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बार-बार सुनकर बच्चों को ये
किस्से ऐसे याद हो गए थे जैसे कहानियाँ।
पवन कहता, ''माँ जब तुम बीमार पड़ी थीं, छोटू स्कूल से सीधे
अस्पताल आ गया था।''
''सच्ची। ऐसा इसने खतरा मोल लिया। के.जी. दो में पढ़ता था।
सेंट एंथनी में तीन बजे छूट्टी हुई। आया जब तक उसे ढूँढ़े,
बस में बिठाए, ये चल दिया बाहर।''
पवन कहता, ''वैसे माँ अस्पताल स्कूल से दूर नहीं है।''
''अरे क्या? चौराहा देखा है वह बालसन वाला। छह रास्ते फूटते
हैं वहाँ। कितनी ट्रकें चलती हैं। अच्छे भले लोग चकरघिन्नी
हो जाते हैं सड़क पार करने में और यह एड़ियाँ अचकाता जाने
कैसे सारा ट्रैफ़िक पार कर गया कि मम्मा के पास जाना है। सघन
कहता, ''हमें पिछले दिन पापा ने कहा था कि तुम्हारी मम्मी
मरने वाली है। हम इसलिए गए थे।''
''तुमने यह नहीं सोचा कि तुम कुचल जाओगे।''
''नहीं।'' सघन सिर हिलाता, ''हमें तो मम्मा चाहिए थी।'' अब
उसके बिना कितनी दूर रह रहा है सघन। क्या अब याद नहीं आती
होगी? कितना काबू रखना पड़ता होगा अपने पर।
भाग्यवान होते हैं व जिनके बेटे बचपन से होस्टल में पलते
हैं, दूर रह कर पढ़ाई करते हैं और एक दिन बाहर-बाहर ही बड़े
होते जाते हैं। उनकी माँओं के पास यादों के नाम पर सिर्फ़ खत
और ख़बर होती है, फ़ोन पर एक आवाज़ और एक्समस के ग्रीटिंग
कार्ड। पर रेखा ने तो रच-रच कर पाले हैं अपने बेटे। इनके गू
मूत में गीली हुई है, इनके आँसू अपनी चुम्मायों से सुखाये
हैं, इनकी हँसी अपने अंतस में उतारी है।
राकेश कहते हैं, ''बच्चे अब
हमसे ज़्यादा जीवन को समझते हैं। इन्हैं कभी पीछे मत
खींचना।''
रात को पवन का फ़ोन आया। माता पिता दोनों के चेहरे खिल गए।
''तबियत कैसी है?''
''एकदम ठीक।'' दोनों ने कहा। अपनी खाँसी, एलर्जी और दर्द बता
कर उसे परेशान थोड़े करना है।
''छोटू की कोई ख़बर?''
''बिलकुल मज़े में है। आजकल चीनी बोलना सीख रहा है।''
''वी.सी.डी. पर पिक्चर देख लिया करो माँ।''
''हाँ देखती हूँ।'' साफ़ झूठ बोला रेखा ने। उसे न्यू सी.डी.
में डिस्क लगाना कभी नहीं आएगा।
पिछली बार पवन माइक्रोवेव ओवन दिला गया था। फ़ोन पर पूछा,
''माइक्रोवेव से काम लेती हो?''
