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अनुभूति

9. 10. 2005

आज सिरहाने।उपन्यास।उपहार।कहानियां।कला दीर्घा।कविताएं।गौरवगाथा।पुराने अंक।नगरनामा।रचना प्रसंग
घर–परिवार।दो पल।नाटक।परिक्रमा।पर्व–परिचय।प्रकृति।पर्यटन।प्रेरक प्रसंग।प्रौद्योगिकी।फुलवारी।रसोई।लेखक
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पिछले सप्ताह

गांधी जयंती के अवसर पर
राजेश कुमार सिंह का विशेष लेख
डाक टिकटों में गांधी
साथ में
अनूप शुक्ला के कुछ प्रश्न 'पहला गिरमिटिया' के लेखक गिरिराज किशोर से
और उनकी डायरी के चुने हुए अंश
गांधी की तलाश
के अंतर्गत

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हास्य व्यंग्य में
डा नरेन्द्र कोहली का व्यंग्य
वह कहां है

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फुलवारी में
ललित कुमार के सहयोग से
भारत, श्री लंका और ईरान
विषयक जानकारी देश–देशांतर के अंतर्गत

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उपन्यास अंश में
यू एस ए से सुषम बेदी के धारावाहिक उपन्यास अंश लौटना का भाग–1

"तुम्हारा अभिनय तो बहुत श्रेष्ठ है, मीरा! और तुम शब्दों पर नहीं, उनके अर्थों और व्यंजना की सारी संभावनाओं को अपनी मुद्राओं में आकार देकर अभिनय करती हो, इसके लिए बहुत उर्वर मस्तिष्क चाहिए होता है जो विरली ही नर्तकियों के पास होता है। जिस्म की लयात्मकता और मस्तिष्क की
उर्वरता का ऐसा संगम कहां होता है, मीरा! तुम्हें तो सब छोड़छाड़ कर नृत्य में ही लगे रहना चाहिए।" फिर जब कृष्णन ने पूछा था कि उसकी अगली परफ़ॉरमेंस कहां हो रही है तो मीरा कोई झूठ का परदा दोनों के बीच रख नहीं पाई थी। जिस नर्तकी के ऊंचे आसन पर कृष्णन ने उसे बिठा दिया था, उससे नीचे
उतरकर बोली, "तुम्हें क्या लगता है बहुत व्यस्त नर्तकी हूं मैं?"

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इस सप्ताह

कहानियों में
भारत से नवनीत मिश्र की कहानी
विश्वास

किसी गिरहर इमारत जैसी वे मेरे ठीक पीछे खड़ी थीं। सब तरफ़ से झूल गया बुढ़ापे का शरीर। सामने के दांत टूटने लगे थे जिसके कारण होंठ अपने टिके होने का आधार खो रहे थे और पूरा चेहरा डोनाल्ड डक जैसा लगने लगा था। खिचड़ी बाल कहीं–कहीं पर काफ़ी कम हो गए थे और गंजापन झलकने लगा था। मदद की गुहार करती–सी आंखें जिनकी उपेक्षा करके आगे बढ़ जाना संभव नहीं होता। दाहिने गाल पर एक काला मस्सा था जो उनके गोरे रंग पर आज भी दिठौने–सा दमकता लग सकता था लेकिन मस्से पर उगे सफ़ेद बालों के गुच्छे ने उनके चेहरे को विरूपित कर रखा था। उनके माथे पर गहरी सिलवटें थीं जिनमें पसीने की महीन लकीरें चमक रही थीं।

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उपन्यास अंश में
यू एस ए से सुषम बेदी के धारावाहिक
 उपन्यास अंश
लौटना का भाग–2

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बड़ी सड़क की तेज़ गली में
अतुल अरोरा के साथ
भाग चलें पूरब की ओर

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मंच मचान में
अशोक चक्रधर के शब्दों में
भवानी दादा बोले मज़ा आ गया

°

कला दीर्घा में
नवरात्र के अवसर पर विशेष दीर्घा
दुर्गा

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सप्ताह का विचार
दूसरों पर किए गए व्यंग्य पर हम हंसते हैं पर अपने ऊपर किए गए व्यंग्य पर रोना तक भूल जाते हैं।—रामचंद्र शुक्ल

 

अनुभूति में

खबरदार कविता
गीत, ग़ज़ल
कविताएं और
नयी हवा में
ढेर सी नवीन रचनाएं

–° पिछले अंकों से °–

कहानियों में

रोड टेस्ट–इला प्रसाद
अठतल्ले से गिर गए रेवत बाबू–जयनंदन
लालटेन, ट्यूबलाइट–मोतीलाल जोतवाणी
अपराधबोध का प्रेत–तेजेन्द्र शर्मा 
चिठ्ठी आई है–कमलेश भट्ट कमल
शौर्यगाथा–राम गुप्ता
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हास्य व्यंग्य में
कैसे कैसे शब्दजाल–रविशंकर श्रीवास्तव
आज्ञा न मानने वाले–नरेन्द्र कोहली 
जिसे मुर्दा पीटे  . . .–महेशचंद्र द्विवेदी
देश का विकास जारी है–गोपाल चतुर्वेदी
°


संस्कृति में
डा रमेशकुमार भूत्या की रचना
पंचकर्म और उसका औचित्य
°


प्रौद्योगिकी में
आशीष गर्ग द्वारा जानकारी
कंप्यूटर की मेमोरी
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पर्यटन में
गुरमीत बेदी की दृष्टि से देखें
भंगाहल का तिलिस्मी संसार
°ं


हिंदी दिवस के अवसर पर
तीन विशेष रचनाएं
महेशचंद्र द्विवेदी का चुटीला व्यंग्य
न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी
°
इंद्र अवस्थी का
करारा हिंगलिश चिट्ठा
आइए नेशनल लैंगुएज को रिच बनाएं
°

और
जितेन्द्र चौधरी की संवेदनात्मक स्वीकृति
मेरा हिंदी प्रेम
°


फ़ोन बजता रहा
कृष्णा सोबती के धारावाहिक संस्मरण का
तीसरा और अंतिम भाग

 

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"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरूचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1 – 9 – 16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

प्रकाशन : प्रवीन सक्सेना   परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन, कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन 
 सहयोग : दीपिका जोशी
फ़ौंट सहयोग :प्रबुद्ध कालिया

   

 

 
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