। माँ के गर्भ में नौ महीने से बंद पड़ा हूँ, एक पिंजरे में कैद पंछी की
तरह। और इतने दिन इस बंधन में रहकर मैं भी आजाद होने के लिए छटपटा रहा हूँ।
आखिर मैं भी तो दुनिया देखना चाहता हूँ। हँसना चाहता हूँ खुलकर, रोना चाहता हूँ
चिल्लाकर और मैं गुस्सा भी तो होना चाहता हूँ ...आगे-
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