''मुझे अच्छा नहीं लगता। सीटी मुझे सुनती नहीं, मरी हर चीज़
ज्यादा पक जाए। फिर सब्ज़ी एकदम सफ़ेद लगे जैसे कच्ची है।''
''अच्छा यह मैं ले लूँगा, आपको ब्राउनिंग वाला दिला दूँगा।''
''स्टैला कहाँ है?'' पता चला उसके माँ बाप
शिकागो से वापस आ गए हैं। पवन ने चहकते हुए बताया, ''अब छोटी
ममी बिजनेस सँभालेगी। स्टैला पास विज़िट दे सकेगी।''
विज़िट शब्द खटका पर वे उलझे नहीं। फिर भी फ़ोन रखने के पहले
रेखा के मुँह से निकला, ''सभी हमसे मिलने नहीं आए।''
''आएँगे माँ, पहले तो जैटलैग (थकान) रहा, अब बिजनेस में घिरे
हैं। वैसे आपकी बहू आप लोगों की मुलाक़ात प्लान कर रही है।
वह चाहती है किसी हाली डे रिसोर्ट (सैर सपाटे की जगह) में आप
चारों इकट्ठे दो तीन दिन रहो। वे लोग भी आराम कर लेंगे और
आपके लिए भी चेंज हो जाएगा।''
''इतने तामझाम की क्या ज़रूरत है? उन्हें यहाँ आना चाहिए।''
''ये तुम स्टैला से फ़ोन पर डिसकस कर लेना। बहुत लंबी बात हो
गई, बाय।''
कुछ देर बाद ही स्टैला का फ़ोन आया। ''मॉम आप कंप्यूटर ऑन
रखा करो। मैंने कितनी बार आपके ई-मेल पर मैसेज दिया। ममी ने
भी आप दोनों को हैलो बोला था पर आपका सिस्टम ऑफ था।''
''तुम्हें पता ही है, जब से छोटू गया हमने कंप्यूटर पर खोल
उढ़ा कर रख दिया है।''
''ओ नो माम। अगर आपके काम नहीं आ रहा तो यहाँ भिजवा दीजिए।
मैं मँगवा लूँगी। इतनी यूजफूल चीज़ आप लोग वेस्ट कर रहे
हैं।''
रेखा कहना चाहती थी कि उसके
माता पिता उनसे मिलने नहीं आए। पर उसे लगा शिकायत उसे छोटा
बनाएगी। वह ज़ब्त कर गई। लेकिन जब स्टैला ने उसे अगले महीने
वाटर पार्क के लिए बुलावा दिया उसने साफ़ इनकार कर दिया,
''मेरी छुट्टियाँ खतम हैं। मैं नहीं आ सकती। ये चाहें तो चले
जाएँ।''
इस आयोजन में राकेश की भी रुचि नहीं थी।
कई दिनों के बाद रेखा और
राकेश इंजीनियरींग कॉलेज परिसर में घूमने निकले। एक-एक कर
परिचित चेहरे दिखते गए। अच्छा लगता रहा। मिन्हाज साहब ने
कहा, ''घूमने में नागा नहीं करना चाहिए। रोज़ घूमना चाहिए
चाहे पाँच मिनट घूमो।'' उन्हीं से समाचार मिला। कॉलोनी के
सोनी साहब को दिल का दौरा पड़ा था, हॉस्पिटल में भरती हैं।
रेखा और राकेश फिक्रमंद हो गए। मिसेज सोनी चौंसठ साल की
गठियाग्रस्त महिला है। अस्पताल की भाग दौड़ कैसे सँभालेगी?
''देखो जी कल तो मैंने भूषण को बैठा दिया था वहाँ पर। आज तो
उसने भी काम पर जाना था।''
रेखा और राकेश ने तय किया
वे शाम को सोनी साहब को देख कर आएँगे।
पर सोनी के दिल ने इतनी मोहलत न दी। वह थक कर पहले ही धड़कना
बंद कर बैठा। शाम तक कॉलोनी में अस्पताल की शव वाहिका सोनी
का पार्थिव शरीर और उनकी बेहाल पत्नी को उतार कर चली गई।
सोनी की लड़की को सूचना दी गई। वह देहरादून ब्याही थी। पता
चला वह अगले दिन रात तक पहुँच सकेगी। मिसेज सोनी से
सिद्धार्थ को फ़ोन नंबर ले कर उन्हीं के फ़ोन से इंटरनेशनल
कॉल मिलाई गई।
मिसेज सोनी पति के शोक में एकदम
हतबुद्धि हो रही थीं। फ़ोन में वे सिर्फ़ रोती और
कलपती रहीं, ''तेरे डैडी, तेरे डैडी. . .'' तब फ़ोन मिन्हाज
साहब ने सँभाला, ''भई सिधारथ, बड़ा ही बुरा हुआ। अब तू जल्दी
से आ कर अपना फ़र्ज़ पूरा कर। तेरे इंतज़ार में फ्यूनरल (दाह
संस्कार) रोक के रखें?''
उधर से सिद्धार्थ ने कहा, ''अंकल आप ममी को सँभालिए। आज की
तारीख सबसे मनहूस है। अंकल मैं जितनी भी जल्दी करूँगा,
मुझे पहुँचने में हफ्ता लग जाएगा।''
''हफ्ते भर बॉडी कैसे पड़ी रहेगी?'' मिन्हाज साहब बोले।
''आप मुरदाघर में रखवा दीजिए। यहाँ तो महीनों बॉडी मारच्यूरी
में रखी रहती है। जब बच्चों को फ़ुर्सत होती है फ्यूनरल कर
देते हैं।''
''वहाँ की बात और है। हमारे मुलुक में एयरकंडीशंड मुरदाघर
कहाँ हैं। ओय पुत्तर तेरा बाप उप्पर चला गया तू इन्नी दूरों
बैठा बहाने बना रहा है।''
''ज़रा मम्मी को फ़ोन दीजिए।''
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