शुषा लिपि
सहायता

अनुभूति

 1. 4. 2003

कहानियां।कविताएं।साहित्य संगम।दो पल।कला दीर्घा।साहित्यिक निबंध।उपहार।परिक्रमा।आज सिरहाने
फुलवारी।हास्य व्यंग्य।प्रकृति।पर्यटन।संस्मरण।प्रेरक प्रसंग।रसोई।स्वास्थ्य।घर–परिवार।विज्ञान वार्ता
पर्व–परिचय।गौरवगाथा।शिक्षा–सूत्र।आभार।संदर्भ।लेखक।संपर्क ।लेखकों से  

पिछले सप्ताह

कहानियों में
यू के से तेजेन्द्र शर्मा की कहानी
गंदगी का बक्सा

आज लगभग दो वर्ष होने जा रहे हैं। दिलीप ने काम धाम छोड़ रखा है। घर में भी शराब और शाम को 'पब' मे भी शराब। नाश्ते और भोजन मे केवल शराब ही शराब। ऐसा क्या दुख है दिलीप को? वह क्यों नहीं समझ पा रहा है कि उसके इस व्यवहार से जया को कितना दुख पहुंच रहा है? वह बेचारी दिन भर नौकरी करती है, घर आ कर अपनी बेटी पलक की पढ़ाई में सहायता करती है, और रात को भोजन बना कर दिलीप की प्रतीक्षा करती है।  . . .अब तो प्रतीक्षा करना भी बन्द कर दिया है  . . .

°

सामयिकी में
लोकपिय कथा लेखिका शिवानी
की याद में कुछ उनकी कलम से
कुछ पुस्तकों से पृष्ठों से
 
स्मृतियों के सारांश

°

परिक्रमा में
23 मार्च को लंदन में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी
सम्मेलन सम्पन्न हुआ। इस अवसर 
अनिल शर्मा का विस्तृत आलेख
ब्रिटेन में हिंदीःअस्तित्व से अस्मिता तक
और
नार्वे से डा सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' का लघु–लेख
विश्व में उथल पुथल

°

विज्ञान वार्ता में
देश विदेश से विज्ञान समाचार
प्रस्तुत कर रहे हैं डा गुरूदयाल प्रदीप

°

साक्षात्कार में
कमलेश्वर से बातचीत कर रहे हैं
कृष्ण बिहारी

!सप्ताह का विचार!
अधिक हर्ष और अधिक उन्नति के बाद ही अधिक दुख और पतन की
बारी आती है।
—जयशंकर प्रसाद

 

कथा महोत्सव
2003

भारतवासी हिन्दी लेखकों की कहानियों
के संकलन 
माटी की गंध 
में प्रस्तुत है चंडीगढ़ से
डा नरेश की कहानी
ममता

दीवार से लगी बैठी ताई को अनुभव हुआ कि उसकी देह इस भयंकर शीत को सहन न कर सकेगी। वह उठी। क्षोभ और वितृष्णा के उसी अहसास में उसने संस्कारवश थोड़ा–सा आटा कटोरी में डालकर गीला किया और उसका दिया बनाया। रूई का एक फाहा उंगलियों से धुनकर उसने बत्ती बनाई और अलमारी में रखे घी के डिब्बे में भिगो ली। दिया जलाकर उसने कृष्ण कन्हैया की मूर्ति के सामने रखा और वहीं मूर्ति के निकट ज़मीन पर बैठ गई। बैठे–बैठे सोचती रही। लोक–परलोक, पाप–पुण्य, पश्चाताप–प्रायश्चित से सम्बंधित कथाओं में सुनी अनेक कहानियां, अनेक घटनाएं उसके मस्तिष्क में घूमती रहीं। कहीं कोई समाधान मिल जाए ताकि उसकी पिल्ले के स्पर्श से दूषित देह पुनः पवित्र हो जाए। उसका शापित धर्म फिर से जागृत हो जाए। इसी उधेड़बुन में न जाने कब ताई की आंख लग गई।
(अगली कहानी :आस्था की मोहभंग)


संस्मरण में
पहली अप्रैल के अवसर पर
महेश कटरपंच का आलेख
सावधान! 
आज पहली अप्रैल है

°

फुलवारी में
दिविक रमेश का बाल नाटक
बल्लू हाथी का बालघर
और कविता
ध्यान रखेंगे

°

लंदन पाती में
यूरोप इराक और दुनिया भर की परख
शैल अग्रवाल द्वारा
दिल और दिमाग़ से

°

पर्व परिचय में
गणगौर पर्व का परिचय 
प्रमिला कटरपंच की कलम से
!म्हाने खेलण दो गणगौर!

 

अनुभूति में

कुंअर बेचैन की 12 नयी ग़ज़लें साथ में
सुमन कुमार घेई व
ममता कालिया की 
नयी कविताएं

होली विशेषांक

–° पिछले अंकों से°–

शिवानी से संबंधित विशेष पृष्ठः

°

कहानियों में
हीरो–जयनंदन
औरतःदो चेहरे–सुधा अरोड़ा
टोबा टेक सिंह–सआदत हसन मंटो

°

धारावाहिक में
'सागर के इस पार से उस पार से'
की अगली किस्त
पुराने परिचय का अहसास

°

रसोईघर में शाकाहारी मुगलई का 
मस्त ज़ायका
कढ़ाई पनीर

°

हास्य–व्यंग्य में बसंत आर्य का 
व्यंग्य
विश्व कप का बुखार

°

प्रेरक प्रसंग में पदमा चौगांवकर की
बोध कथा
पगडंडी

°

कलादीर्घा में कला और कलाकार के
अंतर्गत
मनसाराम

°

परिक्रमा में
दिल्ली दरबार के अंतर्गत
बृजेश कुमार शुक्ला का आलेख
आतंकवाद के विरूद्ध

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